शनिवार, 8 नवंबर 2008

दृष्टिकोण

दैनिक पूजन-अर्चन के उपरांत स्वामी परमानन्द जी आज भी मठ के बाहर बैठे भिक्षुओं को खाना खिला कर अपनी आसंदी पर बैठ गए ।

उपस्थित श्रद्धालुओं के साथ स्वामी जी ने धार्मिक चर्चा प्रारंभ की ।

[विष्णु वराह मन्दिर मझौली ,जबलपुर [म.प्र]
आज हिम्मत जुटा कर सार्थक ने स्वामी जी से पूछ लिया :- - स्वामी जी ! क्या आप ऐसा मानते हैं कि बाहर बैठे उन भिक्षुओं को रोज-रोज खाना खिलाने से आपको पुण्य मिलेगा ही ?
स्वामी जी :- अवश्य मिलेगा सार्थक जी ......

सार्थक :- क्षमा करें स्वामी जी , लेकिन मुझे तो ऐसा नहीं लगता !
स्वामी जी :- ऐसा क्यों सोचते हो सार्थक जी ?
सार्थक :- क्योंकि स्वामी जी आप इन्हें इस तरह इतनी आसानी से नित्य खाना खिला कर इन्हें इनके कर्मपथ से विमुख कर रहे हैं । आप अनजाने में ही सही, इन्हें आलस्य की और प्रेरित कर रहे हैं, क्षमा करें स्वामी जी, जिसके जवाबदेह भी शायद आप ही होंगे !
सार्थक के इस दृष्टिकोण पर स्वामी जी एक गहरी सोच में पड़ गए .

- विजय तिवारी " किसलय "

1 टिप्पणी:

  1. बात तो सार्थक जी की सही है. सोचने को मजबूर करती है.

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