सोमवार, 6 सितंबर 2010

वर्तमान शिक्षा प्रणाली में रचनात्मकता का अभाव - श्री रामेश्वर नीखरा

विगत दिवस हमारे अग्रज आदरणीय श्री मदन तिवारी जी एवं पूर्व सांसद सम्माननीय श्री रामेश्वर नीखरा जी से वर्तमान शिक्षा प्रणाली में रचनात्मकता के हो रहे अभाव पर बात हुई तब श्री नीखरा जी की सहजोक्ति थी कि वाकई वर्तमान शिक्षा प्रणाली सृजन से दूर होती जा रही है. शिक्षा, शिक्षार्थी और शिक्षकों में काफी बदलाव आया है. सकारात्मक मामलों में बदलाव को तो उचित ठहराया जा सकता है लेकिन स्वार्थ और राजनैतिक दखल के परिणाम देश के भावी कर्णधारों के लिए श्रेयस्कर नहीं होंगे.  आज हम उनकी अभिव्यक्ति  उनके ही आलेख से जानते हैं -

(मेरे द्वारा श्री नीखरा जी का स्वागत )
शिक्षा का पहले राजनीतिकरण हुआ, फिर व्यवसायीकरण और अब उस पर भिन्न-भिन्न किस्म के संक्रमण हो रहे हैं। पाठ्य-पुस्तकों में सत्ताधारी दलों के विचारों और सुझावों की छाया पड़ना अब कोई चकित करने वाली बात न रही। उधर विद्यालयों में ज्ञान के प्रति उदासीनता और परीक्षोन्मुख पाठ्यक्रमों को तरजीह देने की मानसिकता ने विद्यार्थियों को एकांगी सूचनाओं का गट्ठर तो बना दिया किंतु वे सर्वांगीण विकास के लक्ष्य की पटरी से उतार दिए गए। शिक्षकों को वेतनभोगी कर्मचारी मानने की मानसिकता ने उनके प्रति जिस उपेक्षा का सृजन किया, उससे समाज में उनकी स्थिति का भी क्षरण हुआ। अभिभावकों ने महँगे विद्यालयों की निजता को सरकारी व्यवस्थाओं की तुलना में तरजीह दी और भारत दो प्रकार के नागरिकों को गढ़ने वाला देश बन गया। सरकारी स्कूल शासित होने वालों का उत्पादन करने लगे और निजी स्कूल अपने ताम-झाम की बिना पर शासक पीढ़ियों का।
यह एक जाना-बूझा तथ्य है कि शिक्षा जैसे व्यापक कार्यक्रम को अकेले सरकार नहीं चला सकती, इसलिए उसमें समाज की भूमिका और संस्थाओं का सहयोग एक बड़ी साझीदारी के रूप में सामने आना ही चाहिए था, जो स्वाधीनता से पहले और बाद में तेजी से बढ़ा। अंतर इतना ही है कि स्वाधीनता के पूर्व संस्थाओं ने सेवा और त्याग की भावनाओं से शिक्षा के क्षेत्र को चुना था जबकि स्वाधीनता के बाद मूल्य बदलने लगे और इस शताब्दी के अंतिम वर्षों तक तो उनका पूर्णतः व्यवसायीकरण हो गया। आखिर खुली बाजार व्यवस्था के झोंके के साथ यह तो होना ही था।
       व्यवसायीकरण ने शिक्षालयों को रसहीन बना दिया। यहाँ से प्रेम, वात्सल्य, सेवा, सहयोग, त्याग, उपकार, सद्भाव, करुणा जैसे मानवीय गुण और मूल्य लापता हो गए और नफा-नुकसान, आमदनी तथा अट्टालिकाओं की भव्यता के प्रति आकर्षण बढ़ गया। बैलेंस शीट पर दृष्टि ठहर गई है और मनुष्य गढ़ने के चरम लक्ष्य को उन्होंने आँखों से ओझल हो जाने दिया है। महँगे विद्यालय अभिभावकों को लुभाने में सफल रहे हैं। इन विद्यालयों में अपने बच्चों को दाखिला दिला देना उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा का एक और कारक बन चुका है।
विद्यालयों ने भी ऐसे-ऐसे स्वांग रचना सीख लिया है, जिसका शिक्षा के साथ कोई सीधा रिश्ता ही नहीं है। सरकारी से लेकर गैर सरकारी विद्यालयों तक गणवेश के प्रति भारी दबाव है। इसके पीछे उनका एक गढ़ा हुआ नकली तर्क यह है कि गणवेश विद्यार्थियों में समानता का भाव पैदा करता है। अमीर- गरीब और समुदायगत विभिन्नाताएं इसके पीछे छिप जाती हैं। एकता ओर समानता का गुण पैदा होता है। यदि यह तर्क वास्तविक है, तो पूरे राष्ट्र को ही क्यों नहीं हम एक तरह की गणवेश पहनाकर राष्ट्रीय एकता स्थापित कर लेते। गणवेश के पीछे विद्यालय भिन्नताओं को भले ही स्थायी तौर पर ढँक न पाए हों, पर उन्होंने बच्चे की मौलिकता को जरूर ढँक दिया है और इस सत्य से आँखें फेर ली हैं कि प्रत्येक बालक ईश्वर की मौलिक कृति है। हमें उसकी मौलिकता को छीन लेने का अधिकार किसने दिया? विविधताओं से भरे देश में विविधता परहेज कहीं हमारे तथाकथित शिक्षाविदों की विपरीत दिशा में यात्रा का प्रस्थान बिन्दु तो नहीं?
इस गर्म और शुष्क जलवायु वाले देश में नेक टाई पहनाकर हमने ठंडे और नम पश्चिम की शर्मनाक नकल तो कर ली परंतु बंद गले के भीतर छटपटाते विद्यार्थी की दशा को हम देख पाने में असमर्थ हो गए। असल में गणवेश विद्यालयों के इश्तहार हैं और उन्होंने जीवित शिक्षार्थियों को अपनी मृत आकांक्षाओं का विज्ञापन बना डाला है। विद्यालय शुल्क वसूली के पैसे क्रूर आगार तक बनने से नहीं चूके, जहाँ राजस्व वसूली की दंड प्रक्रिया से भी ज्यादा भयावह वातावरण निर्मित कर दिया गया है।
शिक्षार्थियों की तरह ही शिक्षकों की दुर्दशा भी कर दी गई है। पहले तो राज्य सरकार ने ही इस दिशा में कदम बढ़ाया और शिक्षकों के अनेक पदनाम और वेतनमान रच डाले। सबके पीछे एक ही दृष्टि रही - वेतन घटाकर, कम-से-कम पर शिक्षकों की बहाली कर उनका वैधानिक शोषण करना। जब सरकार ने शोषण के वैध तरीके निकाल लिए तो फिर अशासकीय स्तर पर तो मानो उन्हें इसका खुला अनुमति-पत्र ही हासिल हो गया। अनुदान प्राप्त अशासकीय विद्यालयों और महाविद्यालयों का एक सरकार ने अनुदान समाप्त किया तो दूसरी सरकार ने विपक्ष में रहने तक तो उसे दिलाने का वचन दिया, किंतु सत्ता में आते ही उनका राग बदल गया। क्या इस पर विश्वास किया जा सकता है कि आज अनुदान प्राप्त शिक्षक दो और तीन हजार रुपए मासिक पर गुजारा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर छठवें वेतनमान की घोषणाएँ हो चुकी हैं।
असल में राज्य ने अपनी कल्याणकारी भूमिका से मुँह मोड़ लिया है। राज्य अब उस नियामक की भूमिका में नहीं है, जो एक "मॉडल स्कूल" स्थापित कर उसे ऐसा मॉडल बनाता था, जिसके हमराह बनकर निजी क्षेत्र में दूसरे विद्यालय प्रेरणा ग्रहण कर सकें। सरकारें इस विषय से लगभग पिंड छुड़ाने की मुद्रा अख्तियार कर चुकी हैं। यह अनुचित और गलत रास्ता है। शिक्षा को उन्हें अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति की प्राथमिकता सूची में रखना ही पड़ेगा। पीढ़ियों का भविष्य ताक कर नहीं रखा जा सकता। इसी तरह अध्यापकों को वेतनभोगी कर्मचारी बना डालने की प्रवृत्ति को बदलकर उनके प्रति आदर-सम्मान और राजकीय कृतज्ञता का भाव स्थायी बनाना होगा। बजट के सैंकड़ों गैर जरूरी खर्चों को घटाकर शिक्षा-व्यय को रक्षा-व्यय के समान मानने की उदारता दिखानी होगी।
"सबके लिए शिक्षा का अधिकार" अधिनियम तो बन गया। इसमें केंद्र सरकार ने स्पष्टतः प्रावधान किया है कि राज्य सरकारें पुस्तकालय, कक्षा-कक्ष और खेल के मैदान उपलब्ध कराएँगीं, देश में पन्द्रह लाख शिक्षकों की भर्ती होगी और विद्यालयीन व्यवस्थाएँ चुस्त तथा कठोर की जाएँगी। राज्य सरकार ने शिक्षकों की भर्ती पर मौन साध लिया है और नई इमारतों के निर्माण की उसकी मंशा ही नहीं है. वेतन विसंगतियों ने शिक्षकों को मानसिक रूप से इतना क्षुब्ध कर रखा है कि शिक्षा की धुरी ही धसक रही है .
मध्य प्रदेश के अधिकारियों ने अधनियम लागू होने के अगले दिन एक अखबार में कह दिया था कि इस अधिनियम के अंतर्गत शिक्षकों की आवश्यकता प्रारम्भ के तीन या चार साल तक ही रहेगी . इस अवधि में निजी विद्यालयों की संख्या बढ़ेगी और शासन पर दबाव कम होगा. इसे देखते हुए वर्तमान शिक्षकों की आयु सीमा में वृद्धि कर शिक्षकों की कमी को पूरा कर लिया जायेगा , परन्तु इससे वांछित परिणाम तो हासिल नहीं हो सकता.
वास्तविकता यह है कि आज एक ऐसा समय हमारे सामने आ पहुँचा है जब एक नए ' राज्य शिक्षा आयोग के गठन की अनिवार्यता महसूस की जा रही है ताकि शिक्षा, शिक्षार्थी, शिक्षक और शिक्षालयों की नई व्याख्याएँ करते हुए उनके स्वरूप और सृजन के ऐतिहासिक काम को फलीभूत किया जा सके. (आलेख साभार नई दुनिया जबलपुर  से)
प्रस्तुति-
-विजय तिवारी " किसलय "

11 टिप्‍पणियां:

  1. Rachanatmakta ka abhaav to bahut hai...sach kha...chahe bachpan me nibandh lekhan ho ya any sawalon ke jawab,jaisa shikshak ne kaha,waisahi likha jana hota hai.Bachhon ko swayam sochne kee prerna nahi dee jati.

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  2. बेह्द उम्दा और सोचने को मजबूर करता आलेख्।
    इसी विषय पर मैने भी लिखा था एक आलेख्…………यहाँ देखियेगा मगर आपने तो सारी पोल खोल दी हैं।

    http://vandana-zindagi.blogspot.com

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  3. नीखरा जी के विचारों से बिलकुल सहमत नहीं की शिक्षा के क्षेत्र में रचनात्मता का अभाव है ...शायद वे अपने पुराने नजरिये से यह बात कह गए होंगे... रहा राजनीतिकरण की बात तो ये महोदय अपने उद्देश्यों की पूर्ती के लिए खुद हर जगह राजनीतिकरण करने में लगे हैं .... आभार

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  4. राजनीतिज्ञों के कारण हर क्षेत्र में गन्दगी फ़ैल रही है ... आभार

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  5. Apne yahan shikshan pranali me popat panchhee to bahut hai...sahi kaha aapne!Kaash koyi ye baat sun le!

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  6. कोई भी चीज तब प्रचारित ओर प्रसारित होती है जब उसे सरकारी धन से सही मायने में प्रचारित ,प्रसारित ओर प्रोत्साहित किया जाय ,लेकिन जब पूरी सरकार अन्याय,भ्रष्टाचार,नैतिक पतन,दलाली ओर कुव्यवस्था को प्रचारित व संरक्षण दे रही हो तो कोई भी नैतिकता ओर रचनात्मकता को बढ़ाने का प्रयास कैसे कर सकता है ओर इस दुष्कर कार्य के परिणाम आज बहुत ही घातक हैं हर जगह अपमानित होना परता है इस नेक काम के बदले ...

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  7. यह तो बहुत अच्छा लिखा...
    _____________
    'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है...

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  8. tiwari ji
    aapki post pasand aai.\
    -K. P. shukla , Jabalpur

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