रविवार, 9 अगस्त 2009

दोहा श्रृंखला [दोहा क्र. ६७]


जहाँ न भगिनी को मिले,
निज भ्राता से मान ।

उस घर में कहलायेगा,
राखी का अपमान ॥
- किसलय

12 टिप्‍पणियां:

  1. bahut badhiya likha hai .........bhai bahan ke rishte ko bakhubi bayan kiya hai

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  2. 'जहाँ न भगिनी को मिले,
    निज भ्राता से मान ।
    उस घर में कहलायेगा,
    राखी का अपमान ॥'

    - बिलकुल सच.

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  5. apki rachna bahut achchhi lagi.badhai!

    rachna ka prabhav neeche de raha hoon. anyatha na len please.

    जहाँ न भगिनी को मिले,निज भ्राता से मान
    उस भ्राता का घर लगे, जैसे हो शमशान
    जैसे हो शमशान, भूला अपनी भगिनी को
    दुष्ट मानव समझा सब कुछ अपनी पत्नी को
    दिनों दिन बढ़ रहा रिश्तों का अपमान यहाँ
    कैसे नहीं होगा अपमान चले पत्नी की जहाँ

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  7. आज के दौर में रक्षा बंधन को कुद संक्रीर्ण विचारों वाले लोगो धागो का सौदा भर कर दिया है, उसी भाव को व्‍य‍क्‍त कर रही आपकी यह लघु कविता।

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