सोमवार, 4 अप्रैल 2016

लघुकथाकार अतहर अब हमारे बीच नहीं रहे

लघुकथाकार अतहर अब हमारे बीच नहीं रहे।










संस्कारधानी जबलपुर ही नहीं अपितु प्रदेश की सीमा को लाँघकर देश के कोने-कोने में लघुकथा विधा के प्रचार-प्रसार हेतु प्राण-प्रण से जुटे रहने वाले विख्यात लघुकथाकार एवं  शायर जनाब मोहम्मद मोईनुद्दीन अतहर साहब का आज दिनांक 4 अप्रैल 2016 को जबलपुर में इंतकाल हो गया।
जबलपुर को कर्मभूमि मानने वाले जनाब अतहर को उनके स्वजनों, मित्रों और साहित्यकारों की उपस्थिति में सुपुर्देखाक किया गया।

उनके इंतकाल से लघुकथा का एक बरगद जैसा स्तम्भ ढह गया मैं (विजय तिवारी "किसलय") ऐसा मानता हूँ।

भाई इरफ़ान ने अतहर साहब के निधन को उर्दू-हिंदी की गंगा-जमुनी तहजीब की बड़ी क्षति बताया।

ख्यातिलब्ध कवि श्री संदीप सपन ने उन्हें कामयाब लघुकथाकार कहा।

मनोज शुक्ल ने उन्हें लघुकथा विधा का सजग प्रहरी बताया।

भाई राजेश पाठक प्रवीण की दृष्टि में जनाब अतहर एक अच्छे साहित्यकार के साथ साथ एक अच्छे इंसान भी थे।

सुरेश दर्पण ने उनकी लघुकथाओं की तारीफ़ करते हुए बताया की उनकी अभिव्यक्ति में सामाजिक विषमताओं का उल्लेख अवश्य होता था।

गुप्तेश्वर द्वारका गुप्त ने उन्हें अपनी विधा का सशक्त हस्ताक्षर कहा।

विजय नेमा अनुज ने उनके निधन को संस्कारधानी में लघुकथा की बढ़ती लोकप्रियता में बड़ा अवरोध आना बताया।

राजीव गुप्ता ने उनकी सरलता और सादगी से युक्त व्यक्तित्व कहा।

आज संध्या शोक संवेदना हेतु आयोजित बैठक में जनाब मो. मोइनुद्दीन अतहर को साहित्यकारों नेभावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

बुधवार, 16 मार्च 2016

पुण्य सलिला माँ नर्मदा - विजय तिवारी "किसलय"

माघे च सितसप्तम्यां दास्रभे रवेर्दिने
मध्यान्हसमये राम भास्करेण क्रमागते।

           पुण्य सलिला माँ नर्मदा के अवतरण से संबंधित उल्लेख है कि वसिष्ठ ऋषि ने प्रभु राम को बताया था कि अश्विनी नक्षत्र की माघ शुक्ला सप्तमी, रविवार को मध्यान्ह काल में जब सूर्य मकर राशि में था, तब माँ नर्मदा प्रकट हुई थीं।

 शोणो महानदशश्चैव नर्मदा सुरसा कृता
 मंदाकिनी दशार्णा च चित्रकूटा तथैव च।।
 तमसा विदशा चैव करभा यमुना तथा
 चित्रोत्पला विपाशा च रंजना बालुवाहिनी।।

          उपरोक्त 15 नाम माँ नर्मदा की विशेषताओं के कारण ही विख्यात हैं। रव (आवाज) एवं रेव ((प्लवगति) से तात्पर्य घोष करना, उछलना-मचलना है। वहीं 'रेवते एव रेवा' अर्थात जो शोर मचाती, उछलती-मचलती गमन करे। वही हमारी माँ
मारबल रॉक्स (बन्दर कूदनी), नर्मदा नदी, जबलपुर 
रेवा है। अमरकंटक के वंशगुल्म (बाँस भिरे) से निकली नर्मदा मंडला, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, ओमकारेश्वर, महेश्वर, चाँदोद, भरूच की धरा पर प्रवाहित होते हुए अरब सागर में घुलमिल जाती है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं गुजरात को नार्मदेय संस्कृति से जोड़ने का श्रेय इसी पुण्य सलिला को जाता है। माँ नर्मदा करीब दो दर्जन बड़ी सहायक नदियों को अपने में समाहित कर समुद्र के निकट वेगवती न होकर सागर सा अपना अलौकिक स्वरूप दिखाती है। अमरकंटक से खंभात तक 131 2 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली मध्य प्रदेश की यह प्राणधारा रेवा गंगा जैसी श्रेष्ठ न समझी जाए परंतु ज्येष्ठ जरूर है। क्योंकि सभी नदियों के अस्तित्व समाप्त होने की कथाएँ हैं परंतु नर्मदा युगों-युगों से निरंतर प्रवाहमयी सदानीरा मानी जाती है। स्कंद पुराण में इसीलिए वर्णन है कि "सप्तकल्पक्षयेणीने न मृता तेन नर्मदा" अर्थात सात कल्पों के समाप्त होने पर भी नष्ट न होने वाली।
      धार्मिक ग्रंथों एवं भारतीय जनमानस में नर्मदा का अलग स्थान है। संपूर्ण नर्मदा तटीय एवं समीपवर्ती क्षेत्रों में नर्मदा मैया के पूजन-अर्चन-स्मरण-वंदन के बिना दिनचर्या और मांगलिक कार्य संपन्न नहीं होते। निराश्रितों को आश्रय देने वाली, क्षुधा मिटाने वाली, आनंददायनी, निर्मल तथा अमृततुल्य अपने जल से स्वास्थ्य-संपन्नता प्रदान करने वाली यह सरिता हमारी माँ यूँ ही नहीं बनी। इसकी गोद में पले-बढ़े  प्रकांड विद्वान, साहित्यकार, राजनेता, कलाकार एवं ऋषि-मुनियों की अगणित प्रतिभाओं को आकाशीय ऊँचाई प्राप्त हुई है। नर्मदा किनारे किए गए सृजन ने जनमानस को आदर्श दिशा दी है। धार्मिक आस्था को मजबूती प्रदान की है। महर्षि वाल्मीकि, कालीदास, तुलसीदास, राजशेखर, मुरारि, मंडन मिश्र आदि  की लेखनी ने भी नर्मदा के गुण गाए हैं और यथासमय माँ नर्मदा का उल्लेख भी इनके द्वारा किया गया है। शायद ऐसे ही अनेक कारण और नर्मदा के नैसर्गिक वातावरण से आकर्षित होकर साधकों एवं ऋषि-मुनियों ने अपनी साधनास्थली, आश्रम तथा आध्यात्मिक चिंतन-मनन हेतु नर्मदा क्षेत्र को ही प्रमुखता दी। यज्ञशालाएँ, तपोस्थलियाँ, सृजन एवं तांत्रिक साधनाओं तक की बहुलता नर्मदा किनारे देख की जा सकती है। असंख्य तीर्थ स्थलों, मंदिरों, धर्मशालाओं का विद्यमान होना और नर्मदा की परिक्रमा करना मां नर्मदा के प्रति प्रबल विश्वास और आस्था ही है
       स्कन्द पुराण के रेवा खंड, 12 वें अध्याय में विरचित  नर्मदा स्तोत्रम, आदि शंकराचार्य का नर्मदाष्टकम् एवं नर्मदा लहरी, रामपाल शास्त्री, मैथिलेंद्र नाथ झा एवं रघुराज सिंह जी द्वारा भी नर्मदा गुणगान करते हुए नर्मदाष्टक लिखे गए हैं। मेरे स्वयं का हिंदी में रचित "नित नमन माँ  नर्मदे" नर्मदाष्टक भी मां नर्मदा की जीवनी अभिव्यक्त करता है। यहाँ हम यह भी बताना चाहेंगे कि नर्मदा की धार्मिक पावनता, रमणीयता एवं प्राकृतिक सुंदरता ने ही नर्मदा तट पर वैभवशाली त्रिपुरी नगरी (वर्तमान तेवर, जबलपुर) को विशाल कलचुरि साम्राज्य की राजधानी बनाया। शिव के उपासक भारतीय नेपोलियन कहे जाने वाले सम्राट कर्णदेव (सन 1041 से 1072) द्वारा अपने पसंदीदा नर्मदा क्षेत्र में बसाई इस नगरी को भारत के महत्वपूर्ण एवं विस्तृत राज्य पर शासन करने का गौरव हासिल हुआ। चेदि, गढ़ा-मंडला गौंड़वाना, महेश्वर, उज्जयनी, मांधाता, मांडू आदि के राजाओं का भी माँ नर्मदा के प्रति विशेष लगाव रहा है। संपूर्ण नर्मदा क्षेत्र बहुआयामी प्रतिभा का धनी रहा है और वर्तमान भी यशस्वी है। जीवनदायक जल सहित वनसंपदाएँ, खनिज, सघन वन, जड़ी-बूटियाँ, पर्यटन स्थल, प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक स्थल, उद्योग-धंधे, विख्यात प्रतिभाएँ, शिक्षा, तकनीकि, विज्ञान आदि की सफलता में कहीं न कहीं माँ नर्मदा का योगदान रहता ही है।
        सबिन्दुसिन्धु सुस्खलत्तरंग भंग रंजितं
        द्विषत्सुपापजात जातकारि  वारिसंयुतं
        कृतांत दूत कालभूत भीतिहारि वर्मदे
         त्वदीयपाद पंकजं नमामि देवि नर्मदे।।
       
          अर्थात अपने जल बिंदुओं से समुद्र की चलती हुई तरंगों में मनोहरता लाने वाली तथा शत्रुओं के भी पाप समूह की विरोधी और कालरूप यमदूततों के भय को हरने वाली, अतः हर तरह से रक्षा करने वाली हे देवि नर्मदे! तुम्हारे  चरण कमलों को में प्रणाम करता हूँ।
       
-डॉ विजय तिवारी "किसलय"
 vijaytiwari5@gmail.comB

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015