गुरुवार, 13 नवंबर 2008

दोहा- ००१


एतबार कर परखिये,


जिन पर हो संदेह ।


शायद इस बर्ताव से ,


जीत सकें मन गेह ॥



- विजय तिवारी " किसलय "
जबलपुर

4 टिप्‍पणियां:

  1. bahot khub sahab,bahot umda bat kahi hai aapne...shandar lajawab. aapko dhero badhai ..

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  2. पंडितजी पहली बार शायद आपको टीप रहा हूँ, और इसके लिए मुआफ़ी की दरकार भी रखता हूँ. एतबार के साथ परख का बढ़िया तज्रुबा हो रहा है. सुंदर है. आगे संपर्क में रहूँगा. राजेश "प्रवीण" जी और "सुमित्र" जी को मेरा प्रणाम कहियेगा, यदि मिलते हों तो.
    आपका

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  3. नमस्कार

    उम्मीद है आप कुशल होंगे.
    आप ने मेरा ब्लॉग देखा,
    मेरा दोहा पढ़ा , अच्छा लगा .
    मैंने ये दोहा श्रृंखला शुरू की है
    इसे जारी रखना चाहूंगा.

    आपका
    विजय

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  4. [red]बवाल जी
    नमस्कार
    मेरी ओर ध्यान देने के लिए शुक्रिया
    आपने दोहा को सराहा, अच्छा लगा.
    मैंने ये दोहा श्रृंखला शुरू की है
    इसे जारी रखना चाहूंगा.

    आपका
    विजय[/red]

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