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सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

    जबलपुर के प्रख्यात आर्टिस्ट  श्री कामता सागर जी का  दिनांक 14 अक्टूबर 17 को हृदय गति रुकने से देहावसान हो गया। ग्वारीघाट जबलपुर में अंतिम संस्कार किया गया। 
           यह भारतीय कला जगत एवं मेरी स्वयं की  अपूरणीय क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा उन्हें अपने चरणों में स्थान दे। ओम शांतिः शांतिः शांतिः।
- विजय तिवारी "किसलय"

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

मेरे अजीज अलबेला खत्री का जाना जमीन से जुड़े एक महान कलाकार का जाना है

मेरे अजीज अलबेला खत्री का जाना जमीन से जुड़े एक महान 
कलाकार का जाना तो है ही, मेरी व्यक्तिगत क्षति भी है.
ईश्वर उन्हें अपने चरणों में स्थान दे. हमारी भाव भीनी श्रद्धांजली.


( 
अलबेला जी से उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की जानकारी लेते हुए विजय तिवारी "किसलय")

-डॉ. विजय तिवारी "किसलय"


श्री गणपत भंसाली की पोस्ट से साभार --->
हास्य कवि एंव मंच संचालक अलबेला खत्री अब इस दुनिया में नहीं रहे, उनका निधन मंगलवार 8 अप्रेल 14 को दोपहर 3 बजे के करीब हो गया, फेफड़े पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाने से उन्हें सूरत के नानपुरा स्थित महावीर क्रोमा हास्पिटल के ICU विभाग में करीब सप्ताह भर पूर्व भर्ती कराया गया था, उनकी स्थिति में कोई सुधार नही होने के पश्चात आज उन्होंने अंतिम साँस ली, देश-विदेश के काव्य मंचों पर वर्षों से अपनी प्रस्तुति के द्वारा अलग पहचान बनाने वाले अलबेला खत्री 'स्टार वन चेनल' पर प्रसारित 'ग्रेट लाफ्टर' कार्यक्रम के विजेता भी रह चुके हैं, तथा अन्य चेनलों पर भी अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं। मूल गंगानगर (राजस्थान) के निवासी अलबेला खत्री अतीत में महाराष्ट्रा के मुंबई व मालेगांव जैसे शहरों में भी रह चुके हैं। कुछ वर्षों पूर्व उन्होंने सूरत में काव्य मंचो के द्वारा अपनी आजीविका प्रारम्भ की थी, शुरुआत में वे शहर के भागल विस्तार के नानावट क्षैत्र में और विगत कुछ वर्षों से अडाजण-पाल विस्तार के रामेश्वरम केम्पस स्थित अपने निजी आवास में रहते थे, परिवार में पीछे उनकी धर्मपत्नि आरती व 12 वर्षीय पुत्र आलोक हैं, उनकी अंतिम यात्रा कल 9 अप्रेल बुधवार को सुबह 7.30 बजे उनके सूरत के पाल रोड स्थित निवास स्थान से प्रारम्भ होकर जहांगीरपूरा स्थित शमशान घाट पहुंचेगी, जहां उनका दाह संस्कार किया जाएगा।

मंगलवार, 1 मई 2012

स्व.ओंकार ठाकुर ने अपनी साहित्यक सुगंध देश-देशान्तर तक फैलाई- ज्ञानरंजन

जबलपुर । स्व. ओंकार ठाकुर ने अपनी साहित्यिक सुंगध देश-देशान्तर तक फैलाई। उथल पुथल भरे सातवें दशक तक समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित स्व. ठाकुर का विज्ञान लेखन श्रेष्ठ एवं राष्ट्र स्तरीय माना जाने लगा था । अपने साहित्यिक अवदान से उन्होंने जबलपुर का नाम भारतवर्ष के मानचित्र पर पहुँचाया तदाशय के उद्गार साहित्यकार, कथाकार, उन्पन्यासकार, शिक्षाविद् स्व. ओंकार ठाकुर के श्रद्धांजलि कार्यक्रम के अवसर पर श्वेताम्बर जैन मंदिर सभागार में ज्ञानरंजन जी ने व्यक्त किए ।

स्व. श्री ओंकार ठाकुर (१५अप्रेल १९३३ से २६ अप्रेल २०१२ )
स्व. ठाकुर के परममित्र निर्मल भूरा ने कहा कि सरल, सहज एवं धर्ममय ओंकार भाई ने जीवन भर मित्रता का सही मायने में निर्वहन किया। उनका चला जाना मेरे लिए अत्यन्त व्यथापूर्ण है । निर्मल नारद ने उनसे शालेय जीवन से ही अन्तरंगता बताते हुए कहा कि उनके घर पर ही हमने मिलन संस्था का गठन किया था। डॉ. रामशंकर मिश्र ने उन्हें वैष्णव वृत्ति का कथाकार बताया तथा ठगी प्रथा पर उनके द्वारा लिखा हिंदी का प्रथम चर्चित उपन्यास पीला रूमाल की चर्चा की। भगवतीधर बाजपेयी ने कहा कि स्व. ओंकार ठाकुर जैसे उत्कृष्ट साहित्यकार का समग्र साहित्य शासन द्वारा संरक्षति किया जाना चाहिये ताकि आने वाली पीढ़ी लाभान्वित हो सके । रमेश सैनी ने उन्हें कहानी मंच का आधार स्तम्भ एवं मार्गदर्शक बताया विजय तिवारी ‘किसलय’ ने उनकी उपलब्धियाँ गिनाते हुए उन्हें विशुद्ध साहित्यकार एवं सच्चे इंसान की संज्ञा दी । डॉ. राजकुमार सुमित्र ने उनके विज्ञान सम्मत लेख एवं उत्कृष्ट संपादकीय लेखन की चर्चा की । भागचंद टाटिया ने उन्हें अहिंसावादी एवं अपरिग्रही इंसान बताया। शीतलनाथ भक्ति मण्डल के संदीप भूरा ने उन्हें मण्डल का मार्गदर्शक बताते हुए कहा कि स्व. ओंकार ठाकुर प्रोत्साहित करने में कमी नहीं करते थे।


श्रद्धांजलि सभा में डॉ.  मलय, डॉ. कुंदनसिंह परिहार, ओंकार श्रीवास्तव, इंजी.संतोष तिवारी, कामता सागर, श्याम मोहन दुबे, हरि भटनागर आदि ने भी भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी । महेश दोषी के वृहद शांति पाठ के उपरान्त स्व. ठाकुर के चित्र पर पुष्पांजलि एवं दो मिनिट मौन रखकर उनकी आत्मा की शांति हेतु प्रार्थना की गई ।


रमाकांत ताम्रकार, राजीव गुप्ता, विजय ठाकुर, निर्मल भूरा जी,
राजेन्द्र सिंह ठाकुर, द्वारका गुप्त,रमेश सैनीएवं विजय तिवारी "किसलय"
राजेश पाठक द्वारा संचालित शोकसभा में रमाकान्त ताम्रकार, राजीव गुप्ता, बसंत मिश्रा, पंकज स्वामी, राजेन्द्र दानी, कुँवर प्रेमिल, मो.मुइनुद्दीन अतहर, प्रदीप शशांक, अरुण यादव, रमाकान्त गौतम, आनंद कृष्ण, शिब्बू दादा, द्वारका गुप्त, धीरेन्द्र बाबू खरे, अरविंद गुप्ता, गुरुनाम सिंह रीहल, अशोक सोंधिया, वीरेन्द्र चौरड़िया, मनीष मेहता, राजेन्द्र पौरिया, सुरेश डागी, शरद गोलछा, ज्ञान गोलछा, सुधीर संचेती सहित परिवार के विजय ठाकुर, दिशांत ठाकुर, राजेन्द्र सिंह ठाकुर एवं नगर के अनेक स्नेही-स्वजन उपस्थित रहे।

प्रस्तुति:-
विजय तिवारी "किसलय"


शनिवार, 28 अप्रैल 2012

"फिरंगिया" और "पीला रूमाल" उपन्यासों के लेखक श्री ओंकार ठाकुर अंत तक "निर्मल" मय रहे.

मैं विगत १४ अप्रेल २०१२ यानि  उनके  जन्मदिन के एक दिन पहले सुबह- सुबह उनके घर गया और  काफी देर तक  बातें करता रहा. जैसाकि मैं उनका जन्म दिन यानी १५ अप्रेल कभी  नहीं भूलता था , इसलिए  उसी  सिलसिले में उनसे बातचीत  करता रहा. जब मैंने दादा से पूछा  किआप  कल  शाम को  क्या कर रहे  हैं , और मुझे पता चला कि वे  उपलब्ध हैं तो  मैंने  उन्हें अगले दिन अर्थात  १५ अप्रेल की शाम को आमंत्रित किया  और  शाम को  फुर्सत  होते ही एक फोन करने को कहा , ताकि मैं उन्हें  लेने  जा सकूँ.
१५  की शाम को  मैं और  राजीव  गुप्त जी  उनके  फोन का इंतज़ार करते  रहे  जब उनका  फोन नहीं  आया तो मुझे  चिता हुई , क्यों कि वे  इस समय  घर  पर  नहीं होते  और वे अपने पास मोबाईल भी नहीं रखते  तो  मैं  और  गुंजन कला सदन के  संस्थापक श्री ओंकार श्रीवास्तव जी ने उनके घर जाने का निश्चय किया. 
हमने एक किलो  उनका पसंदीदा   भुजिया सेव पेक कराया और उनके घर  जा पहुँचे  तो  देखा कि वे  छत  के ऊपर मच्छर दानी लगे  पलंग पर  आराम  कर रहे हैं. काफी देर  तक  हम लोग उनसे  बातचीत  करते रहे .
एक  ओंकार दूसरे ओंकार  से  मिलकर बहुत  खुश हुए. उस दिन उन्होंने मेरे घर  आने का  वायदा भी किया . पर  ईश्वर ने उन्हें ये  वायदा पूरा करने  नहीं दिया. २२ अप्रेल को ज्ञात  होने  पर कि उन्हें  श्वांस की तकलीफ होने  पर  अस्पताल में  भारती कराया गया है  तो  मैंने   भी अस्पताल  पहुंचा. स्वास्थ्य तो  ठीक  नहीं था लेकिन  पूर्ण  चैतन्यता थी,  काफी बातचीत कर रहे  थे .  शायद  इसी लिए   वे  अपनी जिद  पर  अगलेदिन घर  आ गए,  लेकिन जब  पुनः  २५  को  भर्ती  हुए  तो  वे  ज्यादा  अस्वस्थ्य हो गए  २६  को दोपहर  में  एक  हल्के  हृदयाघात  से  उन्हें  बचाया नहीं जा सका.
इसी दिन  शाम को स्थानीय  रानी ताल मुक्तिधाम  में  नगर  के गण्य मान जनों की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार  संपन्न हुआ.
श्री ओंकार ठाकुर के परम मित्र हैं श्री निर्मल भूरा जी. भूरा जी ईश्वर की कृपा से लब्ध-प्रतिष्ठित सामाजिक , धार्मिक व्यक्तित्व वाले  एक  सहज इंसान हैं . आपमें  कभी  गर्व  नाम  की चीज  कभी नहीं दिखी. दूसरी और एकाकी जीवन जीने वाले सामान्य परन्तु आदर्श और - गार्हस्थ्य जीवन में भी  तपस्वियों का जीवन जीने वाले ओंकार ठाकुर  जी थे.  दोनों की कृष्ण-सुदामा ( भूरा जी ऐसा नहीं मानते)  जैसी दोस्ती अंतिम दिन तक रही . मैं तो  कहना चाहूँगा कि "फिरंगिया" और "पीला रूमाल" उपन्यासों के लेखक श्री ओंकार ठाकुर अंत तक "निर्मल" मय रहे.


सन १९५१ के माडेलियन (मॉडल स्कूल से उत्तीर्ण छात्र ) एवं १९५७ के एम. एस-सी.(बाटनी) श्री ओंकार ठाकुर का जन्म १५ अप्रेल १९३३  में जबलपुर, मध्य प्रदेश में हुआ. जबलपुर को ही कर्मस्थली मान कर जीवन भर  साहित्य साधनारत रहे हैं.जीवन के ७९ वर्ष विगत १५ अप्रेल को पूरे करने वाले  श्री ठाकुर जी अंतिम समय तक  संयमित जीवन जी रहे। सन १९४८ से प्रारंभ लेखन अंतिम समय तक  अबाध गति से चलता  रहा. साहित्य शिखर की ओर बढ़ते हुए सन १९६५ की फरवरी में अपनी स्वयं की पत्रिका शताब्दी निकालना प्रारंभ किया जो जून १९८२ तक लगातार प्रकाशित होती रही. राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों की रचनाये प्रकाशित करने वाली मध्य प्रदेश की "शताब्दी" का प्रकाशन अवधि में अहम् स्थान था. साहित्य की समस्त विधाओं में पारंगत, साहित्यकार, पत्रकार, सम्पादक, कवि, उपन्यासकार, हिदी-अंगरेजी-विज्ञान के व्याख्याता एवं अनुवादक श्री ओंकार ठाकुर की रचनाएँ देश की अधिकाँश चुनिन्दा पत्रिकाओं और पत्रों में निरंतर  प्रकाशित होती  रहीं हैं. देश के जाने माने साहित्यकारों का सानिध्य प्राप्त करने वाले श्री ठाकुर सदैव  सहजता, सरलता,सादगी, सच्चाई, निश्छलता, गंभीरता एवं सहनशीलता के अनुगामी रहे .
विगत १५  अप्रेल सन २०१२ को  अपने जीवन के यशस्वी ७९  वर्ष पूर्ण कर २६ अप्रेल २०१२ को अपरान्ह ३.१० बजे अल्प अस्वस्थता के चलते सांसारिक मायाजाल से मुक्त हो  स्वर्ग सिधार गए ।
विनम्र श्रद्धांजलि  सहित हम उनकी आत्म शान्ति  हेतु ईश्वर से प्रार्थना  करते हैं.

(श्री ओंकार ठाकुर के संपादकत्व में प्रकाशित

साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं कला को समर्पित

पत्रिका " शताब्दी" का प्रवेशांक फरवरी- १९६५

तथा अंतिम अंक जून १९८२ के आवरण पृष्ठ । )


(१९७२ में प्रकाशित श्री ओंकार ठाकुर द्बारा ठग जीवन पर लिखे
गए एक सच्चे उपन्यास " फिरंगिया " का आवरण चित्र ।)

(सन १९६८ में श्री ओंकार ठाकुर अपनी माँ श्रीमती लक्ष्मी देवी के साथ।)

(सन १९५१ के श्री ओंकार ठाकुर )

- विजय तिवारी " किसलय "

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

ओंकार श्रीवास्तव "संत" की पत्नी स्व. मुन्नी श्रीवास्तव की प्रथम पुण्य तिथि दिनांक २१ अप्रेल २०१२ पर विनम्र श्रद्धांजलि.

आदरणीय ओंकार श्रीवास्तव जी
 २१ मई १९७१ को
 आदरणीया मुन्नी श्रीवास्तव को
 ब्याह कर अपने घर लाये.























 जीवन भर स्नेह, मान, मर्यादा का ध्यान रखते हुए
 सुख- दुःख के हर पल साथ- साथ बिताए. 
इनकी खुशियों में सदैव चार चाँद लगे रहे. 
पति के हर दुःख-सुख के क्षणों में 
आदरणीया मुन्नी श्रीवास्तव
 छाया की तरह साथ रहीं. 


















२७ दिसंबर २०१० को पति की खुशियों में बराबर की
 भागीदारी करते आप स्वयं देख सकते हैं. 






















अनायास अल्प बीमारी के चलते दिनांक २१ अप्रेल २०११ को 
नियति के आदेश पर ओंकार जी को अपनी स्मृतियों 
का पिटारा सौंप कर स्वर्गारोहण कर गईं. 















ओंकार जी उनकी स्मृतियों में डूबे आज जब मुझे दिखाई दिए
 तो मैं भी एक बारगी उनकी तल्लीनता देखता रह गया,
 मुझे लगा जैसे उन्हें दीन-दुनिया का होश ही नहीं था.
















 ओंकार जी अपनी पत्नी आदरणीया मुन्नी श्रीवास्तव के
 छाया चित्रों को बड़ी तनमयता से देखे जा रहे थे. 
















मैं उनसे कुछ छाया चित्र अपने साथ ले आया. 
और अपने शब्दों के माध्यम से उन्हें 
श्रद्धांजलि दे रहा हूँ:-


तुम बिन सूना मेरा जीवन 


कभी चहकता था जो आँगन, तुमको निज आँचल में पाकर 
कभी तुम्हारे धूप-दीप से, रहा सुवासित जो पूजाघर 
किया इन्हीं दृश्यों से नित ही, मेरी खुशियों में उन्मीलन 
लेकिन अब परिचित जग में भी, तुम बिन सूना मेरा जीवन 


जब तक मेरे अरमानों की, आस्तीन में साँप पले थे 
तब तक मेरी छाया बन तुम हर पग मेरे साथ चले थे 
सदा सफलता पाई हमने, राह भले थी दुर्गम-निर्जन 
है तो अब आबाद राह, पर, तुम बन सूना मेरा जीवन 


कर्मक्षेत्र की उत्प्रेरक तुम, सुख-दुःख की थीं सहभागी 
निज सुचिता से मुझे बनाया, निस्पृह मानव अनुरागी 
साथ तुम्हारे जीकर जाना, क्यों होता है श्रेष्ठ बड़प्पन 
हिय में भरी मनुजता फिर भी, तुम बिन सूना मेरा जीवन 


करूँ भला क्या? बिना तुम्हारे, क्षीण हुई इच्छाएँ सारी 
पर सौंपे दायित्व तुम्हारे, हुए "मृत्युभाव" पर भारी 
इसीलिये मैं संकल्पित हूँ, चलने सत्पथ पर आजीवन 
फिर भी आती बात जुबां पर, तुम बिन सूना मेरा जीवन 


बनी प्रेरणा स्रोत हमारी, वर्तमान की गति पहचानी 
अपनी मेधा, श्रम, विवेक से, रिश्त्तों की नई गढ़ी कहानी 
ऐसे ही  विरले लोगों का, दुनिया करती है अभिनन्दन   
पर  मेरे  अंतस से निकले , तुम बिन सूना मेरा जीवन 


- विजय तिवारी "किसलय"

रविवार, 22 मई 2011

एक ख़ुशी- एक ग़म


       प्रो. अरुण दिवाकर नाथ बाजपेयी हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त.
 


(प्रो. ए. डी. एन. बाजपेयी)

                                              रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर में पदस्थ अर्थशात्र के प्रोफ़ेसर अरुण दिवाकर नाथ बाजपेयी हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में शीघ्र ही पदभार ग्रहण करेंगे. हिमाचल प्रदेश के एक मात्र विश्वविद्यालय के कुलपति का राज्यपाल द्वारा हस्ताक्षरित नियुक्ति आदेश उन तक पहुँच चुका है. ज्ञातव्य है कि
प्रो. ए. डी. एन. बाजपेयी एक समय अवधेश प्रताप सिंह रीवा विश्वविद्यालय सहित चित्रकूट विश्वविद्यालय का दोहरा कार्यभार सम्हाल चुके हैं. ओजस्वी व्यक्तित्व एवं विशिष्ट कार्यशैली के कारण वे सदैव भीड़ से हटकर दिखाई दिए हैं. अर्थशास्त्र जैसे जटिल विषय के महारथी होने के साथ ही प्रो. बाजपेयी एक अच्छे साहित्यकार और कवि भी हैं. मुझे ख़ुशी है कि मुझे उनका सानिध्य प्राप्त हुआ है.  उनके सुरीले कंठ और भावाभिव्यक्ति का मैं कायल हूँ. संस्कारधानी जबलपुर ऐसे व्यक्तित्व को चिरस्मृतियों में रखेगा.  हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय  के कुलपति बनने पर उन्हें हिंदी साहित्य संगम जबलपुर की अशेष
शुभ भावनाएँ.

                   कुछ दिन पूर्व मेरे द्वारा रिकार्ड की गयी प्रो. अरुण दिवाकर नाथ बाजपेयी की एक कविता आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है:-


रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के पूर्व कुलपति प्रो. आशुतोष श्रीवास्तव का निधन
 
(प्रो. आशुतोष श्रीवास्तव)
              रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के पूर्व कुलपति प्रो. आशुतोष श्रीवास्तव कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे. दिनांक २१ मई ११ को उनके निधन से संस्कारधानी  जबलपुर का शिक्षा, साहित्य एवं उर्दु जगत स्तब्ध रह गया. प्रो. श्रीवास्तव जबलपुर के पूर्व महापौर एवं वरिष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय श्री पन्नालाल श्रीवास्तव "नूर" के सुपुत्र थे. यह क्रूर नियति का कहर ही कहलायेगा कि उनके अनुज श्री विश्वतोश श्रीवास्तव (ओम जी ) का पिछले रविवार दिनांक १५ मई २०११ को अचानक हुए हृदयाघात से निधन हुआ है.
               प्रो. श्रीवास्तव रा. दु. वि. वि. जबलपुर के रसायनशास्त्र विभागाध्यक्ष थे. कुछ समय पूर्व उन्हें रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के कुलपति का प्रभार सौंपा जाना उनकी अपनी विलक्षण प्रतिभा का ही परिचायक था.  

( विजय तिवारी "किसलय" एवं प्रो. आशुतोष श्रीवास्तव)
                                   प्रो. श्रीवास्तव को फारसी, और उर्दु साहित्य का गहन ज्ञान होने के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी पर भी बराबर नियंत्रण था. इनकी अद्भुत प्रतिभा को साहित्य और शिक्षा जगत सदैव याद रखेगा.



       मैं स्वयं उनकी अभिवक्ति, लहजे और शब्द सामर्थ्य का हमेशा प्रशंसक रहा हूँ. मैं जानता हूँ कि जबलपुर वासी अपने अजीज "आशुतोष" की कमी एक लम्बे अरसे तक महसूस करेंगे. हिंदी साहित्य संगम जबलपुर की उन्हें विनम्र  श्रद्धांजली.


प्रस्तुति-
















डॉ. विजय तिवारी "किसलय"




गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

अद्भुत प्रतिभा और शब्दों के जादूगर आदरणीय शैलेन्द्र जी हिन्दी कवियों में एक नायाब नगीना थे.

                                  ७१  वर्षीय मेरे अग्रज सम्माननीय श्री शैलेन्द्र डग मेरे मोहल्ले में ही रहते  थे.  मेरे घर पर अक्सर उनका आना होता था.  उनके आगमन का मतलब ही मैं मानने लगा था कि उस दिन मुझे उनकी नई कविता सुनने मिलेगी. एक कागज की पर्ची,  उसमें तीन चार अंतरे की कोई रचना, लेकिन शब्दों में कहीं काटा-पीटी नहीं. डग साहब  सदा कहते थे कि मैं लिखने के बाद कभी काटता नही हूँ और बिना किसी काट छाँट के लिखी गई उनकी कविता का   रसास्वादन करने वाला मैं पहले व्यक्तियों में से हुआ करता  था.  सीधा - सरल,  निश्छल व्यक्तित्व को अपने घर में पाकर मैं अपने को गौरवान्वित पाता था.  मैं उनकी लेखनी और उनके शब्द विन्यास का कायल हूँ.  अक्सर मुझे उनकी कविताओं के साथ-साथ उनसे उनके संस्मरण भी सुनने मिलते रहे  हैं.  हिन्दी, उर्दू, बांगला और अंग्रेजी जानने वाले शैलेन्द्र डग जी का बचपन लखनऊ में लखनवी अंदाज़ में गुज़रा.  नीरज जी उनके परिचित एवं स्नेही होने के कारण वे अक्सर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में बताते थे.  अनेक बार गोष्ठियों में डग जी को उनका सानिध्य प्राप्त हुआ है.  उन्होंने बताया था  कि वे (डग जी) अभी कुछ वर्ष पहले अपने घरलू कार्य से इंदौर  गए हुए थे।  शाम को नीरज जी के प्रोग्राम की ख़बर लगते ही  वे भी वहाँ पहुँच कर दर्शक दीर्घा में जाकर कार्यक्रम सुनने लगे.  कार्यक्रम के दौरान जैसे ही नीरज जी की नज़र उनके ऊपर पड़ी तो उन्होंने तुंरत डग सा'ब को अपने पास बुलाया और उनसे भी काव्यपाठ कराया . ऐसे  शैलेन्द्र जी जैसे लोग और उनके गीतों  में  सार ढूँढने वाले  लोगों की  हिन्दी संसार में कमी नहीं है.  अद्भुत  प्रतिभा और शब्दों के जादूगर आदरणीय शैलेन्द्र जी  हिन्दी कवियों में  एक नायाब नगीना थे . 
                              अभी दो-चार दिन पहले ही मेरे बेटे सुविल ने मुझे फिर से बताया था कि-  पापा,  डग अंकल को देख आना उनकी तबियत ठीक नहीं है.  दशहरा की व्यस्तता के कारण मैंने सोचा था कि फुर्सत से अवकाश के दिन उनके पास जाऊँगा. बस इसी ढील ने मुझे अंतिम बार उन्हें  देखने से वंचित कर दिया. इसका अफ़सोस मुझे जीवन भर रहेगा.  कल दिनांक २० अक्टूबर की रात को मैं इन्टरनेट पर बैठा ब्लोगिंग  कर रहा था.  देर रात मेरे मित्र का फ़ोन आया.  फोन पर इंजीनियर देवेन्द्र "देवेश" ने जब बताया कि 'श्री शैलेन्द्र डग आज शाम को नहीं रहे' तब से ही अनमना महसूस कर रहा हूँ.  आज सुबह ही मैं उनके घर गया.  आज कार्यालय जाने का मन ही नहीं किया.  अंतिम संस्कार की श्रद्धांजलि सभा में भी मेरी नाम आँखें एक अजीब से खालीपन को देख रहीं थी जिसे इन शब्दों में बयां करना संभव नहीं है.  अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करते हुए  मैंने जो कुछ कहा वे मेरी आत्मीयता भरे शब्द थे,  लेकिन मैं उनकी ही चंद पंक्तियाँ काव्यांजलि स्वरूप सुनाने से स्वयं को नहीं रोक पाया जो उन्होंने कभी दूसरे के लिए लिखीं थी:- 
सखे !
तुम्हारे स्पंदन में
करुणा-व्यथा
अपार छिपी थी
फिर भी-
तेरे जीने का
अंदाज़ निराला...
पंचतत्व में लीन
भले नश्वरता ओढी
साहित्य जगत की
अमर निधि को
कोई नहीं भूलने वाला.

प्रस्तुति:-







- विजय तिवारी " किसलय "

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

जबलपुर का सपूत, कादंबिनी का यशस्वी दूत अब नहीं रहा.


मध्य प्रदेश की साहित्यिक नगरी जबलपुर , जहाँ हिन्दी के अनेक गण्यमान लेखक कवि और चिंतक पैदा हुए । अपनी कर्म भूमि बनाई । विश्व में जबलपुर की कीर्ति पताका फहराई, उनमें 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ' कविता की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान,व्यंग्य विधा के जनक हरिशंकर परसाई, रामेश्वर शुक्ल अंचल, महर्षि महेश योगी, आचार्य रजनीश ओशो, सेठ गोविनदास, भवानी प्रसाद तिवारी के बाद भी लंबी शृंखला है जिसे लिखना स्वयं जबलपुर की बड़ाई करना कहा जाएगा। मैं तो ये सूचित करना चाह रहा था कि इसी माटी में पैदा होकर पल- बढ़ कर पत्रकार और लेखक के रूप में जबलपुर को अनूठी पहचान दिलाने वाले, कादंबिनी के यशस्वी संपादक श्री राजेन्द्र अवस्थी जी कल दिनांक 30 दिसंबर 2009 को लंबी बीमारी के बाद हमसे बहुत दूर चले गये, जिसे हिन्दी जगत एक लंबे कालखंड तक स्मरण रखेगा। नवभारत दैनिक से अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत करने वाले राजेन्द्र अवस्थी का जन्म 25 जनवरी 1930 को हुआ था . प्रारंभ से ही प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी होने के कारण सदैव कुछ नयी सोच उनके जेहन में उठा करती थी जिसे वे कार्यरूप में परणित करने उतावले रहते थे, शायद अपनी अभिव्यक्ति और अपनी भावनाओं को मूर्तरूप देने का साधन उन्हें पत्रकारिता के अलावा और कोई दूसरा अच्छा नहीं लगा. और चल पड़े इसी राह पर. कादंबिनी में रहते हुए उन्होने अनेक देशों की यात्राएँ की. यात्रा विवरणों से पाठकों को अवगत कराया. पर्यटन स्थलों की जानकारी हो या फिर साहित्यिक पुरोधाओं की बात, कादंबिनी में इन्हें बहुत स्थान दिया गया , आपके संपादकीय जीवन में कादंबिनी के तन्त्र- मंत्र विशेष अंकों को जितनी लोकप्रियता मिली उससे कहीं अधिक उनके " काल चिंतन " को सराहा गया. जबलपुर में उनका आना यदा कदा ही होता था, मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे उनका सानिध्य प्राप्त हुआ है, मैने उन्हें जितनी बार देखा मुझे वे सदैव मुस्कराते हुए ही दिखे, उनका हँसमुख चेहरा और उनकी विनोद मयी बातें आज भी बरबस याद आती हैं. जबलपुर के अनेक लेखकों से उनके स्नेहिल संबंध थे. बुन्देली लेखिका श्रीमती सुधा रानी श्रीवास्तव को उनका " भौजी " कह कर पुकारना और नोकझोंक करना आज भी याद है. जबलपुर के एक- दो साहित्यिक कार्यक्रमों में मैने उन्हें देखा है, और उनकी अभिव्यक्ति भी सुनी है. आज जब उनके निधन का समाचार ज्ञात हुआ तो ऐसा लगा कि जबलपुर का एक अहम पत्रकारीय और साहित्यिक स्तंभ नहीं रहा. हमारी हार्दिक संवेदनाएँ और श्रद्धांजलि जबलपुर की माटी के सपूत को.

- विजय तिवारी " किसलय "



सोमवार, 5 जनवरी 2009

जबलपुर के साहित्य समाज ने दिवंगत डॉ श्री राम ठाकुर दादा को श्रद्धांजलि अर्पित की

संस्कारधानी जबलपुर के साहित्य समाज ने आज दिनांक ०४ जन २००९ को संध्या ५.३० बजे "सुमित्र निवास " कोतवाली पर विगत २९ दिसम्बर-०८ को दिवंगत डॉ श्री राम ठाकुर दादा को श्रद्धांजलि अर्पित की ।
उपस्थित साहित्यकारों ने "दादा " के बहुआयामी व्यक्तित्व को लेकर अपने-अपने संस्मरण सुनाये .
सरल, सहृदयी, मिलनसार, हितचिन्तक, सामाजिक एवं साहित्यिक दोनों ही जीवन को समान रूप से जीने वाले, हर घटनाओं से अनुभव प्राप्त करने वाले जैसे गुणों का उल्लेख सभी ने किया .
श्रद्धांजलि सभाध्यक्ष प्रो जवाहर लाल चौरसिया "तरुण" सहित डॉ कुंदन सिंह परिहार, डॉ राज कुमार सुमित्र, श्री शिव प्रसाद शुक्ल "शिब्बू दादा " , रमेश सैनी, अतहर जी, प्रभात दुबे , धीरेन्द्र बाबु खरे, राजेश पाठक " प्रवीण", विजय तिवारी "किसलय", आनंद कृष्ण , कृष्ण कुमार चौरसिया "पथिक", मोहन लोधिया, कुँवर प्रेमिल, प्रदीप शशांक, सुश्री गीता गीत, " पत्रिका जबलपुर" के संजय तिवारी, डॉ श्री राम ठाकुर "दादा" के पुत्र राज कुमार ठाकुर आदि गण्यमान नागरिक उपस्थित रहे।
इस अवसर पर टोरंटो, कनाडा से गृह नगर जबलपुर आए श्री समीर लाल ने भी डॉ श्री राम ठाकुर दादा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि दादा जैसे व्यक्तित्व की झलक कहीं न कहीं मेरे साहित्य में भी मिलती है और ऐसे व्यक्तित्व से प्रभावित होना सहज है. मैं हिन्दी के माध्यम से ही अपने देश , अपनी भाषा से जुड़ा रह सकता हूँ.ऐसी मेरी सोच है.
अंत में दादा की आत्मशान्ति के लिए कुछ पल मौन रह कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई.
- विजय तिवारी "किसलय "

श्री समीर लाल "टोरंटो " का शोक सभा में वक्तव्य