गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

मेरे अपने


मेरे अपने

मेरे अपनेअपनी माँ को गाँव में अकेला छोड़कर रमेश अपनी पत्नी के साथ शहर में बस गया। घरेलू मतभेद एवं सास-बहू के वैचारिक विरोध के चलते माँ के पास उसका आना-जाना लगभग बंद सा हो गया था । एक अरसे बाद आज जब बीमार पत्नी की तीमारदारी के उद्देश्य से रमेश माँ को लेने पहुँचा तो माँ ने उसे बड़ी गंभीरता और शांति के साथ समझाया-

बेटा! जब मैं पिछले साल बीमार पड़ी थी तब भी तुम लोगों के पास मेरे लिए एक दिन का समय नहीं था । सारे गाँव वाले आज भी तुम्हें कोसते हैं । उस विपदा की घड़ी में इन्हीं लोगों ने मेरी तन-मन-धन से सहायता की और तब से आज तक मुझे अकेलापन महसूस होने नहीं दिया । सुख-दुख, तीज-त्योहारों में भी ये सभी मेरे सहभागी बनते हैं। रमेश बेटा, अब तो ये सभी पराए ही मेरे अपने बन गये हैं । माफ़ करना, मैं इन्हें छोड़कर तेरे साथ नहीं जा सकती।

- विजय तिवारी " किसलय " जबलपुर, म.प्र. भारत.

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