शनिवार, 8 नवंबर 2008

वास्तविक प्रतिष्ठा


शहर के प्रतिष्ठित सेठ राम शरण जी अक्सर स्वामी निश्छलानंद जी के आश्रम जाया करते थे । वे स्वामी जी की सद् वाणी श्रवण तो करते ही थे, साथ में आश्रम और स्वामी जी का छोटे से छोटा काम भी बड़ी तन्मयता से किया करते थे . आश्रम में आए हुए गरीब भिखारियों से लेकर सभी आगंतुकों का भी ध्यान रखते थे .

स्वामी जी के सानिध्य में उन्हें परम आनंद की प्राप्ति होती थी। राम शरण जी सदैव ही स्वामी जी के स्नेहाकांक्षी रहते थे . उनका अनुभव था कि स्वामी जी द्बारा सिर पर हाथ रखने पर उन्हें आत्मशान्ति प्राप्त होती थी.

वे चाहते तो अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप आश्रम आकर स्वामी जी का दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त का सकते थे परन्तु उनहोंने विनम्रता और सादगी वाला मार्ग ही क्यों चुना ? , इस उलझन का समाधान करते हुए उन्होंने जब मुझे बताया कि समाज में मेरी प्रतिष्ठा का रहस्य विनम्रता, सादगी, सेवा भावना एवं स्वामी जी के स्नेह में ही निहित है, क्योंकि अभिमान और सम्पन्नता का मेल समाज में मानव को वास्तविक प्रतिष्ठा नहीं दिलाते ।

उनकी इस विचारधारा से मेरा सिर उनके सामने आदर और श्रद्धा से झुक गया।


- विजय तिवारी " किसलय "

7 टिप्‍पणियां:

  1. हमारा नमन भी पहुँचायें इन महान सज्जन को. क्या आप केडिया जी की बात कर रहे हैं?

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  2. समीर भाई
    सदर अभिवंदन
    हम ,महेंद्र मिश्रा , पंकज स्वामी अक्सर आपकी याद करते रहते हैं, हमें आपके आने का भी इंतज़ार है.
    इस बार हमें कुछ सार्थक प्रयास करने हैं संस्कारधानी के साहित्यकारों के लिए ,, हमें आपका सहयोग अवश्य मिलेगा, ऐसा हम विश्वास करते हैं,
    मैं इन काल्पनिक सेठ जी को आपकी भावनाओं से जरूर अवगत कराऊंगा. निःसंदेह मैं उनसे प्रभावित हूँ
    आपने मेरे ब्लॉग पर दृष्टि डाली ,इसके लिए आभार
    आपका विजय तिवारी "किसलय"
    जबलपुर

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  3. vivek ji
    namaskaar
    laghu katha vaastavik pratishtha padhne ke liye dhanywad.
    kripya aisa hi sneh banaye rakhen
    aapka
    vijay tiwari "kislay"

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  4. bahut badhiya rochak janakari poorn prasang. vijay bhai kripya is link ko dekhe.

    http://jholtanma.blogspot.com/

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