गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

अद्भुत प्रतिभा और शब्दों के जादूगर आदरणीय शैलेन्द्र जी हिन्दी कवियों में एक नायाब नगीना थे.

                                  ७१  वर्षीय मेरे अग्रज सम्माननीय श्री शैलेन्द्र डग मेरे मोहल्ले में ही रहते  थे.  मेरे घर पर अक्सर उनका आना होता था.  उनके आगमन का मतलब ही मैं मानने लगा था कि उस दिन मुझे उनकी नई कविता सुनने मिलेगी. एक कागज की पर्ची,  उसमें तीन चार अंतरे की कोई रचना, लेकिन शब्दों में कहीं काटा-पीटी नहीं. डग साहब  सदा कहते थे कि मैं लिखने के बाद कभी काटता नही हूँ और बिना किसी काट छाँट के लिखी गई उनकी कविता का   रसास्वादन करने वाला मैं पहले व्यक्तियों में से हुआ करता  था.  सीधा - सरल,  निश्छल व्यक्तित्व को अपने घर में पाकर मैं अपने को गौरवान्वित पाता था.  मैं उनकी लेखनी और उनके शब्द विन्यास का कायल हूँ.  अक्सर मुझे उनकी कविताओं के साथ-साथ उनसे उनके संस्मरण भी सुनने मिलते रहे  हैं.  हिन्दी, उर्दू, बांगला और अंग्रेजी जानने वाले शैलेन्द्र डग जी का बचपन लखनऊ में लखनवी अंदाज़ में गुज़रा.  नीरज जी उनके परिचित एवं स्नेही होने के कारण वे अक्सर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में बताते थे.  अनेक बार गोष्ठियों में डग जी को उनका सानिध्य प्राप्त हुआ है.  उन्होंने बताया था  कि वे (डग जी) अभी कुछ वर्ष पहले अपने घरलू कार्य से इंदौर  गए हुए थे।  शाम को नीरज जी के प्रोग्राम की ख़बर लगते ही  वे भी वहाँ पहुँच कर दर्शक दीर्घा में जाकर कार्यक्रम सुनने लगे.  कार्यक्रम के दौरान जैसे ही नीरज जी की नज़र उनके ऊपर पड़ी तो उन्होंने तुंरत डग सा'ब को अपने पास बुलाया और उनसे भी काव्यपाठ कराया . ऐसे  शैलेन्द्र जी जैसे लोग और उनके गीतों  में  सार ढूँढने वाले  लोगों की  हिन्दी संसार में कमी नहीं है.  अद्भुत  प्रतिभा और शब्दों के जादूगर आदरणीय शैलेन्द्र जी  हिन्दी कवियों में  एक नायाब नगीना थे . 
                              अभी दो-चार दिन पहले ही मेरे बेटे सुविल ने मुझे फिर से बताया था कि-  पापा,  डग अंकल को देख आना उनकी तबियत ठीक नहीं है.  दशहरा की व्यस्तता के कारण मैंने सोचा था कि फुर्सत से अवकाश के दिन उनके पास जाऊँगा. बस इसी ढील ने मुझे अंतिम बार उन्हें  देखने से वंचित कर दिया. इसका अफ़सोस मुझे जीवन भर रहेगा.  कल दिनांक २० अक्टूबर की रात को मैं इन्टरनेट पर बैठा ब्लोगिंग  कर रहा था.  देर रात मेरे मित्र का फ़ोन आया.  फोन पर इंजीनियर देवेन्द्र "देवेश" ने जब बताया कि 'श्री शैलेन्द्र डग आज शाम को नहीं रहे' तब से ही अनमना महसूस कर रहा हूँ.  आज सुबह ही मैं उनके घर गया.  आज कार्यालय जाने का मन ही नहीं किया.  अंतिम संस्कार की श्रद्धांजलि सभा में भी मेरी नाम आँखें एक अजीब से खालीपन को देख रहीं थी जिसे इन शब्दों में बयां करना संभव नहीं है.  अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करते हुए  मैंने जो कुछ कहा वे मेरी आत्मीयता भरे शब्द थे,  लेकिन मैं उनकी ही चंद पंक्तियाँ काव्यांजलि स्वरूप सुनाने से स्वयं को नहीं रोक पाया जो उन्होंने कभी दूसरे के लिए लिखीं थी:- 
सखे !
तुम्हारे स्पंदन में
करुणा-व्यथा
अपार छिपी थी
फिर भी-
तेरे जीने का
अंदाज़ निराला...
पंचतत्व में लीन
भले नश्वरता ओढी
साहित्य जगत की
अमर निधि को
कोई नहीं भूलने वाला.

प्रस्तुति:-







- विजय तिवारी " किसलय "

4 टिप्‍पणियां:

  1. Oh!Aaj akhbaar padhe nahee aur mai swayam is baat se anjaan rahee!
    Afsos,ke wo nahee rahe! Mere behad pasandeeda shayaron me se ek the.Meree or se vinamr shaddhanjali.Is ghaav ko sahne kee eeshwar aapko shaktee de yahee dua hai.

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  2. ईश्वर स्वर्गीय शैलेन्द्र डग की आत्मा को शान्ति प्रदान करे एवं उनके इस असह्य दुःख को सहन करने की शक्ति दे.
    हमारी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.
    - विवेचना
    विवेचना राष्ट्रीय नाट्य समारोह जबलपुर

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  3. ईश्वर स्वर्गीय शैलेन्द्र डग जी की आत्मा को शान्ति प्रदान करे एवं उनके इस असह्य दुःख को सहन करने की आपको शक्ति दे.
    हमारी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि.
    आप जो दर्द इस वक्त महसूस कर रहे होंगे उसे मै समझ सकती हूँ ………………

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  4. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें ... डग साहब को शायद मैंने कहीं देखा है ? ...

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