सोमवार, 20 सितंबर 2010

सब सूना बिन तेरे छलिया

गोकुल के ओ बंशी बजैया
पावन बंशी बजाने वाले
लचायें हम यमुना तीरे

प्रकट नहीं क्यों होते ग्वाले
सारे दिन कुंजन वन भटके
र्शन की हम आस लगाए

व्याकुल सखियाँ, आतुर साथी
याद तेरी हम सबको सताए
ब सूना बिन तेरे छलिया 

विरही मन की प्यास बुझा दो
हाँ  कहीं भी छुपे हुये हो
हाँ पहुँचकर दरश दिखा दो.











- विजय तिवारी ' किसलय '

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