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बुधवार, 21 जनवरी 2009

मैं सुमन हूँ

मैं सुमन हूँ, महकता रहूँगा सदा.
रंग खुशियों के, भरता रहूँगा सदा..
फ़र्क करना कभी मैने सीखा नहीं,
गीत समता के लिखता रहूँगा सदा..
प्यार की आग में गर तपाया गया,
बन के कुंदन दमकता रहूँगा सदा...
भोर आई खुशी की तो बहका नहीं,
शाम-ए-गम में भी हँसता रहूँगा सदा..
इश्क़ करना सिखाया है जिसने मुझे,
उसकी जानिब ही बढ़ता रहूँगा सदा...
जिनकी खातिर भुलाया है सारा जहाँ,
नम्र " किसलय " की जग में ये पहचान है,
मैं शिखर पर ही उगता रहूँगा सदा...
आशिक़ी उनसे करता रहूँगा सदा..
- डॉ. विजय तिवारी "किसलय"