Tuesday, June 30, 2009

दोहा श्रृंखला [दोहा क्र. ६६]

वर्षा करती धरा से,
जैसे ही अनुबंध॥
शुभारम्भ की घोषणा ,
करती सौंधी गंध॥
- विजय तिवारी ' किसलय '

Sunday, June 28, 2009

विजय नम्रता ने ही पाई


आप सभी के लिए एक आद्याक्षरी विधा की कविता प्रस्तुत है :-
(कविता स्पष्ट पढने के लिए उपरोक्त बॉक्स को क्लिक करें।)
- विजय

Tuesday, June 23, 2009

दोहा श्रृंखला [दोहा क्र. ६५]

सद्य-प्रस्फुटित पुष्प का,
भ्रमर करें रसपान .
प्रेम-समर्पण का बना,
जैसे सृष्टि-विधान ..

- विजय तिवारी " किसलय "

Wednesday, June 17, 2009

संस्कारधानी के एक बहुमुखी व्यक्तित्व : श्री मोहन शशि

जबलपुर की माटी में पले-बढ़े श्री मोहन शशि को आज हमारा समाज जिस आदर भाव और अपनत्व से देखता है , उसके पीछे उनकी प्रतिभा, व्यक्तित्व, जिज्ञासा, त्याग, समर्पण के अतिरिक्त स्थानीय परिवेश का भी योगदान है। 01 अप्रेल 1937 को जन्मे श्री शशि जी विद्यार्थी जीवन में अल्हड़ प्रवृत्ति के पोषक रहते हुए सदैव कुछ नया करने में विश्वास रखते थे। सामाजिक, राजनैतिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने में सक्षम श्री शशि जी सन् 1962 में महाकोशल युवक कांग्रेस दल के सेक्रेटरी बनकर यूगोस्लाविया जाना उनकी तात्कालिक कार्यक्षमता एवं योग्यता का ही परिचायक है.
बातों ही बातों में पत्रकारिता का क्षेत्र चुनने वाले शशि जी ने पत्रकारिता वरण करने के उपरांत कभी पीछे मुड कर नहीं देखा. जबलपुर समाचार, प्रदीप एवं जनसत्ता के बाद 1964 में दैनिक नई दुनिया एवं 1967 से नव भारत जबलपुर की दीर्घ तथा यशस्वी यात्रा के पश्चात आज भी आप दैनिक दैनिक भास्कर जबलपुर में अपने अनंत अनुभव से पत्रकारिता मिशन में साधनारत हैं. अख़बारी एवं साहित्य आकाश में प्रतिष्ठित मोहन शशि जी के आलोक में सैकड़ों नवांकुरित पत्रकार एवं साहित्यकार अपनी मंज़िल पा चुके हैं.
पत्रकारिता और साहित्य क्षेत्र में ख्यातिलब्ध शशि जी का लेखन-चिंतन सदैव चलता रहता है। इनकी प्रकाशित कृतियाँ सरोज, तलाश एक दाहिने हाथ की, राखी नहीँ आई, हत्यारी रात, शक्ति साधना, दुर्गा महिमा एवं अमिय साहित्य साधना का ही द्योतक हैं। ऐसे संस्कार धानी जबलपुर के सपूत को अब तक अनेक अलंकरण, सम्मान एवं अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। साहित्य सुधारक, संस्कार श्री, नर्मदा चरण, भक्त कवि अलंकरण, उदारनिक सेवा पदक, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पत्रकारिता पुरस्कार, स्वर्गीय श्री हीरा लाल गुप्त "मधुकर" स्मृति वरिष्ठ पत्रकारिता सम्मान प्राप्त होने के बावजूद अहंकार शून्य, समर्पण शील, नेक, भावनात्मक, समाज प्रेमी, कुशल संगठक, सरल, निष्कपट व्यक्तित्व आपकी पहचान है।
संस्कारधानी की साहित्यिक, सामाजिक, सामाजिक, नृत्यकला आदि की बहुआयामी संस्था "मिलन" को शिखर में प्रतिष्ठित करने वाले श्री शशि जी ने जबलपुर की कलाओं और कलाकारों को जो स्थान दिलाया उसे जबलपुर वासी कभी भुला नहीँ पाएँगे।
संस्कार धानी की पत्रकारिता को शशि जी ने नये आयाम दिए हैं, वहीं साहित्य जगत में भी जागरूकता प्रदान की है। 72 वर्षीय शशि जी बहुमुखी प्रतिभापरक व्यक्तित्व, नयी प्रतिभाओं के उत्प्रेरक, भावी पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत माने जाते हैं। ऐसे आदरणीय श्री मोहन शशि जी के स्वस्थ्य "एवं जीवेत शरद: शतम की कामना करते हैं।
- विजय तिवारी " किसलय "
आज हम आदरणीय मोहन शशि जी की रचना " जल है तो कल है " को उनकी ही आवाज़ में आप सब को सुनवा रहे हैं :-
रचना सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :-


Thursday, June 11, 2009

दोहा श्रृंखला [दोहा क्र. ६४]

भूख, गरीबी, बेबसी,

और वक्त की पीर ।

चन्दा को रोटी समझ,

बच्चे हुये अधीर ॥

- विजय तिवारी " किसलय "

Sunday, June 7, 2009

वंदना गुप्ता - धर्म, साहित्य और संस्कारों की त्रिवेणी. (जन्म दिवस पर विशेष )

दिल्ली के गोयल परिवार की सबसे छोटी बेटी वंदना गुप्ता कंप्यूटर में डिप्लोमा प्राप्त स्नातक हैं. माँ-बाप की सबसे चहेती, बचपन में नटखट स्वाभाव वाली वंदना के साहित्यिक , धार्मिक, आध्यात्मिक और गहन विचारक बनाने की पृष्टभूमि में कई घटनाएँ और परिस्थितियाँ रही हैं. माँ श्रीमती रूपवती की ममता और धार्मिक प्रवृत्ति ने उनको सहज, सरल और धर्मोन्मुखी बनाया. पिता स्वर्गीय श्री राधेश्याम गोयल ने एक पिता , एक शिक्षक और एक सच्चे मार्गदर्शक की भूमिका का बखूबी निर्वहन किया. 'ज़िंदगी में किसी से डरना नहीं चाहिए', 'कहीं भी निर्भय होकर जाना चाहिए', 'कुछ भी छिपाकर नहीं खुलकर करना चाहिए', 'दूसरों के आगे झुकने की प्रवृत्ति नहीं होना चाहिए'. पिताजी की ऐसी ही अनेक बातें हैं जिन्होंने वंदना जी के जीवन को प्रभावित किया है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे यही सब बातें उनके जीवन में बैठ गई हों. बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के हिमायती श्री गोयल जी ने वंदना सहित सभी बच्चों की पढ़ाई में कभी आर्थिक अवरोध नहीँ आने दिया. अपने पिता जी को आदर्श और प्रेरणा स्रोत मानने वाली वंदना जी के अनुसार उनको प्रारंभ में डायरी लिखने का शौक था. पढ़ने में रुचि होने के कारण शालेय जीवन में ही उन्होंने महादेवी, निराला और द्विवेदी जी को तो पढ़ा ही, घर में हिन्दी-इंग्लिश की पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों को भी हमेशा पढ़ती रहीं. वंदना जी यहाँ पर अपनी चचेरी बहन और सहेली मीनाक्षी का नाम लेना नहीं भूलती, जो उनकी साहित्यिक गतिविधियों में सदैव साथ रहती थी. यही सब कालांतर में उनके साहित्यिक लेखन का आधार बना. आज भी वंदना जी को रामायण, भगवत गीता, चैतन्य चरित्र आदि पढ़ने का शौक है. पुराने गीत ग़ज़ल सुनने और अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करना उनकी आदत में शामिल है. मूलतः कविताओं में गहरी रुचि होने के कारण ही आज वे काव्य लेखन में गहनता ला सकी हैं. आपके लेखन में नारी-पीड़ा, सामाजिक विद्रूपताओं, शृंगार, विरह एवं प्रेरक विषयों का समावेश बखूबी देखने को मिलता है. वंदना जी स्वयं को हमेशा साधारण कहलाना ही पसंद करती हैं. खुद में अपनी ही विशेषताओं को ढूँढना सबसे मुश्किल बताते हुए उनका कहना है कि इंसान को वेद-पुराणों, श्रेष्ठ पुस्तकों एवं महापुरुषों द्वारा बताए गये मार्ग पर अच्छाई के सहारे अग्रसर होना चाहिए. घमंड के स्थान पर स्वाभिमानी चरित्र अंगीकृत करना चाहिए जो स्वयं की अलग पहचान बनता है. सामाजिक, पारिवारिक और राजनैतिक स्तर के अवमूल्यन सहित आज आपसी रिश्तों की अविश्वसनीयता ने भी उन्हें बहुत दर्द दिए हैं, लेकिन वे ये भी कहती हैं कि बावजूद इन सबके दुनियादारी का निर्वहन करना ही पड़ता है, भले ही किसी रिश्ते की ज़रूरत उतनी सिद्दत से महसूस न हो. संयम, विवेक और परिस्थितियों का सामना करने के हौसले ने आज उन्हें समाज में संतोषप्रद प्रतिष्ठा प्रदान की है. धार्मिक आस्था वाली वंदना जी अपने सुखमयी जीवन को ईश्वर का प्रतिफल एवं 'मुझसे किसी का बुरा न हो' वाक्य को जिंदगी का मूलमंत्र मानती हैं.
ब्लाग और साहित्य लेखन के बारे में उन्होंने बताया कि वे मन में उत्पन्न भाव और उद्वेलन को कागज पर करीने से उकेरने और समेटने का उपक्रम करती हैं। स्वांतः सुखाय लिखा गया उनका साहित्य अंशतः भी किसी को खुशी देता है तो वे अपने आप को धन्य मानती हैं और यदि किसी को दुख पहुँचाए तो उन्हें भी पीड़ा होगी, क्योंकि वे अपने लेखन से किसी अन्य की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहतीं. अंतरजाल (इंटरनेट) लेखन पर आने का श्रेय वे अपनी बेटी ' भामिनी ' को देती हैं जिसने बताया कि ब्लाग लेखन और विभिन्न उपयोगी वेब साइट्स के माध्यम से मन वांछित अध्ययन तथा मेल-जोल भी बढ़ाया जा सकता है जो जीवन को बहुआयामी ऊँचाई प्रदान करता है , बस उसकी बातों को ध्यान में रखकर ही वंदना जी का रुझान इस ओर बढ़ा. वे कहती हैं कि मैने कभी सोचा भी नही था की ब्लाग लेखन करते करते मुझे इतने अनमोल मोती प्राप्त होंगे. आज वंदना जी के दो ब्लाग 'ज़ख़्म' http://redrose-vandana.blogspot.com/ और 'ज़िंदगी' http://vandana-zindagi.blogspot.com/ ब्लाग जगत में उनकी प्रतिभा का दर्पण बने हुए हैं. इन ब्लागों में उनकी रचनाओं और साहित्यिक गतिविधियों को देखा जा सकता है.

आज (०८ जून २००९) वंदना जी को उनके जन्म दिवस पर उनके यशस्वी जीवन और साहित्य शिखर की ओर निरंतर अग्रसर होने की शुभकामनाएँ।

- डॉ विजय तिवारी "किसलय"

आज हम यहाँ पर उनकी रचना "उम्र के पड़ाव" आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।
उम्मीद है पाठकों को पसंद आएगी।
उम्र के पड़ाव
उम्र के इक पड़ाव पर
सब कुछ अच्छा लगता है
साथी का हर अंदाज़
निराला लगता है
हर खामी भी
इक अदा सी लगती है


उम्र के अगले पड़ाव पर
सब कुछ बदलने लगता है
साथी का सादा वक्तव्य भी
शूल सा चुभने लगता है
शब्दों के रस की जगह
अब ज़हर सा घुलने लगता है


उम्र के आखिरी पड़ाव पर
कुछ भी न अच्छा लगता है
साथी की तो बात ही क्या
अपना साथ भी न अच्छा लगता है
कभी दिल बच्चा बनने लगता है
कभी उम्र का बोझ बढ़ने लगता है
उम्र के इस पड़ाव पर
कोई न चाहत होती है
सिर्फ़ खामोशी होती है
और इंतज़ार ...
एक खामोश पल का ...
- वंदना गुप्ता


प्रस्तुति :-
- विजय तिवारी " किसलय "

Friday, June 5, 2009

आदरणीय कन्हैया लाल ताम्रकार, जबलपुर की गजल पढें और सुनें.

आज हम आप से परिचय करा रहे हैं जबलपुर के वरिष्ठ शायर श्री कन्हैया लाल ताम्रकार जी से। आपका गजल संग्रह "दीवानगी" संस्कारधानी जबलपुर एवं मध्यप्रदेश में बेहद सराहा गया। अभी ४ जून को अपना ७५ वाँ जन्म दिन मना चुके आदरणीय ताम्रकार जी आज भी साहित्यिक एवं आध्यात्मिक चिंतनरत रहते हैं. आज हम आप को उनकी सद्य प्रस्फुटित गजल उनकी ही आवाज में आपको सुना रहे हैं।
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......... ग़ज़ल ............
मैंने पूछा रिंद से क्यों बरबाद कर दी जिंदगी
दिल के हर गोशे में तूने यों ही भर दी तीरगी

आह भर कर ये कहा टूटे हुए दिल-गीर ने
आँसू भी बहते नहीं जब टूट जाता दिल कभी

दिल के अरमां एक दिन उसने बयां ऐसे किये
था वो किसी और का बर्क़ मेरे दिल पर गिरी

मैंने चाहा था उसे ऐसे मेरे जज़्बात थे
भूलना जितना भी चाहा बढ़ती गई तिश्नगी

जानते हैं आप इन्सां दिल के हाथों मजबूर है
जाता है वह मयखाने को वह जब टूटती है दोस्ती

आप ही कहिये मियां क्या प्यार करना जुर्म है
मैं समझता हूँ की उल्फत है खुदा की बंदगी

उस बुते दिल-गीर का अहसां "कन्हैया" मानता
ग़म बढ़ा बे- इंतहा तब दिल में हो गई रोशनी

प्रस्तुति- विजय तिवारी "किसलय"



Sunday, May 31, 2009

दोहा श्रृंखला [दोहा क्र. ५८ से ६३]

गरमी में व्याकुल सभी, धरा हुई बेनूर
पर,श्रम करने धूप में, श्रमिक सदा मजबूर

रवि किरणें जब धरा पर,उगलें चहुँदिश आग
ठाँव बनें पशु, खगों के, झाड़, पेड़, वन-बाग़

जेठ मास में दोपहर, हो जाती सुनसान
तृण, तरु, झाडी, सूखते, वन होते वीरान

दिन भर लू-लपटें चलें, दूभर होती रैन
साधनहीन गरीबजन, पायें कैसे चैन

गरमी के संत्रास से, पीड़ित हो इंसान
शीतल छाया ढूँढता, जैसे पेड़, मकान

गरमी गर आती नहीं, मेघ बनाता कौन?
इस छोटे से प्रश्न पर, क्यों होते हो मौन?

-विजय तिवारी "किसलय"

उपरोक्त दोहों को मेरी आवाज़ में सुनने के लिए

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-विजय तिवारी " किसलय "

Saturday, May 30, 2009

किसलय की कवितायें

मेरी आवाज़ में मेरी कुछ कवितायें सुनें ......

Thursday, May 21, 2009

महा मृत्युंजय मन्त्र