मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

साहित्य एवं संस्कृति-रथ के सारथी - डॉ सुमित्र

डॉ राजकुमार सुमित्र के २५ अक्तूबर २००९ को मनाये गये बहत्तरवें जन्मदिवस से उन स्वयंभू बुद्धजीवियों, लेखकों, पत्रकारों, साहित्यकारों को कुछ लेना-देना नहीं है जिन्हें संस्कृत के एक सुभाषित में पुच्छ विषाणहीन कहा गया है। महानगर होने के भ्रम में डूबे जबलपुरिया अब उस एहसास को जी पाने मेँ असमर्थ हैं जिसे विनोबा भावे ने २७ दिसम्बर १९६० को संस्कारधानी कहकर सम्बोधित किया था। दिमाग की कारा में ढकेलने वाले नव साम्राज्यवाद के बाजार की आँधी मेँ जीवन मूल्य ताश के महल से ढह रहे हैं और इंसानियत के संस्कार तिनकों जैसे हवा में उड़ रहे हैं। इस झंझावात में भी संस्कृति के प्रति अडिग आस्था से भरे सिरफिरे साहित्य, कला, संस्कृति एवं समाजसेवा का दीप जलाये रखने के लिये स्वयं तिलतिल कर जलते रहे हैं । कतरा कतरा पिघल रहे हैं। जबलपुर में इस बिरादरी के अग्रदूत के रूप में बेहिचक लिया जा सकने वाला नाम डॉ राजकुमार सुमित्र का है। सन १९६० के आसपास समर्थ कवियों और साहित्यकारों की पीढियों से गौरवान्वित होते आ रहे जबलपुर में संभावना से भरी नवोदित काव्य प्रतिभाओं से डॉ सुमित्र जी जैसे हस्ताक्षर अलग नजर आने लगे थे। प्रतीक, भावबोध, बिम्ब विधान, शब्दावली के साँचे में डॉ सुमित्र जी ने परिपक्वता का स्पर्श कर लिया था। उनके रचना कर्म में नैरन्तर्य विकास यात्रा की दिशा का परिचायक था। डॉ सुमित्र जी की कविताओं का प्रवाह छंद की द्रोणी और छंद के तटबंध तोड़कर भी चलता रहा। उनका पहला संग्रह संभावना की फसल हिन्दी जगत में राष्ट्र स्तर पर चर्चित हुआ फिर और संग्रह भी निकले लेकिन अकेले अपना रचना कर्म उन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा था।
हिन्दी साहित्याकाश में जबलपुर का परचम फहराते रहने की दिशा में डॉ सुमित्र जी का समर्पण सदैव स्मरणीय रहेगा । प्रतिभाओं को पहचानने, संवारने, तराशने और प्रकाश में लाने के लिये ऐसे साहित्य प्रेमी का सामने आना वांछनीय था जिसे दूसरों का सृजन अपने सृजन से ज्यादा प्यारा हो। जबलपुर के साहित्यकारों के विकास के लिये हमेशा तत्पर साहित्यविद स्व. नर्मदा प्रसाद खरे पर शोध प्रबंध लिखकर डॉ सुमित्र जी ने डॉक्टरेट प्राप्त की । उनके पास प्रतिभाओं को संवारने उनके प्रकाशन कार्य के लिये पर्याप्त साधन नहीं थे, पर लगन थी और सहयोग जुटाने की अपनी क्षमता का संबल । इस कार्य के सुचारू संपादन हेतु डॉ सुमित्र जी ने पाथेय प्रकाशन शुरु किया। डॉ सुमित्र जी अक्षर-ब्रह्म की साधना में निमग्न ब्राह्मण हैं, पर इस साधना के वैश्वानर को आहुति देने के लिये अंक-ब्रह्म की साधना आवश्यक है। कुओं में बाँस डालने और पापड़ बेलने की कोटि का कार्य है अंक-ब्रह्म की साधना। इसके लिये व्यक्ति का प्रवीण होना आवश्यक है। संयोग की बात है कि डॉ सुमित्र जी को इसके लिये राजेश पाठक "प्रवीण " मिल गये। दौड़ धूप में प्रवीण के उत्साह और सक्रियता को डॉ सुमित्र जी का दिशादर्शन मिला तो मणि कांचन योग बना। उसमें अभिसिञ्चित होकर पाथेय का पौधा मौलश्री वृक्ष बना। एक दीप से दूसरा दीप प्रज्ज्वलित होता गया। नगर में साहित्य, कला, संस्कृति की सुरभि के निकुञ्ज बन गये। उनकी छाया में सर्वग्रासी बहुरूपी प्रदूषणों से त्रस्त मन-मस्तिष्क को राहत और विश्रान्ति मिलने लगी। बचपन से संघर्षों की गोद में पले डॉ सुमित्र जी अपने ललाट पर अंतिम सांस तक संघर्ष का आलेख लिखाकर लाये हैं। संघर्ष को वे अपना सौभाग्य मानते हैं .
रामेश्वर शुक्ल "अंचल" की पंक्तियाँ उन्हें निरंतर प्रेरणा प्रदान करती हैं -
संघर्ष मनुज है जाग्रत पौरुष की अविरलता का स्वर है। विश्वास बड़ा है सपने से, सघर्ष सुखों से बढ़कर है ..... डॉ सुमित्र जी ने सुविधाजीवी आकांक्षाओं से स्वयं को दूर रखा। अपने हित को बहुजन हिताय - बहुजन सुखाय के पाथेय में समावेशित किया और थोड़े में गुजारा होता है का गीतकार शैलेन्द्र जी का जीवनमंत्र अपनाकर सुख, शांति संतोष की चिरंतन अनुभूति प्राप्त की। उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ विकार मुक्त हैं। मन प्राण सजग और कार्यश्रम । तन मन धन से ब्राह्मण इस कर्मयोगी की स्वस्थ और सुदीर्घ पारी के लिये संस्कारधानी की अमित शुभकामनायें.
प्रस्तुति -
-विजय तिवारी " किसलय "


(दैनिक अग्रदूत में प्रकाशित यायावर के आलेख का संक्षिप्त एवं परिवर्धित रूप, आभार सहित)

6 टिप्‍पणियां:

  1. rajkumar sumitra ji ke bare mein jankar achcha laga.........shukriya.

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  2. डॉ.राजकुमार सुमित्र जी का संस्मरण बढ़िया रहा।
    आभार!

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  3. dr rajkumar ji ka sansmaran kafi achchha raha .jiski wazah se nayi jaankaariyaa bhi hame mili jiske liye aabhari hain .aese guru jano ka samman jaroori hai inhe visaarana nahi chahiye .

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  4. Dr.Rajkumar ji ki hi tarah Hindi ki seva karne ki lagan kash sabhi Hindi premiyo ko bhi ho to Hindi ki dasha aur disha sudhar jaati.

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  5. डाँ० राजकुमार सुमिञ का पारस स्प‍‌‍र्श रुपी दरवार साहित्य के पॄति लगाव रखने वालों के लिए वह संगम है जिसमें हर कोई अपने आपको परिपूर्ण होने को तत्पर रहता है मैनें व्यकितगत तौर पर यह अवसर जबलपुर में रहने के दौरान पा‌या उनका साहित्य के लिए जीवन वाकई समर्पित है

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