रविवार, 28 दिसंबर 2008

दोहा श्रृंखला [दोहा क्र. १४]

कालिख बनती दीप से,
कमल कीच संतान
सज्जन घर दुर्जन मिलें,
खल घर मिलें सुजान

- किसलय

4 टिप्‍पणियां:

  1. कालिख बनती दीप से,
    कमल कीच संतान।
    सज्जन घर दुर्जन मिलें,
    खल घर मिलें सुजान ॥
    विजय भाई बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ है .
    सही है कि कालिख की उत्पत्ति दीप से
    और कमल कीचड में होता है. सज्जन और सुजान के घर खल
    और दुर्जन भी मिलते है . भाई आपके दोहो ने मनमोह लिया है .
    बहुत ही सटीक और उम्दा लिखते है . बधाई .

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाई मिश्रा जी
    सादर नमस्कार
    आप मेरे ब्लॉग तक पहुँचते हैं , ये मेरा सौभाग्य है
    आपने कहा-" आपके दोहो ने मनमोह लिया " तो मैं ये कहना चाहूंगा कि
    ये सब आप जैसे साहित्यकारों के साथ का ही असर है
    प्रसंशा के लिए आभार
    आपका
    विजय

    उत्तर देंहटाएं
  3. Good Blog, I think I want to find me, I will tell my other friends, on all

    उत्तर देंहटाएं
  4. You these things, I have read twice, for me, this is a relatively rare phenomenon!
    fishing net

    उत्तर देंहटाएं