रविवार, 7 जून 2009

वंदना गुप्ता - धर्म, साहित्य और संस्कारों की त्रिवेणी. (जन्म दिवस पर विशेष )

दिल्ली के गोयल परिवार की सबसे छोटी बेटी वंदना गुप्ता कंप्यूटर में डिप्लोमा प्राप्त स्नातक हैं. माँ-बाप की सबसे चहेती, बचपन में नटखट स्वाभाव वाली वंदना के साहित्यिक , धार्मिक, आध्यात्मिक और गहन विचारक बनाने की पृष्टभूमि में कई घटनाएँ और परिस्थितियाँ रही हैं. माँ श्रीमती रूपवती की ममता और धार्मिक प्रवृत्ति ने उनको सहज, सरल और धर्मोन्मुखी बनाया. पिता स्वर्गीय श्री राधेश्याम गोयल ने एक पिता , एक शिक्षक और एक सच्चे मार्गदर्शक की भूमिका का बखूबी निर्वहन किया. 'ज़िंदगी में किसी से डरना नहीं चाहिए', 'कहीं भी निर्भय होकर जाना चाहिए', 'कुछ भी छिपाकर नहीं खुलकर करना चाहिए', 'दूसरों के आगे झुकने की प्रवृत्ति नहीं होना चाहिए'. पिताजी की ऐसी ही अनेक बातें हैं जिन्होंने वंदना जी के जीवन को प्रभावित किया है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे यही सब बातें उनके जीवन में बैठ गई हों. बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के हिमायती श्री गोयल जी ने वंदना सहित सभी बच्चों की पढ़ाई में कभी आर्थिक अवरोध नहीँ आने दिया. अपने पिता जी को आदर्श और प्रेरणा स्रोत मानने वाली वंदना जी के अनुसार उनको प्रारंभ में डायरी लिखने का शौक था. पढ़ने में रुचि होने के कारण शालेय जीवन में ही उन्होंने महादेवी, निराला और द्विवेदी जी को तो पढ़ा ही, घर में हिन्दी-इंग्लिश की पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों को भी हमेशा पढ़ती रहीं. वंदना जी यहाँ पर अपनी चचेरी बहन और सहेली मीनाक्षी का नाम लेना नहीं भूलती, जो उनकी साहित्यिक गतिविधियों में सदैव साथ रहती थी. यही सब कालांतर में उनके साहित्यिक लेखन का आधार बना. आज भी वंदना जी को रामायण, भगवत गीता, चैतन्य चरित्र आदि पढ़ने का शौक है. पुराने गीत ग़ज़ल सुनने और अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करना उनकी आदत में शामिल है. मूलतः कविताओं में गहरी रुचि होने के कारण ही आज वे काव्य लेखन में गहनता ला सकी हैं. आपके लेखन में नारी-पीड़ा, सामाजिक विद्रूपताओं, शृंगार, विरह एवं प्रेरक विषयों का समावेश बखूबी देखने को मिलता है. वंदना जी स्वयं को हमेशा साधारण कहलाना ही पसंद करती हैं. खुद में अपनी ही विशेषताओं को ढूँढना सबसे मुश्किल बताते हुए उनका कहना है कि इंसान को वेद-पुराणों, श्रेष्ठ पुस्तकों एवं महापुरुषों द्वारा बताए गये मार्ग पर अच्छाई के सहारे अग्रसर होना चाहिए. घमंड के स्थान पर स्वाभिमानी चरित्र अंगीकृत करना चाहिए जो स्वयं की अलग पहचान बनता है. सामाजिक, पारिवारिक और राजनैतिक स्तर के अवमूल्यन सहित आज आपसी रिश्तों की अविश्वसनीयता ने भी उन्हें बहुत दर्द दिए हैं, लेकिन वे ये भी कहती हैं कि बावजूद इन सबके दुनियादारी का निर्वहन करना ही पड़ता है, भले ही किसी रिश्ते की ज़रूरत उतनी सिद्दत से महसूस न हो. संयम, विवेक और परिस्थितियों का सामना करने के हौसले ने आज उन्हें समाज में संतोषप्रद प्रतिष्ठा प्रदान की है. धार्मिक आस्था वाली वंदना जी अपने सुखमयी जीवन को ईश्वर का प्रतिफल एवं 'मुझसे किसी का बुरा न हो' वाक्य को जिंदगी का मूलमंत्र मानती हैं.
ब्लाग और साहित्य लेखन के बारे में उन्होंने बताया कि वे मन में उत्पन्न भाव और उद्वेलन को कागज पर करीने से उकेरने और समेटने का उपक्रम करती हैं। स्वांतः सुखाय लिखा गया उनका साहित्य अंशतः भी किसी को खुशी देता है तो वे अपने आप को धन्य मानती हैं और यदि किसी को दुख पहुँचाए तो उन्हें भी पीड़ा होगी, क्योंकि वे अपने लेखन से किसी अन्य की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहतीं. अंतरजाल (इंटरनेट) लेखन पर आने का श्रेय वे अपनी बेटी ' भामिनी ' को देती हैं जिसने बताया कि ब्लाग लेखन और विभिन्न उपयोगी वेब साइट्स के माध्यम से मन वांछित अध्ययन तथा मेल-जोल भी बढ़ाया जा सकता है जो जीवन को बहुआयामी ऊँचाई प्रदान करता है , बस उसकी बातों को ध्यान में रखकर ही वंदना जी का रुझान इस ओर बढ़ा. वे कहती हैं कि मैने कभी सोचा भी नही था की ब्लाग लेखन करते करते मुझे इतने अनमोल मोती प्राप्त होंगे. आज वंदना जी के दो ब्लाग 'ज़ख़्म' http://redrose-vandana.blogspot.com/ और 'ज़िंदगी' http://vandana-zindagi.blogspot.com/ ब्लाग जगत में उनकी प्रतिभा का दर्पण बने हुए हैं. इन ब्लागों में उनकी रचनाओं और साहित्यिक गतिविधियों को देखा जा सकता है.

आज (०८ जून २००९) वंदना जी को उनके जन्म दिवस पर उनके यशस्वी जीवन और साहित्य शिखर की ओर निरंतर अग्रसर होने की शुभकामनाएँ।

- डॉ विजय तिवारी "किसलय"

आज हम यहाँ पर उनकी रचना "उम्र के पड़ाव" आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।
उम्मीद है पाठकों को पसंद आएगी।
उम्र के पड़ाव
उम्र के इक पड़ाव पर
सब कुछ अच्छा लगता है
साथी का हर अंदाज़
निराला लगता है
हर खामी भी
इक अदा सी लगती है


उम्र के अगले पड़ाव पर
सब कुछ बदलने लगता है
साथी का सादा वक्तव्य भी
शूल सा चुभने लगता है
शब्दों के रस की जगह
अब ज़हर सा घुलने लगता है


उम्र के आखिरी पड़ाव पर
कुछ भी न अच्छा लगता है
साथी की तो बात ही क्या
अपना साथ भी न अच्छा लगता है
कभी दिल बच्चा बनने लगता है
कभी उम्र का बोझ बढ़ने लगता है
उम्र के इस पड़ाव पर
कोई न चाहत होती है
सिर्फ़ खामोशी होती है
और इंतज़ार ...
एक खामोश पल का ...
- वंदना गुप्ता


प्रस्तुति :-
- विजय तिवारी " किसलय "

11 टिप्‍पणियां:

  1. Vandana ji ke bare me jankar achcha laga.Kavita bhi achchi hai.

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  2. vijay ji
    aapne to mujhe nishabd sa kar diya.
    main is layak kahan aur shayad ye mere janamdin ka sabse amulya tohfa hai.ise mein kabhi nhi bhula sakti.
    aapne to pata nhi kin unchaiyon par pahucha diya mujhe magar main us layak kahan?aapka shukriya kin shabdon mein ada karoon, nhi janti.aapke aage natmastak hoon.
    is waqt meri aankhon mein khushi ke aansoo hain.
    aaj to dhanya ho gayi main.

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  3. waah waah waah.........didi kya baat hai.......
    bahut accha laga jankar aur padhkar........
    ek din aisa bhi aayega jab aapka naam poori duniya janegi..........
    tab bhi mujhe bahut khushi hogi....
    sath hi sath main vijay ji ka bhi abhar vyakt karta huin....

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  4. वन्दना गुप्ता को सर्वप्रथम उनके जन्म-दिवस की शुभ-वेला पर अपनी ओर से ढेरों बधाई प्रेषित करता हूँ। धन्य हैं इनके माता-पिता जिन्होंने संसार को जीते-जागते रूप में वन्दना जैसी अमूल्य निधि प्रदान की है। मैं उनको नमन करता हूँ।
    साथ ही-
    भाई विजय तिवारी ‘किसलय’ जी का आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्हांेने तुम्हारा परिचय मुझ जैसे सभी ब्लागर्स करवाया है।
    वन्दना गुप्ता जी की यह कविता बहुत सुन्दर है। परन्तु यदि इसमें आशावादी दृष्टिकोण होता तो सोने में सुगन्ध भर जाती। फिर भी शान्त-रस का इसमें अद्वितीय समावेश है। एक बार पुनः बधायी।

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  5. वाह वाह वाह.........दीदी क्या बात है.......
    बहुत अच्छा लगा जानकार और पढ़कर........
    एक दिन ऐसा भी आएगा जब आपका नाम पूरी दुनिया जानेगी..........
    तब भी मुझे बहुत खुशी होगी....
    साथ ही साथ मैं विजय जी का भी आभार व्यक्त करता हूँ....

    अरे नहीँ भाई आपकी दीदी हैं ही ऐसी..
    सच मुच उनका बड़ा नाम होगा ..

    - विजय

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  6. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
    वन्दना गुप्ता को सर्वप्रथम उनके जन्म-दिवस की शुभ-वेला पर अपनी ओर से ढेरों बधाई प्रेषित करता हूँ। धन्य हैं इनके माता-पिता जिन्होंने संसार को जीते-जागते रूप में वन्दना जैसी अमूल्य निधि प्रदान की है। मैं उनको नमन करता हूँ।
    साथ ही-
    भाई विजय तिवारी ‘किसलय’ जी का आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्हांेने तुम्हारा परिचय मुझ जैसे सभी ब्लागर्स करवाया है।
    वन्दना गुप्ता जी की यह कविता बहुत सुन्दर है। परन्तु यदि इसमें आशावादी दृष्टिकोण होता तो सोने में सुगन्ध भर जाती। फिर भी शान्त-रस का इसमें अद्वितीय समावेश है। एक बार पुनः बधायी।


    आदरणीय मयंक जी
    अभिवंदन
    वाकई मेरी सिस्टर वंदना को अच्छे संस्कार मिले हैं, और वह अपने सद्कर्मों से आदर्श स्थापित करेगी.
    मैं आपका भी आभारी हूँ हम सबको उत्साहित करने के लिए.
    - विजय

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  7. किसे कहूं अच्‍छा

    सब कुछ है सच्‍चा

    झूठ तनिक नहीं

    सब कुछ यहीं।

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  8. वंदना जी बारे में जानकर और उनकी रचना बहुत बढ़िया लगी . आभार बढ़िया प्रस्तुति के लिए .

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  9. dada......har narmade....kahan hain aap ....kai din ho gaye mulakat nahi hui....jaldi se ek blogger meeting organise ki jaye....

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  10. ManNiya वंदना जी को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनायें.
    वंदना जी के बारे में जाना और उन के ब्लॉग से परिचय हुआ,विजय जी आप का आभार.
    'उम्र का पडाव 'जीवन की सच्चाई को बयाँ करती कविता है.
    बधाई

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