बुधवार, 29 अक्तूबर 2008

तब तक देर हो चुकी थी



विश्वजीत की दवा कंपनी ने उसे करोड़पति बना दिया था ।
आलीशान कोठी और संम्पन्नता देखते ही बनती थी ।
बच्चे कान्वेंट स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे,
बस विश्वजीत अपने बड़े लड़के की बीमारी को लेकर
कुछ दिनों से परेशान थे .

अच्छी से अच्छी चिकित्सा के बाद भी स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो रहा था ।
चर्चा के दौरान डॉक्टर ने निश्चिंत रहने का आश्वाशन देते हुए
विश्जीत से कहा कि मैं कुछ दवाईयां बदल देता हूँ ,
जिससे और जल्दी आराम लगेगा ।
नई दवाईयों से दूसरे दिन लड़के की हालत और ज्यादा बिगड़ गई ।
डॉक्टर समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर ऐसा क्यों हुआ ।
आराम की जगह बीमारी क्यों बढ़ी .


जिस समय विश्वजीत की नज़र वहाँ रखी
अपनी कंपनी द्बारा निर्मित
नकली दवाई पर पडी
तब तक देर हो चुकी थी ।


- विजय तिवारी " किसलय "

2 टिप्‍पणियां: