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शनिवार, 8 मार्च 2014

गुलाब गेंग का प्रोमोशनल साँग जबलपुर की चैताली ने गाया

       जबलपुर में प्रतिभाओं की कमी नहीं हैइसका एक और उदाहरण जबलपुर की चैताली श्रीवास्तव हैं, जिन्होंने अभी  रिलीज हुई फिल्म गुलाब गेंग का प्रोमोशनल गाना  'मौज की मल्हारें' गाया है. संगीतज्ञ राजेश रोशन के सहायक और उस्ताद राहत फ़तेह अली खान के बिजनेस मेनेजर रहे चित्रेश श्रीवास्तव की बेटी चैताली ने इस गाने के  हिंदी भाग को साधु सुशील तिवारी के साथ गाया है वहीं अंग्रेजी भाग को कनाडा की सुपर वूमेन लिली ने स्वर दिया है.


         श्री पी. ए. दीपक और जॉन स्टेवार्ट की प्रशंसा करते हुए चैताली ने बताया  कि इन्होंने मेरी प्रतिभा को देख कर ही  रा-वन के निर्देशक अनुभव सिन्हा को इस गाने के लिए मेरा नाम सुझाया और मुझे खुशी है कि मैं उनकी अपेक्षाओं पर खरी उतरी. कुछ समय पूर्व चैताली का एक अंग्रेजी गाना  'आई विल नेव्हर लेट यू गो' अंतरराष्ट्रीय कलाकार एकॉन ने अपनी वेब साईट पर रिलीज किया है . इण्डियन क्लासिकल तथा वेस्टर्न सांग्स में पारंगत होने के साथ साथ ट्रिनिटी कॉलेज लन्दन द्वारा प्रामाणिक गायिका चैताली अभी तक अनेक लाईव शो और इला अरुण के साथ म्यूजिक प्ले कर चुकी हैं.  आशा भोसले एवं इंग्लिश सिंगर बेयोंसे को अपना आदर्श मानने वाली चैताली बालीवुड में गायिका के रूप अपना स्थान बनाने प्रयासरत हैं. लगन, निष्ठा और इनकी प्रतिभा को देखते हुए संस्कारधानी को इनसे बहुत अपेक्षाएँ हैं.

प्रस्तुति- 












डॉ. विजय तिवारी 'किसलय' 

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

जनाब अनवारे इस्लाम के सात दोहे


मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के जनाब  अनवारे इस्लाम बड़े अदब से लिया जाने वाला एक ऐसा नाम है, जो उर्दू और हिंदी साहित्य की गंगा-जमुनी विधा को एक साथ पिरोये हुए है.  आप  द्वैमासिक हिंदी-उर्दू की साहित्यिक पत्रिका के माध्यम से साहित्य की सेवा में निरंतर  लगे हुए हैं. आपकी चाहे गज़लें हों, दोहे हों अथवा गद्य-पद्य का लेखन हो, हर रचनाओं में समाज  से  जुड़ाव  के साथ साथ समाज की विद्रूपताओं का खुलासा दिखाई देता है.  आपकी रचनाओं में विचारशीलता भी  स्पष्ट दिखाई पड़ती है. 

 आज हम आदरणीय अनवारे इस्लाम के सात  दोहे आपके  समक्ष प्रस्तुत  कर  रहे हैं:-  


गुलदानों को फ़िक्र है, सूख गए क्यों फूल.
अलमारी   हैरान सी,  अन्दर   तक   है  धूल..

बंजारा   जीवन मिला,   टूटी नहीं   थकान.
नीड़ लिए हम चोंच में,  भरते रहे उड़ान..

जीने  की  है  लालसा,  जिद्दी  मिरा  सुभाव.
जीवन गहरी झील है, मैं कागज़ की नाव..

सूरज ने इतना पिया, सूख गए सब ताल.
पड़े   हुए  हैं   रेत  पर,  मछुआरों   के   जाल..

नींद न आई रात भर, खटकी एक-इक बात.
सर पर दिन का कर्ज था, खूब चुकाया  रात..

कब तक करें मनौतियाँ, कब तक फूल चढ़ाएँ.
विश्वासों     के    रेशमी,    धागे   टूट    न    जाएँ..

नाप   रहे हैं  रास्ते,  धूप  में  नंगे  पैर.
बैठे हैं जो छाँव में, या रब उनकी खैर..













-विजय तिवारी "किसलय"