शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

मोहल्ले, पड़ोस से दूरियाँ बनाते लोग

शुक्रवार, 11 फरवरी 2022 दिनांकित दैनिक समाचार पत्र 'स्वतंत्र मत' के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख "मोहल्ले, पड़ोस से दूरियाँ बनाते लोग" आप सबके लिए- (सहज पठनीयता हेतु मूल आलेख संलग्न) मोहल्ले, पड़ोस से दूरियाँ बनाते लोग एक समय था जब गाँव या मोहल्ले के एक छोर की गतिविधियाँ अथवा सुख-दुख की बातें दो चार-पलों में ही सबको पता चल जाती थीं। लोग बिना किसी आग्रह के मानवीय दायित्वों का निर्वहन किया करते थे। तीज-त्यौहारों, भले-बुरे समय, पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में एक परिवार की तरह एक साथ खड़े हो जाते थे। आज हम पड़ोसियों के नाम व जाति-पाँति तक जानने का प्रयास नहीं करते। मुस्कुराहट के साथ अभिवादन करना तथा हाल-चाल पूछने के बजाय हम नज़रें फेरकर या सिर झुकाये निकल जाते हैं, फिर मोहल्ले वालों की बात तो बहुत दूर की है। उपयोगी व आवश्यक कार्यवश ही लोगों से बातें होती हैं। हम पैसे कमाते हैं और उन्हें पति-पत्नी व बच्चों पर खर्च करते हैं, अर्थात पैसे कमाना और अपने एकल परिवार पर खर्च करना आज की नियति बन गई है। रास्ते में किसका एक्सीडेंट हो गया है। पड़ोसी खुशियाँ मना रहा है अथवा उसके घर पर दुख का माहौल है, आज लोग उनके पास जाने की छोड़िए संबंधित जानकारी लेने तक की आवश्यकता नहीं समझते। आज मात्र यह मानसिकता सबके जेहन में बैठ गई है कि जब पैसे से सब कुछ संभव है तो किसी के सहयोग की उम्मीद से संबंध क्यों बनाये जाएँ। पैसों से हर तरह के कार्यक्रमों की समग्र व्यवस्थाएँ हो जाती हैं। बस आप कार्यक्रम स्थल पर पहुँच जाईये और कार्यक्रम संपन्न कर वापस घर आ जाईये। जिसने हमें बुलाया था, जिनसे हमें काम लेना है, बस उन्हें प्राथमिकता देना है। इन सब में परिवार, पड़ोस और मोहल्ले सबसे पिछले क्रम में होते हैं। जितना हो सके, इन सब से दूरी बनाये रखने का सिद्धांत अपनाया जाता है। आज हम सभी देखते हैं कि जब कार्ड हमारे घर पर पहुँचते हैं, तब जाकर पता चलता है कि उनके घर पर कोई कार्यक्रम है। यहाँ तक कि जब भीड़ एकत्र होना शुरू होती है तब पता चलता है कि आस-पड़ोस के अमुक घर में किसी सदस्य का देहावसान हो गया है। आज लोग शादी में दूल्हे-दुल्हन को, बर्थडे में बर्थडे-बेबी को महत्त्व न देकर डिनर को ही प्राथमिकता देते हैं। मृत्यु वाले घर से मुक्तिधाम तक शवयात्रा में शामिल लोग व्यक्तिगत, राजनीतिक वार्तालाप, यहाँ तक कि हँसी-मजाक में भी मशगूल देखे जा सकते हैं, उन्हें ऐसे दुखभरे माहौल से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। आजकल अधिकांशतः लोग त्योहारों में घरों से बाहर निकलना पसंद नहीं करते। होली, दीपावली जैसे खुशी-भाईचारा बढ़ाने वाले पर्वों तक से लोग दूरियाँ बनाने लगे हैं। आज बुजुर्ग पीढ़ी यह सब देखकर हैरान और परेशान हो जाती है। उन्हें अपने पुराने दिन सहज ही याद आ जाते हैं। उन दिनों लोग कितनी आत्मीयता, त्याग और समर्पण के भाव रखते थे। बड़ों के प्रति श्रद्धा और छोटों के प्रति स्नेह देखते ही बनता था। बच्चों को तो अपनों और परायों के बीच बड़े होने पर ही अंतर समझ में आता था। पड़ोसी और मोहल्ले वाले हर सुख-दुख में सहभागी बनते थे। यह बात एकदम प्रत्यक्ष दिखाई देती थी कि पड़ोसी पहले पहुँचते थे और रिश्तेदार बाद में। कहने का तात्पर्य यह है कि आपका पड़ोसी आपके हर सुख-दुख में सबसे पहले आपके पास मदद हेतु खड़ा होता था। वाकई ये बहुत गंभीर मसले हैं। ये सब अचानक ही नहीं हुआ। इस वातावरण तक पहुँचने का भी एक लंबा इतिहास है। बदलते समय और बदलती जीवन शैली के साथ शनैः शनैः हम अपने बच्चों और पति-पत्नी के हितार्थ ही सब करने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। संयुक्त परिवार और खून के रिश्तों की अहमियत धीरे-धीरे कम होती जा रही है। लोग संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार में अपने हिसाब से रहना चाहते हैं। ज्यादा कमाने वाला सदस्य अपनी पूरी कमाई संयुक्त परिवार में न लगाकर अपने एकल परिवार की प्रगति व सुख सुविधाओं में लगाता है। अपनी संतान का सर्वश्रेष्ठ भविष्य बनाना चाहता है। संयुक्त परिवार के सुख-दुख में भी हिसाब लगाकर बराबर हिस्सा ही खर्च करता है। इन सब के पीछे हमारे भोग-विलास और उत्कृष्ट जीवनशैली की बलवती अभिलाषा ही होती है। हम इसे ही अपना उद्देश्य मान बैठे हैं, जबकि मानव जीवन और दुनिया में इससे भी बड़ी चीज है दूसरों के लिए जीना। दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ना। यह भी अहम बात है कि हमने जब किसी की सहायता नहीं की, हमने जब अपने खाने में से किसी भूखे को खाना नहीं खिलाया। हमने जब किसी गरीब की मदद ही नहीं की। और तो और जब इन कार्यो से प्राप्त खुशी को अनुभूत ही नहीं किया तब हम कैसे जानेंगे कि परोपकार से हमें कैसी खुशी और कैसी संतुष्टि प्राप्त होती है। यह भी सच है कि आज जब हम अपने परिजनों के लिए कुछ नहीं करते तब परोपकार से प्राप्त खुशी कैसे जानेंगे। एक बार यह बात बिना मन में लाए कि अगला आदमी सुपात्र है अथवा नहीं, आप नेक इंसान की तरह अपना कर्त्तव्य निभाते हुए किसी भूखे को खाना खिलाएँ। किसी गरीब की लड़की के विवाह में सहभागी बनें। किसी पैदल चलने वाले को अपने वाहन पर बैठाकर उसके गंतव्य तक छोड़ें। किसी विपत्ति में फँसे व्यक्ति को उसकी परेशानी से उबारिये। बिना आग्रह के किसी जरूरतमंद की सहायता करके देखिए। किसी बीमार को अस्पताल पहुँचाईये। सच में आपको जो खुशी, संतोष और शांति मिलेगी वह आपको पैसे खर्च करने से भी प्राप्त नहीं होगी। आज विश्व में भौतिकवाद की जड़ें इतनी मजबूत होती जा रही हैं कि हमें उनके पीछे बेतहाशा भागने की लत लग गई है। हम अपने शरीर को थोड़ा भी कष्ट नहीं देना चाहते और यह भूल जाते हैं कि हमारा यही ऐशो-आराम बीमारियों का सबसे बड़ा कारक है। ये बीमारियाँ जब इंसान को घेर लेती हैं तब आपका पैसा पानी की तरह बहता रहता है और बहकर बेकार ही चला जाता है। आप पुनः नीरोग जिंदगी नहीं जी पाते। आप स्वयं ही देखें कि समाज में दो-चार प्रतिशत लोग ही ऐसे होंगे जो पैसों के बल पर नीरोग और चिंता मुक्त होंगे। हमारी वृद्धावस्था का यही वह समय होता है जब हमारे ही बच्चे, हमारा ही परिवार हमारी उपेक्षा करता है। हमने जिनके लिए अपना सर्वस्व अर्थात ईमान, धर्म और श्रम खपाया वही हमसे दूरी बनाने लगते हैं। यहाँ तक कि हमें जब इनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है वे हमें वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। अब आप ही चिंतन-मनन करें कि यदि आपने अपने विगत जीवन में अपनों से नेह किया होता। पड़ोसियों से मित्रता की होती। कुछ परोपकार किया होता तो इन्हीं में से अधिकांश लोग आपके दुख-दर्द में निश्चित रूप से सहभागी बनते। आपकी कुशल-क्षेम पूछने आते। आपकी परेशानियों में आपका संबल बढ़ाते रहते, जिससे आपका ये शेष जीवन संतुष्टि और शांति के साथ गुजरता। समय बदलता है। जरूरतें बदलती हैं। बदलाव प्रकृति का नियम है।आपकी नेकी, आपकी भलाई, आपकी निश्छलता की सुखद अनुभूति लोग नहीं भूलते। लोग यथायोग्य आपकी कृतज्ञता ज्ञापित अवश्य करते। आपके पास आकर आपका हौसला और संबल जरूर बढ़ाते। हम मानते हैं कि आज का युग भागमभाग, अर्थ और स्वार्थ के वशीभूत है। ऐसे में किसी से सकारात्मक रवैया की अपेक्षा करना व्यर्थ ही है। इसलिए क्यों न हम ही आगे बढ़कर भाईचारे और सहृदयता की पहल करें। फिर आप ही देखेंगे कि उनमें भी कुछ हद तक बदलाव अवश्य आएगा और यदि इस पहल की निरन्तरता बनी रही तो निश्चित रूप से मोहल्ले, पड़ोस से दूरियाँ बनाते लोग दिखाई नही देंगे साथ ही हम पड़ोसियों और मोहल्ले वालों से जुड़कर प्रेम और सद्भावना का वातावरण निर्मित करने में निश्चित रूप से सफल होंगे। 
 -डॉ विजय तिवारी 'किसलय' जबलपुर

रविवार, 20 दिसंबर 2020

74 वर्ष से प्रगति का यह कैसा राग?

             स्वतंत्रता के सही मायने तो स्वातंत्र्यवीरों की कुरबानी एवं उनकी जीवनी पढ़-सुनकर ही पता लगेंगे क्योंकि शाब्दिक अर्थ उसकी सार्थकता सिद्ध करने में असमर्थ है। देश को अंग्रेजों के अत्याचारों एवं चंगुल से छुड़ाने का जज्बा तात्कालिक जनमानस में जुनून की हद पार कर रहा था। यह वो समय था जब देश की आज़ादी के समक्ष देशभक्तों को आत्मबलिदान गौण प्रतीत होने लगे थे। वे भारत माँ की मुक्ति के लिए हँसते-हँसते शहीद होने तत्पर थे। ऐसे असंख्य वीर-सपूतों के जीवनमूल्यों का महान प्रतिदान है ये हमारी स्वतन्त्रता, जिसे उन्होंने हमें 'रामराज्य' की कल्पना के साथ सौंपा था। माना कि नवनिर्माण एवं प्रगति एक चुनौती से कम नहीं होती? हमें समय, अर्थ, प्रतिनिधित्व आदि सब कुछ मिला लेकिन हम संकीर्णता से ऊपर नहीं उठ सके। हम स्वार्थ, आपसी कलह, क्षेत्रीयता, जातीयता, अमीरी-गरीबी के मुद्दों को अपनी-अपनी तराजू में तौलकर बंदरबाँट करते रहे। देश की सुरक्षा, विदेशनीति और राष्ट्रीय विकास के मसलों पर कभी एकमत नहीं हो पाए।

               आज केन्द्र और राज्य सरकारें अपनी दलगत नीतियों के अनुरूप ही विकास का राग अलापती रहती हैं। माना कि कुछ क्षेत्रों में विकास हो रहा है, लेकिन यहाँ भी महत्त्वपूर्ण यह है कि विकास किस दिशा में होना चाहिए? क्या एकांगी विकास देश और समाज को संतुलित रख सकेगा? क्या शहरी विकास पर ज्यादा ध्यान देना गाँव की गरीबी और भूख को समाप्त कर सकेगा? क्या मात्र देश की आतंरिक मजबूती देश की चतुर्दिक सीमाओं को सुरक्षित रख पाएगी? क्या हम अपने अधिकांश युवाओं का बौद्धिक व तकनीकि उपयोग अपने देश के लिए कर पा रहे हैं? हम तकनीकि, विज्ञान, चिकित्सा, अन्तरिक्ष आदि क्षेत्रों में आगे बढ़ें। बढ़ भी रहे हैं लेकिन क्या इसी अनुपात से अन्य क्षेत्रों में भी विकास हुआ है? क्या वास्तव में गरीबी का उन्मूलन हुआ है? क्या ग्रामीण शिक्षा का स्तर समयानुसार ऊपर उठा है? क्या ग्रामीणांचलों में कृषि के अतिरिक्त अन्य पूरक उद्योग, धंधे तथा नौकरी के सुलभ अवसर मिले हैं? क्या अमीरी और गरीबी के अंतर में स्पष्ट रूप से कमी आई है? क्या जातीय और क्षेत्रीयता की भावना से हम ऊपर उठ पाए हैं? यदि हम ऐसा नहीं देख पा रहे हैं तो इसका सीधा सा आशय यही है कि हम जिस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं वह स्वतंत्रता के बलिदानियों और देश के समग्र विकास के अनुरूप नहीं है।

               आज राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी सोच एवं नीतियाँ बनाना अनिवार्य हो गया है, जो शहर-गाँव, अमीर-गरीब, जाति-पाँति, क्षेत्रीयता-साम्प्रदायिकता के दायरे से परे समान रूप से अमल में लाई जा सकें। आज पुरानी बातों का उद्धरण देकर बहलाना या दिग्भ्रमित करना उचित नहीं है। अब सरकारी तंत्र एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा असंगत पारंपरिक सोच बदलने का वक्त आ गया है। जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक हम नहीं बदलेंगे और जब हम नहीं बदलेंगे तो राष्ट्र कैसे बदलेगा? आज देश को विश्व के अनुरूप बदलना नितांत आवश्यक हो गया है। देश में उन्नत कृषि हो, गाँव में छोटे-बड़े उद्योग हों, शिक्षा, चिकित्सा, सड़क-परिवहन और सुलभ संचार माध्यम ही ग्रामीण एवं शहर की खाई को पाट सकेंगे। आज भी लोग गाँवों को पिछड़ेपन का पर्याय मानते हैं। आज भी हमारे जीवन जीने का स्तर अनेक देशों की तुलना में पिछड़ा हुआ है। ऐसे अनेक देश हैं जो हमसे बाद में स्वतंत्र हुए हैं या उन्हें राष्ट्र निर्माण के लिए कम समय मिला है, फिर भी आज वे हम से कहीं बेहतर स्थिति में हैं, इसका कारण सबके सामने है कि वहाँ के जनप्रतिनिधियों द्वारा अपने देश और प्रजा के लिए निस्वार्थ भाव से योजनाबद्ध कार्य कराया गया है।

               आज स्वतन्त्रता के 74 वर्षीय अंतराल में कितनी प्रगति किन क्षेत्रों में की गई यह हमारे सामने है। अब निश्चित रूप से हमें उन क्षेत्रों पर भी ध्यान देना होगा जो देश की सुरक्षा, प्रतिष्ठा और सर्वांगीण विकास हेतु अनिवार्य हैं। आज देश की जनता और जनप्रतिनिधियों की सकारात्मक सोच ही देश की एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान कर सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु कोई दबाव, कोई भूल या कोताही क्षम्य नहीं होना चाहिए। आज बेरोजगारी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार जैसी महामारियों के उपचार तथा प्रतिकार हेतु सशक्त अभियान की महती आवश्यकता है। गहन चिंतन-मनन और प्रभावी तरीके से निपटने की जरूरत है। इस तरह आजादी के इतने बड़े अंतराल के बावजूद  देश की अपेक्षानुरूप कम प्रगति के साथ ही सुदृढ़ता की कमी भी हमारी चिंता को बढाता है। आईये आज हम "सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा" को चरितार्थ करने हेतु संकल्पित हो आगे बढ़ें।







-विजय तिवारी 'किसलय'

   जबलपुर

      

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

हमको ऐसा देश, चाहिये

हमको ऐसा देश, चाहिये
 
नैनों में हो, नेह समाया, 
सद्गुण हो, सबका आभूषण 
निश्छलता अपनाने वाले, 
कर्मठ मनुज, विशेष, चाहिये
हमको ऐसा देश, चाहिये
         ... .....✴️..... 
स्वाभिमान हर, माथे दमके, 
राष्ट्रप्रेम, हो सबके अंतस 
धर्म-कर्म, की अलख जगाने,
गीता के उपदेश, चाहिये 
हमको ऐसा देश, चाहिये
        ... .....✴️..... 
आतंकी, खल, दुर्धर्षों का,
कर डालें, अब पूर्ण सफाया।
सीमा पर, मर-मिटने वाले, 
भावों का उन्मेष, चाहिये।।
हमको ऐसा देश, चाहिये
        ... .....✴️..... 
स्थिरता हो, अनुशासन हो, 
देशप्रगति, की रहे लालसा 
औद्योगिक, तकनीकि क्रांति का,
वृहद, नवल,परिवेश, चाहिये
हमको ऐसा देश, चाहिये
       ........✴️..... 
प्रतिभाओं के, सदुपयोग से,
हो भविष्य, युवकों का उज्ज्वल।
रोजगार, देने संकल्पित, 
शिक्षा में संदेश, चाहिये, 
हमको ऐसा देश चाहिये
      ... .....✴️..... 
भगवद्गीता, वेद-ऋचायें,
भारत की, बहुमूल्य विरासत।
संस्कार, आदर्श, ज्ञान का,
बहुआयामी वेश, चाहिये।।
हमको ऐसा देश चाहिये
           . .....✴️..... 
 
 
 - डॉ. विजय तिवारी 'किसलय' 
 

 

80 साल पुरानी पथरी को सिर्फ 5 मिनट में हमेशा हमेशा के लिए खत्म करने का अ...

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

विसुधा सेवा समिति जबलपुर ( NGO ) द्वारा लगातार जरूरतमंदों को भोजन व खाद्यान्न वितरण



कोविड-19 के चलते लॉकडाउन अवधि में "विसुधा सेवा समिति" द्वारा जो जरूरतमंदों को नियमित भोजन, खाद्यान्न, मास्क आदि निश्छल भाव से उपलब्ध कराए जा रहे हैं, इस कार्य की कृतज्ञता हेतु  शब्द भी कम पड़ेंगे। समिति के समर्पित सदस्यों द्वारा जो साहस, उत्साह और सेवाभाव दिखाई दे रहा है, वह प्रणम्य है। इतिहास में ये सब दर्ज हो रहा है। आगे आने वाली पीढ़ी के लिए ये कार्य प्रेरणास्रोत बनेंगे, उन्हें ये संस्कार मिलें, आखिर यही तो हर माता-पिता भी चाहते हैं। आज जब समिति ने यह कार्य करने का बीड़ा उठाया है, जिसकी सराहना करते कोई भी नहीं थकता, तब इससे पीछे हटना तो मुमकिन नहीं है, परन्तु निजी सुरक्षा एवं सामाजिक दूरी का भी ध्यान रखा जाना उतना ही जरूरी है।


बुधवार, 4 दिसंबर 2019

मेरी पोती "आव्या" (मेसु)

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

डायनामिक संवाद टी वी पर व्यंग्यम् की व्यंग्य गोष्ठी सम्पन्न।

डायनामिक संवाद टी वी पर व्यंग्यम् की व्यंग्य गोष्ठी सम्पन्न

डायनामिक संवाद टी वी, जबलपुर प्रारम्भ से साहित्यिक गतिविधियों को प्रमुखता से जनता के समक्ष प्रस्तुत करता आ रहा है। संस्कारधानी के कवि हों, कथाकार हों, शायर हों, नाटककार हों अथवा व्यंग्यकार। सभी साहित्यकारों को उनकी प्रतिभा दुनिया के सामने लाने का दायित्व यह डायनामिक संवाद टी वी बखूबी निर्वहन कर रहा है।
आज संस्था "व्यंग्यम" से सम्बद्ध व्यंग्यकारों की व्यंग्य रचनाओं को डायनमिक संवाद टी वी ने चलचित्रांकन किया।
प्रख्यात सहित्यविद डॉ. राजकुमार सुमित्र जी की अध्यक्षता एवं डॉ. हर्ष कुमार तिवारी के संयोजकत्व
 में व्यंग्यम् की गोष्ठी सम्पन्न हुई।
 सर्वप्रथम यशोवर्धन पाठक ने व्यंग्य 'निरीक्षण सरकारी अस्पताल का' प्रस्तुत किया। इसके पश्चात विवेक रंजन श्रीवास्तव ने 'मातादीन के इंस्पेक्टर बनने की कहानी', राकेश सोहम ने वर्चुअल मानसून, एन. एल. पटेल ने आतंकवाद, प्रतुल श्रीवास्तव ने मुझे गिरफ्तार करवा दो, अभिमन्यु जैन ने ब्यूटीपार्लर, कुमार सोनी ने गुड़ और गुलगुला, गुप्तेश्वर द्वारका गुप्त ने दूबरे और दो अषाढ़, ओ. पी. सैनी ने 'और स्तीफा दे दिया', रमेश सैनी ने हॉर्स ट्रेडिंग प्रायवेट लिमिटेड व्यंग्य प्रस्तुत किया।

अंत में व्यंग्य गोष्ठी के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रख्यात साहित्यकार डॉ. राजकुमार सुमित्र ने "अथ मुगालता कथा" व्यंग्य प्रस्तुत किया।
गोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकार शरदचद्र उपाध्याय, विजय तिवारी "किसलय", मेहेर प्रकाश उपाध्याय, कृष्ण कुमार चौरसिया पथिक, गोपाल कृष्ण चौरसिया मधुर विशेष रूप से उपस्थित रहे। 




रविवार, 6 जनवरी 2019

डॉ.विजय तिवारी की 'किसलय के काव्य सुमन " का समीक्षात्मक गीत

डॉ विजय तिवारी "किसलय" जबलपुर द्बारा रचित "किसलय के काव्य सुमन" की ८४ कविताओं के ३३ शीर्षकों को लेकर मैंने उक्त कृति की काव्यात्मक विवेचना की है, जिसमें निम्न शीर्षकों को शामिल किया गया हैः-

१ मानवता, २ मान, ३ संकल्प, ४ शुभचिन्तक, ५जीवन के पथ पर, ६ सृष्टि संचालक, ७ परहित धर्म, ८ सबके मन होंगे आनंद, ९ सफलता की सीढ़ी, १० जीवन के पल, ११ सीख, १२ क्रांतिवीर, १३ श्रम-पूजा, १४ कर्म साधक, १५ बंधु-भाव, १६ प्रगति-शिखर, १७ लक्ष्य, १८ गुण-दोष टटोल, १९ मातृभूमि, २० विश्व का ताज़, २१ स्वर्णिम वसुन्धरा, २२ पुष्प, २३ मन से मन का मिलन, २४ सुनहरे सपने, २५ बिन सजना के कुछ न भाये, २६ लहरों पर लहरें, २७ फलदायक, २८ भावना, २९ जिन्दगी, ३० उत्कर्ष, ३१ स्मृति, ३२ नन्ही परियाँ, ३३ नदी नाव और नाविक।
(डॉ विजय तिवारी "किसलय")


किसलय के काव्य सुमन - सृजन गीत


किसलय के काव्य सुमनआत्मानंद

शब्द सहज उपजा दें अमृतानद 

मानवता, मान, संकल्प, शुभचिन्तक

जीवन के पथ पर सृष्टि संचालक
परहित धर्म, सबके मन होंगे आनंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद


सफलता की सीढ़ी,जीवन के पल सीख

क्रांतिवीर, श्रम-पूजा से लोपित भीख
कर्म साधक, बंधु-भाव चेतनानंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद


प्रगति-शिखर लक्ष्य हित गुण-दोष टटोल

मातृभूमि, विश्व का ताज़ अनमोल
स्वर्णिम वसुन्धरा, पुष्प उपवनानंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद


मन से मन का मिलन, सुनहरे सपने

बिन सजना के कुछ न भायें गहने
लहरों पर लहरें पावन प्रेमानंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद


फलदायक भावना, जिन्दगी उत्कर्ष

स्मृति, नन्ही परियाँ, हर्ष ही हर्ष
नदी नाव और नाविक स्वजनानंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद
- अंशलाल पन्द्रे, जबलपुर

सोमवार, 19 नवंबर 2018

कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है

नीरज जी का लिखा  
मेरा प्रिय गीत जिसे 
बचपन से लेकर 
अभी तक कभी भूला नहीं :-

कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है।

मैं न बँधा हूँ देश काल की,
जंग लगी जंजीर में
मैं न खड़ा हूँ जाति−पाँति की,
ऊँची−नीची भीड़ में
मेरा धर्म न कुछ स्याही,
−शब्दों का सिर्फ गुलाम है
मैं बस कहता हूँ कि प्यार है,
तो घट−घट में राम है
मुझ से तुम न कहो कि मंदिर,
−मस्जिद पर मैं सर टेक दूँ
मेरा तो आराध्य आदमी,
− देवालय हर द्वार है
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

कहीं रहे कैसे भी मुझको,
प्यारा यह इन्सान है,
मुझको अपनी मानवता पर,
बहुत-बहुत अभिमान है,
अरे नहीं देवत्व मुझे तो,
भाता है मनुजत्व ही,
और छोड़कर प्यार नहीं,
स्वीकार सकल अमरत्व भी,
मुझे सुनाओ तुम न स्वर्ग
-सुख, की सुकुमार कहानियाँ,
मेरी धरती सौ-सौ स्वर्गों,
से ज्यादा सुकुमार है।
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

मुझे मिली है प्यास विषमता,
का विष पीने के लिए,
मैं जन्मा हूँ नहीं स्वयँ-हित,
जग-हित जीने के लिए,
मुझे दी गई आग कि इस
तम में, मैं आग लगा सकूँ,
गीत मिले इसलिए कि घायल,
जग की पीड़ा गा सकूँ,
मेरे दर्दीले गीतों को,
मत पहनाओ हथकड़ी,
मेरा दर्द नहीं मेरा है,
सबका हाहाकार है ।
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

मैं सिखलाता हूँ कि जिओ औ',
जीने दो संसार को,
जितना ज्यादा बाँट सको तुम,
बाँटो अपने प्यार को,
हँसो इस तरह, हँसे तुम्हारे,
साथ दलित यह धूल भी,
चलो इस तरह कुचल न जाये,
पग से कोई शूल भी,
सुख न तुम्हारा सुख केवल,
जग का भी उसमें भाग है,
फूल डाल का पीछे, पहले,
उपवन का श्रृंगार है।
कोई नहीं पराया मेरा, घर सारा संसार है ।।

-विजय तिवारी "किसलय"

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

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