मंगलवार, 25 नवंबर 2008

हमारी लोक संस्कृति और जनमानस में बसा चाँद

चंद्रमा और लक्ष्मी दोनों ही समुद्रमंथन से निकले होने के कारण भाई-बहन कहलाये। विष्णु हमारे जगत पिता और लक्षी हमारी जगत माता हैं। लक्ष्मी के भाई चंद्रमा हमारे मामा हुए , इसी कारण पूरा हिंदू-विश्व चाँद को "चन्दा मामा" कहता है .
अन्तरिक्ष में पृथ्वी के सबसे निकट होने के कारण चाँद अपनी चांदनी और अनेक विशेषताओं के कारण प्राणिजगत का अभिन्न अंग है । चाँद के घटते-बढ़ते स्वरूप को हम चंद्रकलाएँ कहते हैं, और इन्ही कलाओं या स्थितियों को हमारे प्राचीन गणितज्ञों एवं ज्योतिषाचार्यों ने चाँद पर आधारित काल गणना विकसित की . प्रतिपदा से चतुर्दशी होते हुए अमावस्या अथवा पूर्णिमा तक दो पक्ष माने गए . शुक्ल और कृष्ण दो पक्ष मिलकर एक मास बनाया गया है. आज हिंदू समाज के सभी संस्कार अथवा कार्यक्रम इन्ही तिथियों के अनुसार नियत किए जाते हैं . आज भी धार्मिक श्रद्धालु एवं समस्त ग्रामीण काल गणना और अपने अधिकांश कार्य चन्द्र तिथियों के अनुसार ही करते हैं . दिन में जहाँ सूर्य अपने आलोक से पृथ्वी को जीवंत बनाय हुए है , वहीं चाँद रात्रि में अपनी निर्मल चाँदनी से जन मानस को लाभान्वित करने के साथ ही अभिभूत भी करता है .
लोक संस्कृति में आज भी चाँद का महत्त्व सर्वोपरि माना जाता है । दीपावली, दशहरा, होली, रक्षाबंधन, शरद पूर्णिमा, गणेश चतुर्थी, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, सोमवती अमावस्यायें, कार्तिक पूर्णिमा, जैसे सारे व्रत या पर्व चाँद की तिथियों पर ही आधारित हैं . इनमें से शरद पूर्णिमा तो मुख्यतः चाँद का ही पर्व कहलाता है . इस दिन की चाँदनी यथार्थ में अमृत वर्षा करती प्रतीत होती है .
यदि हम समाज की बात करें तो आज भी छोटे बच्चों को चाँद की और इशारा कर के बहलाने का प्रयास किया जाता है । " चन्दा मामा दूर के , पुए पकाए बेल के " जैसे काव्य मुखड़ों से सारा समाज परिचित है . वहीं आज भी भगवान् कृष्ण जी का " मैया मैं तो चन्द्र खिलौना लैहों " कह कर माँ यशोदा से रूठ जाना किसे याद नहीं है . दूज के चाँद की सुन्दरता अनुपम न होती तो भगवान् शिव इसे अपने भाल का श्रृंगार ही क्यों बनाते तथा वे चंद्रमौली या चंद्रशेखर कैसे कहलाते . यहाँ बुन्देली काव्य की दो पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं :-

विष्णु को सारो, श्रृंगार महेश को,
सागर को सुत, लक्ष्मी को भाई .
तारन को पति, देवन को धन,
मानुष को है महा सुखदाई ॥

इन पंक्तियों में चाँद को मानव और देवताओं सभी के लिए सुखदाई बताया गया है ।

इस तरह चाँद की तुलनाएँ, उपमाएँ और सौन्दर्य वर्णन में उपयोग को देखते हुए लगता है कि यदि चाँद नहीं होता तो कवि-शायरों के पास एक विकट समस्या खड़ी हो जाती . चौदहवीं का चाँद हो, चन्दा है तू, मेरा सूरज है तू, तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी, चाँद सी महबूबा हो मेरी, य फ़िर मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी ... आदि सदाबहार गीत हम आज नहीं गुनगुना पाते ..
प्रारंभ से ही प्राणिजगत का चाँद के प्रति गहरा लगाव रहा है । यदि हम यहाँ ये कहें कि चाँद के बिना भारतीय संस्कृति अधूरी है तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी . लोग कल्पना करते थे कि चाँद पर कोई बुढिया चरखा चला रही है या झाडू लगा रही है, भले ही आज मानव चाँद पर जा चुका है पर उसकी विशेषताओं में अभी तक कोई फर्क नहीं पडा है. चाँद की शीतलता और उसका तारों भरे आकाश में शुभ्र चाँदनी बिखेरना, किसे नही भाता. मेरे ही शब्दों में :-
पर्वतों कि चोटियों पे आ के
बादलों के घूँघटों से झाँके
हो गई ये रात भी सुहानी
चाँद तेरी रौशनी को पा के ...

चाँद जहाँ सुन्दरता का प्रतीक माना जाता है, वहीं उस पर दाग होने की कमी भी गिनाई जाती है . हमारे ग्रंथों में कहीं पर तो उसे देखने से ही चोरी या कलंक का दोष लगने का कारण भी बताया गया है . इसी सन्दर्भ में स्वयं भगवान् कृष्ण द्वारा शुक्लपक्षी भाद्रपद की चतुर्थी के चाँद को देख लेने पर उनके ऊपर " स्मन्तक मणि " की चोरी का आरोप भी लगा दिया गया था, भले भी उन्होंने बाद में स्वयं को निर्दोष सिद्ध कर दिया हो . कहते है चाँदनी रात का सुरम्य , शांत और एकांतप्रिय माहौल कवि-शायरों कि साधना के लिए उपयुक्त होता है, वहीं अशांत मन के लिए शान्ति की तालाश भी की जाती है :-

एक शाम सुनसान में
चाँद था आसमान में
गुमसुम सा बैठा रहा
न जाने किस अरमान में

चलती रही शीतल पवन
रात बनी रही दुल्हन
शान्त नहीं था मेरा मन
थी अजीब सी वो उलझन .

हम लोक संस्कृति, काव्य, शायरी, चित्रकारी, धर्म, अथवा समाज कहीं की भी बात करें, चाँद हमारे करीब ही होता है. यह शत-प्रतिशत सत्य है. हम ईद के चाँद को ही ले लें या फ़िर करवा चौथ के चाँद को लें, ये कितने व्यापक और धार्मिक पर्व हैं जो चाँद के दर्शन पर ही आधारित हैं . हमारा समाज इन्हें कितनी आस्था और विश्वास के साथ मनाता है , किसी से छिपा नहीं है .
लोक संस्कृति में रचा-बसा , भगवान् शिव के मस्तिष्क पर शोभायमान , कवि-शायरों की श्रंगारिक ऊर्जा , मनुष्य और देवताओं के सुखदाई चाँद की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

-डॉ. विजय तिवारी " किसलय "
विसुलोक, मधुवन कालोनी,
उखरी रोड, जबलपुर, म. प्र.


8 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा और बहुत बेहतरीन तरीके से कहा:

    ’चाँद की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।’

    एक सुन्दर आलेख के लिए बधाई.

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  2. chand aor chandni ka mahtav
    ko aapne bahut ache shabdon se sawara hai.

    bahut acha article likha hai
    bahdai

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  3. भाई समीर जी
    सादर अभिवंदन.

    आप ने चाँद पर आधारित आलेख पढ़ा
    धन्यवाद.
    उम्मीद है, स्नेह बनाए रखेंगे .

    आपका
    विजय
    २७ नव ०८

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  4. नीरा जी
    नमस्कार
    आपने चाँद पर लिखे आलेख की प्रन्षा की,
    हम आपके आभारी है,
    आपका
    विजय

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  5. bhai mahendra mishra jee
    saadar abhivandan

    aap ne mere aalekh ki prasansha ki , achchha laga ,

    umeed hai, sneh banaye rakhenge

    aapka
    vijay tiwari "kislay "

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  6. विजय जी
    यह सच है चांद को विग्यान से कित्ना भी जोड़ ले उसका भावों से रिश्ता कम नही हो सकता .वह हमारे लिये कभी भी बस एक तथ्य बन कर नहीं रह सकता.
    बहुत सारे संदर्भो और कविता कि पंतियों से सजे इस आलेख को पढ मन आल्हादित हुआ.

    नमिता

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  7. नमिता जी
    नमस्कार
    "हमारी लोक संस्कृति और जनमानस में बसा चाँद" आलेख पर
    आपकी मन भावन टिपण्णी पाकर मुझे बेहद खुशी हुई कि
    लोग यथार्थपरक और भावनात्मक आलेख भी सूक्ष्मता से पढ़ते हैं .
    आभार
    आपका
    - विजय

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