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सोमवार, 26 मार्च 2012

स्वर्गीय श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" जी द्वारा संयोजित "भागवत भूमि यात्रा" की समीक्षा :- समीक्षक- विजय तिवारी "किसलय




"भागवत भूमि यात्रा"
समीक्षक- विजय तिवारी "किसलय"  
                                                                                                                                                                        स्वर्गीय श्री सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" जी द्वारा संयोजित एवं 
श्री कृष्णदत्त पालीवाल द्वारा संपादित "भागवत भूमि यात्रा" नामक पुस्तक  में
मात्र यात्रा वृत्तान्त ही नहीं यात्रियों के बहुआयामी विचार भी समाहित हैं. 
सम्पादक सहित एक दर्जन साहित्यकारों के यात्रा वृत्तांतों का संकलन स्वमेव
अनूठा प्रयास है. दोहरे कालम के  सवा सौ से भी अधिक पृष्ठों का कलेवर पाठकों
 के लिए पर्याप्त  बौद्धिक सामग्री कही जा सकती है. यात्रा ३१ जनवरी ८५ से 
२२ फरवरी ८५ एवं पुनः २० अगस्त ८५ से २२ अगस्त ८५  "के दौरान संपन्न
हुई.
 "भागवत भूमि यात्रा की ग्रन्थ योजना में अज्ञेय जी के विचार  थे कि ब्रज मंडल,
 ऊखा  मंडल एवं कुरु मंडल की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक  एवं लोक 
जीवन के रूप में मर्यादा  रेखा हो. कृष्ण से सम्बंधित कथाएँ, लीलाएँ, चरित्र, 
गोप-गोपियाँ, काव्य, रास और  मूर्तिकला को लीला पुरुष के अंतर्गत  रखा जाए.
इतिहास पुरुष में मथुरा, हस्तिनापुर, द्वारका, देहोत्सर्ग एवं तत्कालीन पात्रों के
चरित्र वर्णन को स्थान दिया जाये.  भागवत भूमि के मंदिर  खंड में मथुरा, 
वृन्दावन, गोकुल, किशनगढ़, नाथद्वारा, चित्तौड़, मेड़ता, डाकौर, द्वारका आदि 
के मंदिरों, पूजन-अर्चन, उत्सवों का उल्लेख हो. लोक जीवन का विवरण,
भक्ति काव्य एवं संगीत, वाचिक परंपरा, भक्ति रसायन हो. "देश-काल : ब्रज 
और द्वारका" में प्राकृतिक चित्रण से लेकर जीव जगत, वाद्ययंत्र, प्रमुख 
 जन-जातियाँ, उनके यात्रा पथ, घर सज्जा आदि का वर्णन हो. इस  ग्रन्थ
 योजना पर आधारित की गई यह वृहद् यात्रा कितनी सफल है, इसे तो पाठकों
 के  विवेक पर छोड़ना श्रेयस्कर होगा, परन्तु इतना अवश्य कहा जा  सकता
 है कि इस ऐतिहासिक यात्रा का सकारात्मक सुफल "भागवत भूमि यात्रा"
 नामक  पुस्तक  के रूप में आज पाठकों के समक्ष है.
 अज्ञेय जी की अगुवाई में सम्पन्न हुई यह भागवत भूमि यात्रा  भविष्य में
 ऐसे  अन्य प्रयासों को अवश्य ही बढ़ावा देगी. इस ग्रन्थ को एक यात्रियों 
के समूह द्वारा एक नियत यात्रा पर सबके निजी दृष्टिकोण एवं विचारों का
 संकलन कहा जा सकता है. यह बात अलग है कि इसमें अनेक पुनरावृत्तियाँ
 सामने आई हैं, फिर भी मैं कहना चाहूँगा कि अज्ञेय जी ने ताना-बाना बुनकर
 निश्चित रूप से एक विशिष्ट  कार्य किया है. श्री कृष्णदत्त पालीवाल जी ने 
अज्ञेयजी  के अभिलाषानुरूप "भागवत भूमि यात्रा की विस्तृत भूमिका में
 ही इसके विराट उद्देश्य को स्पष्ट कर दिया है. यात्रा और पुस्तक  की
 बारीकियों के अतिरिक्त भागवत भूमि से सम्बंधित सन्दर्भों ने भूमिका को भी
 यात्रा वृत्तान्त का महत्वपूर्ण  हिस्सा बना दिया है. पुस्तक का प्रथम यात्रा वृत्तान्त 
श्री मानिक लाल चतुर्वेदी की "एक पंडाई रपट" से आगे बढ़ता है. मथुरा, वृन्दावन,
गोकुल और कृष्ण जन्म भूमि, पोतराकुंड आदि का वर्णन मिलता है. विद्या निवास
 मिश्र द्वारा "ब्रज में व्रजन" शीर्षक से यात्रा  वृत्तान्त लिखा गया है. इसमें मथुरा, 
वृन्दावन  और गोकुल के अनेक तथ्यों की जानकारी मिलती है. वर्तमान
 परिस्थितियों पर भी लेखक द्वारा ध्यानाकर्षित कराया गया है. जैसे- "उद्योग के
 कचरे ने जमुना की श्यामलता निगल ली है और कुत्सित हरियाली जैसी आभा 
उगल दी है". पर्यावरण के क्षरण परऐसी टीस एक प्रबुद्ध नागरिक की ही हो सकती है. 
रपट पढ़ते समय पाठक निश्चित रूप से भगवत, मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, द्वारका
 के कथाभावों में खो जाता है. प्रेम की पराकाष्ठा  और प्राचीन भारतीय संस्कृति का
 वर्णन पढ़कर मन भावविभोर हो  जाता है. स्वार्थ, मोह और माया को छोड़कर
पाठक ऐसी भावधारा  में बहता चला जाता है जहाँ दीन- दुनिया की सुध-बुध नहीं
 रहती. भगवती शरण सिंह का "मोहि ब्रज बिसरत नाहिं" शीर्षकान्तर्गत वृत्तान्त 
 गागर में सागर जैसा है. यह यात्रा  वृत्तान्त  लीला भूमि के अलावा  वहाँ के
 जन जीवन से भी परिचित कराता है. यहाँ प्राचीन स्थलों  तथा पौराणिक ग्रंथों
 की जानकारी भी दी गयी है. कहीं कहीं लेखक के निजी विचार और संस्कृतनिष्ठ
 शब्दावली सामान्य  पाठकों को अखरती है, साफगोई का साहस भी देखने मिला,
 जब लेखक कहता है कि देवताओं ने भी ऐसे कृत्य किये हैं  जो मनुष्यों के लिए 
भी उचित नहीं हैं. टटिया घाट, रमण रेती, नन्दगाँव, बरसाना, कृष्ण भक्त रसखान 
की समाधि का वर्णन दिल  को छू जाता है.
"यात्रा और द्वारका का संघराज्य" शीर्षक से लिखे गए वृत्तान्त में  श्री मुकुंद लाल जी
 पहले "गंज" शब्द की व्याख्या करते हैं, फिर पीक के रेड कार्पेट से स्वागत  करती
 पान की दूकान का. चोरवाड के समुद्री तट का वर्णन, अपने काँधे पर लटकाने वाले
  थैले का विवरण. सोमनाथ मंदिर, सरस्वती के किनारे प्राची जहाँ  कृष्ण जी का
 अंत्येष्टि  संस्कार हुआ था, भालका जहाँ कृष्ण को जरा व्याध का तीर लगा था, 
 इसके बाद जूनागढ़ में नरसी का चौरा जहाँ आज भी अखंड कीर्तन चल रही है.
 इन सभी  स्थलों की पर्याप्त  जानकारी होती तो पाठकों को और भी अच्छा लगता.
 पुस्तक में लगभग सभी के द्वारा अपने अनुभवों और पौराणिक  उद्धरणों  को सयास
शामिल किये जाने से भागवत भूमि यात्रा कहीं कहीं गौण प्रतीत होने लगती है. 
यात्रा वृत्तान्त के समानांतर कृष्ण चरित्र और सन्दर्भों का  विस्तृत वर्णन भटकन
उत्पन्न करता है.यह बात अलग  है कि बातें ज्ञानवर्धन भी करती हैं, परन्तु 
सम्बंधित लेखन  और उद्देश्य प्राप्ति में संशय की स्थिति बनती है. दोहरे कालम 
वाले १७ पृष्ठीय इस खंड में मात्र प्रथम एवं अंतिम पृष्ठ पर ही  यात्रा का सांकेतिक
वर्णन है, शेष सामग्री यात्रा से लगभग विषयेत्तर परोसी गयी है. मूल द्वारका एवं
वेट द्वारका को भी  पूर्णतः पुरातत्त्वज्ञ की सोच पर छोड़ना लेखकीय दायित्व से
बचने जैसा लगता है.
 "भागवत भूमि यात्रा:कुछ झलकियाँ" नामक खंड रमेश चन्द्र शाह  की कलम
 से लिखा गया है.पोरबंदर की ओर से बढ़ते हुए द्वारकाधीश को ओझल होते देखना.
 हरसिद्धि जाना. आगे  मूल द्वारका, रणछोड़राय मंदिर के दर्शन करते  हुए स्कन्द
  पुराण की सुदामापुरी अर्थात  पोरबंदर पहुँचना. यहीं  काव्य-प्रकाश के रचयिता 
और पोरबंदर के राजा सुरतान जी का अनोखा बगीचा देखना जहाँ एक गधेगाड़
 का खम्भा  गड़ा  है. इसके नीचे लिखे शिलालेख पर सन्देश अंकित है- "जो भी
 हमारे धर्म स्थानों को  नुकसान पहुँचायेगा, उसके माता को  गधा घर्षित करेगा".
 यहाँ पर मैं रमेश चन्द्र शाह जी के विचार से सहमत नहीं हूँ  जिसे शाहजी ने
 आत्मरक्षा में अक्षम और पतोंमुखी मानसिकता बताया है. इस तरह के सन्देश
 अन्यत्र भी देखने मिल जायेंगे.  इनका उद्देश्य असामाजिक तत्वों को मात्र
 भावनात्मक रूप से प्रताड़ित कर क्षति पहुँचाने से रोकना होता है  कलचुरियों
 की राजधानी "त्रिपुरी" वर्तमान तेवर, जबलपुर, मध्यप्रदेश में भी आप लगभग
 ऐसा ही सन्देश पढ़ सकते हैं जिसका आशय  शिल्प को मात्र नुकसान से 
बचाना है. आगे कीर्ति मंदिर की छत पर गांधी जी की उम्र के द्योतक ७९ दीपक 
बने  हैं. यहीं पर बापू का जन्म स्थान है. माधवपुर के  विक्रमराय और माधवराय 
के मंदिर, गिरनार में योगियों के आदि पुरुष भगवान् दत्तात्रेय का स्थान है. 
अशोक के शिलालेख, सोमनाथ का मूर्तिशिल्प, दीव का गिरजाघर एवं यहीं 
के दुर्ग आदि सभी की महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी है. शाह जी के बहुआयामी
  वृत्तान्त में सुरम्य स्थलों, देवगृहों,समुद्री वातावरण, संगीत-साहित्य एवं
 आयोजित विचार  गोष्ठियों आदि का जिक्र ज्ञानवर्धक एवं रोचक बन पड़ा है.
 इन्होंने स्वयं अंत में लिखा है कि "सचमुच और अक्षरशः वृत्तान्त ही कहना
 होगा इसे”. युद्ध में मारे गए सगे सम्बन्धियों का पिंडदान किये जाने के कारण
 पिण्डारक  स्थान की बात  हो अथवा द्वारकाधीश के मंदिर के शिखर  पर
 लहराती बावन गजा पताका का उल्लेख हो, ये सभी  बातें पाठकों को प्रभावित
 किये बिना नहीं रहेंगी.
"माटी के देवता, आकाश की गंध" खंड में इला डालमिया जी की भाषा शैली
 अनूठी लगी. इन्होंने यात्रा वर्णन में ऐतिहासिक प्रमाणों का सूक्ष्मता से
 अध्ययन करते हुए धार्मिक पुट भी डाला  है और अपनी ओर से तर्क 
भी प्रस्तुत किये हैं. सोमनाथ के  मंदिर में बैठकर मुकुंद लाठ द्वारा की गयी
 आरती को अविस्मरणीय बताया. देहोत्सर्ग स्थान, हिरण्या नदी और सागर 
के संगमस्थल की जानकारी देते हुए इला जी की लेखनी आध्यात्मिक भी हो
 जाती है. वे लिखती हैं कि " एक हैं अवतारी राम  जिनके लिए मर्यादा बड़ी
 चीज है, दूसरे हैं सोलह कलाओं से परिपूर्ण कृष्ण जिनकी कोई सीमा नहीं है. 
ऐसी कोई मर्यादा नहीं जिसका  वे उल्लंघन नहीं कर सकते. इला जी ने 
अहमदाबाद के निकट गिरी के जंगलों में पलाश के फूलों के दहकते हुए वन, 
निकट ही तुलसी- श्याम स्थान जो वृंदा और कृष्ण के प्रसंग से जुड़ा है या
 फिर सात मूल द्वाराकाओं की बात हो, सब  के बारे  में अधिक से अधिक 
जानकारी देने में सफलता पाई है. सच में "कृष्ण तथ्य कम और पुराकथा
 ज्यादा लगते हैं. कृष्ण स्वयं अपनी कहानी हैं. 
"सागर, क्या तुम कृष्ण हो" शीर्षक से वृत्तान्त लिखते हुए नरेश मेहता
 कहते हैं कि यात्रा का प्रथम चरण द्वारका, पोरबंदर आदि की यात्रा करना 
था.  भागवत भूमि यात्रा का द्वितीय चरण चोरवाड़ से शुरू होता है जहाँ
 नरेश मेहता जी पहुँचते हैं. यात्रा के दौरान दृष्टिगत प्राकृतिक सौन्दर्य
के चित्रण से भ्रम होता है जैसे मेहता जी द्वारा  भागवत भूमि  और कृष्ण
से संदर्भित तथ्यों को  जानने की बजाय प्रकृति की सुन्दरता पर आलेख  
लिखने  हेतु यात्रा की गई  हो. नंदलला के नन्दगाँव एवं श्रीरूपा राधा के
 बरसाना के बहाने मेहता जी ने इनसे सम्बंधित कुछ जानकारी अवश्य
 दी है. वे लिखते हैं कि कला का उल्लंघन किसी व्यक्ति के द्वारा नहीं हो
 सकता पर व्यक्ति के माध्यम से यह संभव है, इसीलिये राम से अधिक
 रामत्व और कृष्ण से अधिक कृष्णत्व  को सर्वोपरि माना गया है. 
संकलित यात्रा संस्मरणों में अधिकांश स्थलों के वर्णन की पुनरावृत्ति
 से उत्पन्न नीरसता का भाव मेहता जी के वृत्तांत में भी परिलक्षित
 हुआ. अंत में मेहता जी का यह वाक्य याद रहता है- "वेरावल 
गुजरात के सागर तट की मत्स्य गंध से अधिक तीव्र कृष्ण गंध मेरे 
व्यक्तित्व में  निबद्ध हो  गयी है. इसलिए मैं प्रायः सागर से पूछता
  हूँ कि सागर, क्या  तुम कृष्ण हो?
"भागवत भूमि - उत्तर यात्रा" वृत्तांत में विष्णुकान्त शास्त्री के
 अनुसार प्रबुद्धयात्री का मन किसी यात्रा के दौरान भूगोल से जुड़े
 इतिहास, इतिहास से जुड़े समाज, समाज से जुड़े जीवन, जीवन
 से जुड़े विचार, दर्शन, साधना, संस्कृति, साहित्य सभी का
साक्षात्कार कराना चाहता है. आपने विषयेत्तर सन्दर्भों, क्षेपकों
 अथवा शब्दजाल से दूर रहते हुए यात्रापथ  के वृत्तांत पर विशेष 
ध्यान दिया है. "द्वारका और वेट द्वारका "वृत्तान्त श्री रघुवीर
 चौधरी के संस्मरण हैं. यात्रा पथ पर केन्द्रित भाव इस वृत्तान्त
 को उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं. समुद्र तट, दर्शनीय स्थलों, साहित्यिक 
गोष्ठियों आदि  सभी का आवश्यकतानुरूप वर्णन अच्छा लगा.
अज्ञेय जी के "कौन गली गए  स्याम" वृत्तान्त में इनका चिंतन 
बार बार एक ही जगह केन्द्रित हुआ है और  वह है "कौन गली
गए पर स्याम". जब सबै भूमि गोपाल की है तो हम मान सकते
 हैं कि वे यहाँ-वहाँ या कहीं से  भी निकले होंगे. उनकी बातों से
 यह भी आभास होता है  कि यात्रा और अच्छी तथा पूर्णता लिए
 हो सकती थी अगर यात्री और  समय दोनों की पर्याप्तता होती. 
अभय नगरी, किशनगढ़, नाथद्वारा, भीमनमाल , जालौर,मेड़ता
 का चौभुजा देव मंदिर आदि सभी यात्रा के पड़ावों का  उल्लेख 
मात्र है. मीरा अथवा वल्लभाचार्य जी की बात हो, गोचारकों 
अथवा कृषकों की बात हो या फिर इन सबके अतिरिक्त कृष्ण
 से जुड़े तथ्यों और सामाजिक सरोकारों  की बात हो, इन्होंने
 अपनी अभिव्यक्ति से स्पष्ट किया  है कि केवल प्रामाणिकता
 का अकेला महत्त्व नहीं होता, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ
 रही प्रथाओं, चर्चाओं आख्यानों का  भी अहम स्थान होता है 
जो हमारे हृदयों में आस्था  और  विश्वास के प्रतीक हैं.
"भगवत भूमि : एक मनोयात्रा" नाम के वृत्तान्त में जड़ावलाल
  मेहता की भावनाएँ एवं विचार सम्मिलित किये गए हैं. यात्रा के 
दूसरे चरण हेतु  अहमदाबाद  से जुड़े  मेहता जी कहते हैं कि यह 
हमारी सांस्कृतिक यात्रा थी, धार्मिक तीर्थयात्रा नहीं. हम
 मिनी बस में सफ़र करते थे,पद यात्रा नहीं. अतिथिगृहों या
 होटलों में ठहरते थे धर्मशालाओं में नहीं. सच, समय के
 बदलाव ने तीर्थ को 'टूर' में परिवर्तित कर दिया है. यात्रा
 शब्द की विवेचना हो या फिर द्वारका अथवा द्वारकाओं के
 बहाने लिखा वृत्तांत, भागवत भूमि यात्रा को केंद्रबिंदु से परिधि
 की  ओर ढकेलते लगा. यही बात इस पुस्तक के सभी यात्रियों
 के वृत्तांतों में भी देखने  मिली. इसी तरह वृत्तान्त अधिकतर
 स्थलों के नामों तक ही सीमित रहे. वहाँ की विशेषताओं 
अथवा भौगोलिक बातों को पता नहीं क्यों महत्त्व नहीं दिया
 गया, जबकि ग्रन्थ योजना में इन सबका स्पष्ट उल्लेख किया
 गया था.  मेरी दृष्टि से यदि ब्रज-द्वारका-कृष्ण के अतिरिक्त
 इन बातों का यथोचितसमावेश किया जाता तो कृष्ण
 और कृष्ण भूमि का यह एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थ
 बन सकता था. इसीलिए शायद इसे 'टूर' कह कर
 मेहता जी ने इस विषय पर कुछ न कहते हुए भी सब
 कुछ कह दिया है.
भागवत भूमि यात्रा की जो योजना बनाई गई थी उसके अनुरूप 
शायद सामग्री की और आवश्यकता महसूस हुई. यात्रियों 
ने श्रमसाध्य साक्ष्य और जानकारी एकत्र करने के स्थान 
पर अपनी कल्पना और अनुभव का सहारा लिया है.यात्रा
 आलेखों में स्थलों, शहरों, भौगोलिक एवं ऐतिहासिक 
घटनाओं की स्पष्ट छवि मानस पटल पर उभर कर नहीं आई.
यह धुंधलापन निश्चित रूप से यात्रा की कमजोरी का द्योतक 
है. पूरी पुस्तक के अध्ययन के उपरान्त कहा जा सकता है
कि भागवत भूमि के यात्रीगण यदि पुस्तक में परिलक्षित
वैचारिक तथा भाषाई पांडित्य- प्रदर्शन के स्थान पर यात्रापथ
के स्थलों का ग्रन्थ योजनानुरूप विवरण एवं यात्रा के दौरान
अर्जित जानकारी पर आधारित वृत्तांत लिखते तो निश्चित रूप 
से यह एक उपयोगी सन्दर्भ ग्रन्थ से कम नहीं होता. शायद 
ऐसी ही कुछ भावनाएँ अज्ञेय जी के मन में भी उथल-पुथल 
मचाती रही हैं, जिस कारण उन्होंने लिखा भी है कि "वैसे 
शोध और अध्ययन की आवश्यकता है,जिसका कच्चा मसविदा 
मैंने बनाया था; वैसी पुस्तक आएगी तो न केवल हिंदी की 
श्रीवृद्धि करेगी वरन भारतीयता की एक गत्यात्मक भावना 
के विकास में भी योग देगी. बावजूद इन सबके यह पुस्तक 
निश्चित रूप से हमारे हिंदी साहित्य की बहुमूल्य धरोहर बन 
चुकी है.         
                            ------xxx----        
                   
 -विजय तिवारी "किसलय"
 जबलपुर (म. प्र.)  

सोमवार, 24 जनवरी 2011

विमोचित पुस्तक ' देख लूँ तो चलूँ ' महज यात्रा वृत्तांत न होकर उड़न तश्तरी समीर लाल समीर के अन्दर की उथल-पुथल, समाज के प्रति एक साहित्यकार के उत्तरदायित्व का सबूत है - विजय तिवारी ' किसलय '


(श्री समीर लाल 'समीर') 
                           भाई समीर लाल ’समीर’ की पुस्तक ’देख लूँ तो चलूँ’ पर बात करने के पूर्व उनके बारे में बताना भी आवश्यक है क्योंकि कृति और कृतिकार   एक तरह से  संतान और जनक जैसे होते हैं. जनक का प्रभाव अपनी संतान पर स्पष्ट रूप से देखा जाता है. अड़तालीस वर्षीय भाई समीर जी पैदा तो हुए थे रतलाम में, परन्तु अध्ययन एवं संस्कार उन्होंने संस्कारधानी जबलपुर में प्राप्त किये. आप म.प्र. विद्युत मंडल के पूर्व कार्यपालक निदेशक  इंजी पी.के.लाल जी के सुपुत्र हैं. चार्टर्ड एकाउंटेंसी भारत में एवं  मेनेजमेंट एकाउंटेंसी अमेरीका से की. सन १९९९ के बाद आप कनाडा के ओंटारियो में निवास करने लगे. कनाडा के एक प्रतिष्ठित बैंक में तकनीकी सलाहकार होने के साथ साथ आप टेक्नोलाजी पर नियमित लेखन करते हैं.


(कृति आवरण)
                                 आपका एक लघुकथा संग्रह ’मोहे बेटवा न कीजो’ के साथ ही वर्ष २००९ में चर्चित एवं लोकप्रिय काव्य संग्रह ’बिखरे मोती’ भी हिन्दी साहित्य धरोहर में शामिल हो चुके है. इसमें गीत, छंदमुक्त कविताएँ, गज़लें, मुक्तक एवं क्षणिकाएँ समाहित हैं. एक ही पुस्तक में पाँच विधाओं की ये अनूठी पुस्तक भाई समीर के चिन्तन का प्रमाणिक दस्तावेज की तरह है.
                                                  हिन्दी और हिन्दुस्तान से दूर समन्दर पार कनाडा में अपनों की कमी का अहसास आज भी समीर जी को कचोटता है. इसी कसक ने समीर जी को पहले ई-कविता के याहू ग्रुप से जोड़ा और बाद में ब्लाग्स के आने पर आप अपने हिन्दी ब्लॉग ’उड़न तश्तरी’ के माध्यम से संपूर्ण विश्व के चहेते बने हुए हैं. ब्लागरों के बादशाह समीर भाई के ब्लॉग को विश्व का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग सम्मान भी प्राप्त हो चुका है. आप विश्व के शीर्षस्थ ब्लागर हैं. ब्लॉग पर आपकी जादुई कलम की पूरी दुनिया कायल है. इसके साथ ही टोरंटो कनाडा एवं अमेरीका से निकलने वाली पत्रिका ’हिन्दी चेतना’ के आप नियमित व्यंग्यकार हैं. आप कनाडा में हिन्दी रायटर्स गिल्ड एवं अन्य संस्थाओं के शताधिक सदस्यों के साथ मासिक कथा एवं काव्य गोष्ठियों सहित अन्य कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

(श्री गिरीश बिल्लोरे, समीर लाल, डॉ हरि शंकर दुबे, प्रो ज्ञान रंजन, 
 इंजी पी के लाल एवं वक्तव्य देते हुये विजय तिवारी 'किसलय' )











                                               अब हम बात करते हैं ’देख लूँ तो चलूँ’ कृति की. वरिष्ठ साहित्यकार एवं ब्लागर श्री पंकज सुबीर जी के शिवना प्रकाशन सीहोर, मध्य प्रदेश, भारत से प्रकाशित यह कृति ’देख लूँ तो चलूँ’ चौदह उपखण्डों में लिखी संस्मरणात्मक, वैचारिक, तात्कालिक अन्तर्द्वन्द्व की अभिव्यक्तियों का संग्रह है. लेखक ने विवरणात्मक शैली को अपनाकर सामाजिक सरोकार, विषमताएँ, सामाजिक, धार्मिक, व्यक्तिगत, प्रशासनिक कठनाईयों का चित्रण करते हुए पाठकों के साथ तादात्म्य बैठाने में सफलता प्राप्त की है.
                                                 मित्र के गृह-प्रवेश की पूजा में अपने घर से ११० किलोमीटर दूर कनाडा की ओंटारियो झील के किनारे बसे गाँव ब्राईटन तक कार ड्राईव करते वक्त हाईवे पर घटित घटनाओं, कल्पनाओं एवं चिन्तन श्रृंखला ही ’देख लूँ तो चलूँ’ है. यह महज यात्रा वृतांत न होकर समीर जी के अन्दर की उथल-पुथल, समाज के प्रति एक साहित्यकार के उत्तरदायित्व का भी सबूत है. अवमूल्यित समाज के प्रति चिन्ता भाव हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि इस किताब के माध्यम से मानव मानव से, पाठक पाठक से सीधा वैचारिक सेतु बनाने की कोशिश है क्योंकि कहीं न कहीं कोशिशें कामयाब होती ही हैं.
                             कृति का पहला उपखण्ड मांट्रियल की पूर्वयात्रा से प्रारम्भ होता है जिसमें उनकी सहधर्मिणी साथ होती हैं परन्तु यह यात्रा उन्हें अकेले ही करना पड़ रही है. बस यहीं से उनकी विचार यात्रा भी शुरु होती है. यात्रा के दौरान आये विचारों को श्रृंखलाबद्ध कर समीर जी ने पाठकों के साथ सीधा सम्बन्ध बनाया है. कहीं वे सिगरेट पीती महिला को सिगरेट पीने से रोकना चाहते हैं तो कहीं कनाडा में बसे पुरोहित के तौर तरीके बताते हैं. गाँव का चित्रण, फर्राटे भरती गाडियाँ अथवा ट्रेफिक नियमों की बातें जो भी सामने आया, उसको पाठकों के समक्ष चिन्तन हेतु रखा गया है. अप्रवासी भारतीयों के एकत्र होते ही बस भारत की बातें करना और जड़ से जुड़े रहने की लालसा प्रमुख मुद्दा होता है. परन्तु समीर जी इसे घड़ियाली आँसू करार देते हुए कहते हैं कि इसके लिए बहुत बड़ा जिगरा चाहिये.
                                अगले क्रम में लेखक की बाल सुलभ संवेदनायें जागृत होती हैं और हाई-वे पर बच्चों द्वारा कॉफी सर्व करने पर भारत और कनाडा में बेतुका फर्क पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं. भारतीय बच्चों का काम करना बालशोषण और कनेडियन बच्चों का काम करना पर्सनालिटी डेवेलपमेंट कहा जाता है. उनका मानना है कि बच्चों से उनका बचपन छीन लेने की बात भला कैसे पर्सनालिटी डेवेलपमेंट हो सकती है. आगे आप महिलाओं के तथाकथित फिगर कान्सियसनेस को महत्व नहीं देते तो कहीं वे अमेरीका को देश के बजाय कन्सल्टेंट कहना ज्यादा उपयुक्त मानते हैं क्योंकि वह अपनी छोड़ दूसरों को सलाह देता है. इसके पश्चात ’देख लूँ तो चलूँ’ का ऐसा उपखण्ड आता है जिसमें समीर जी पर हरिशंकर परसाई जी की छाप प्रतीत होती है क्योंकि उन्हीं ने कहीं बताया है कि बचपन में अध्ययन के दौरान उनके हाथों पुरस्कार ग्रहण किया था और उनका स्पर्श आज भी वे महसूस करते हैं.
                                       भारत से कनाडा की यात्रा के वक्त फ्रेंकफर्ट, जर्मनी में एक दिन सपत्नीक रुकने पर भाषाई अनभिज्ञता के चलते अन्तरराष्ट्रीय समलैंगिक महोत्सव में शामिल होने का व्यंग्यात्मक वृतांत बड़ा रोचक बन पड़ा है. आपका ध्यान साधू संतो के ढोंग पर भी जाता है. धन की जीवन में कोई महत्ता न बतलाने वाले यही साधु इसी सलाह या प्रवचन के लाखों रुपये स्वयं बतौर फीस ले लेते हैं. आगे अप्रवासी भारतीयों के माँ बाप की भौतिक एवं मानसिक परिस्थितियों का मार्मिक चित्रण है जो माँ-बाप अपने बेटों को अपना पेट काट कर विदेश भेजते हैं उन बेटों की मानसिकता किस कदर गिर जाती है. ऐसा अक्सर देखने मिलता है.
                                                 ’देख लूँ तो चलूँ’ का दसवाँ उपखण्ड तो आध्यात्मिक चिन्तन जैसा है जिसमें आर्ट ऑफ लिविंग के स्थान पर आर्ट ऑफ डायिंग की सिफारिश की गई है क्योंकि अधेड़ावस्था के पश्चात जीने की कला अधिकांश लोग सीख ही लेते हैं. यह उम्र तो आर्ट ऑफ डायिंग सीखने की होती है कि हम अपनी जवाबदारियों को पूरा करते हुए खुशी खुशी किस तरह इस दुनिया से कूच करें. महात्माओं द्वारा मुक्ति के लिए ’चाहविहीन’ होने की बात भी समीर जी की समझ के परे है क्योंकि मुक्ति का मार्ग पाना भी तो चाह ही है फिर कोई चाह विहीन कैसे हो सकता है? आगे फिर दिल को छू जाने वाला मार्मिक प्रसंग है, जब घर के पेड़ पर टाँगे गए ’बर्ड फीडर’ से पक्षियों को दाने खिलाकर समीर जी आत्म संतुष्टि को प्राप्त करते हैं परन्तु जब एक दिन बिल्ली द्वारा एक पक्षी को अपना शिकार बना लेने वाली मनहूस घड़ी आती है तो इसके लिए लेखक कहीं न कहीं स्वयं को दोषी मानता है और अपराध बोध से ग्रसित जाता है. ड्रायविंग में हार जीत को लेखक महत्व नहीं देता क्योंकि यदि एक जीतता है तो दूसरा उसके भी आगे होता है या पीछे वाले के पीछे भी कोई होता है. स्तरहीन राजनीति और नेताओं की तुलना कुत्तों से करने पर भी समीर जी नहीं चूकते. तेरहवें खंड में लेखक के अनुसार मित्र के घर पर गृहप्रवेश की पूजा के दौरान अंग्रेजी अनुवाद और अंग्रेज परिवारों की उपस्थिति, पुरोहित और यजमान के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं होती. लंच के दौरान अंग्रेज परिवारों को भारतीय रेसिपी बनाने का तरीका बताना प्रवासी अपनी प्रतिष्ठा मानते हैं. अंग्रेज के माथे पर तिलक लगाना या उनके द्वारा नमस्ते कहना हमें फक्र महसूस कराता है परन्तु क्या हमने कभी सोचा कि क्या वे भी ऐसा ही सोचते हैं? समीर जी के ऐसे कई तर्क दिल के अंतिम छोर तक उद्द्वेलित करते हैं.

(वक्तव्य देते हुये श्री बवाल जी)

                                               अंत में लेखक अपने साहित्य लेखन की वर्तनी की त्रुटियाँ खोजने वाली, वाक्य विन्यास की गल्तियों को सुधार कर ईमेल करने वाली किसी मित्र के बारे में बताते हैं कि वह मुझे नहीं, मेरी लेखनी को पसंद करती है. वह मुझसे कभी रू-ब-रू मिल नहीं सकी किन्तु मुझे आज भी याद आई.
                                                इस तरह हम देखते हैं कि समीर जी अपनी बात कहीं से भी शुरू करें, बखूबी अपना संदेश पाठकों तक पहुँचाने में सक्षम हैं. ‘देख लूँ तो चलूँ’ उनके बहुआयामी लेखन का नमूना कहा जा सकता है. दस्तावेजों की उनसे सदा अपेक्षा रहेगी. इन्सानियत, प्रेम, भाईचारा, संवेदनशीलता के साथ-साथ एक विराट दायरे वाली सख्शियत का प्रतिनिधित्व करते हुए भाई समीर अपने लेखन से स्वयं आकाशीय नक्षत्रों जैसे शीर्षस्थ एवं प्रकाशवान बनें.
                                                  आप संस्कारधानी जबलपुर का नाम भी दुनिया में रौशन करेंगे, इसी आशा एवं विश्वास के साथ ...
  













-विजय तिवारी ' किसलय '

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

नाटक के बहाने- ५ ( अंतिम) : निःस्वार्थ मित्रता के नए आयाम तय करता "यार बना बडी" नाटक : विवेचना राष्ट्रीय नाट्य समारोह २०१०.


(चित्र नई दुनिया जबलपुर से साभार)
समाज रिश्तों में बँधे इन्सानों का समूह मात्र नहीं है. सुख-दुःख, खान-पान, अच्छाई-बुराई और मानवीय संवेदनाओं के बगैर इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. इंसानों को छोड़कर अन्य जीव-जंतु इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. पूर्व में इंसान 'जीने के लिए भोजन' और 'रहने के लिए एक छत' में ही संतुष्ट रहता था. धीरे-धीरे उसे रिश्तों और संगठनात्मक फायदों का आभास हुआ, पहले खून के रिश्तों का फिर सामाजिक रिश्तों का. हमारे समाज में रिश्ते भी कई तरह के होते हैं. कुछ स्वार्थ के लिए तो कुछ श्रद्धा के लिए. कुछ लाभ के लिए बनाए जाते हैं तो कुछ बदले की भावना से. इसी तरह कुछ रिश्ते विरासत में मिलते हैं, कुछ संतति के लिए और कुछ स्वमेव ही बन जाते हैं. रिश्तों में मित्रता और वैमनस्यता दोनों ही होती हैं. यदि मित्रता का रिश्ता है तो वह निश्छल और परस्पर समर्पण भाव लिए होना चाहिए. छद्म मित्रता तो आज की जरूरत और शग़ल होता जा रहा है. मित्रता को संजीदगी से निभाना आज सबसे अधिक घाटे का रिश्ता बन गया है. आज के परिवेश में मित्रता के मायने बदल गए हैं. हम अपने पूर्वजों और ग्रंथों द्वारा बतलाई कृष्ण-सुदामा, कर्ण-दुर्योधन, राम-सुग्रीव आदि की मित्रता से ही सहमत नज़र नहीं आते. बात केवल लाभ या हानि की नहीं है. बात है मैत्रीवत रिश्तों के निर्वहन की. हम जानते हैं कि समय, काल और परिवेश के अनुरूप मानवीय एवं भौतिक मूल्यों में परिवर्तन होता है. अथाह भंडारों के बाद भी दो घूँट पानी और कुछ पल प्राणवायु के अभाव में लोगों के मरने के किस्से सबने सुने होंगे. स्थान और आवश्यकता के अनुसार मूल्य बदलते हैं लेकिन मित्रता मूल्यों का सौदा नहीं है. यह दुनिया की पाक नियामत है जिसे भगवान ने भी पावन भाव से निभाया है. साथ में यह भी कहा जाता है कि मित्रता हो जाती है, की नहीं जाती. सच्ची मित्रता कालजयी होती है और छद्म मित्रता छणभंगुर होती है. छणभंगुरता पानी के बुलबुले, बरसाती मेढक अथवा मौसमी नाले जैसी होती है. बात वही है कि 'स्वार्थ पूर्ण, दोस्ती ख़त्म'. क्या हम में से अधिकांश यही नहीं कर रहे हैं. हम अपनी मित्रता पर कितने संजीदा हैं. आज हम एक श्वांस में बचपन के कितने मित्रों के नाम गिना सकते हैं ? आप हफ्ते, महीने या वर्ष में कितने दोस्तों को बिना किसी काम के याद करते हो ? अरे भाई, सोचो ...!   आज अधिकतर सभी ऐसा ही कुछ कर रहे हैं. वास्तव में यही बदलाव है, पर सही बदलाव समाज को सही दिशा देता है और गलत बदलाव समाज को पतन की ढकेलता है.

बचपन में एक ही स्कूल में पढने वाले, मोहल्ले में एक साथ गिल्ली-डंडा खेलने वाले, किसी को चिढाकर अगले पल मनाने वाले हम भी तो रहे है. आज की व्यस्तताओं, महत्वाकाक्षाओं और रिश्तों के अवमूल्यन ने हमें पास रहते हुए भी दूर कर दिया है. हम इसे विकास की विडम्बना कहें या वरदान. हर कुछ गोलमाल सा लगने लगा है. आज बचपन के जिस लंगोटिया यार को अपने देश की मिट्टी से ज्यादा विदेशी संस्कृति से लगाव हो गया है. रामायण-गीता से ज्यादा नीति और शांति विदेशी पुस्तकों में नज़र आती है. जो अपने देश में रहते हुए भी विदेशी जीवन शैली अपनाना अपनी शान समझता है. भारतीय परम्पराओं एवं भारतीयता पर से जिसका विश्वास उठ गया है. हितैषी और स्वार्थी में फर्क करना भूल गया है. ऐसे मित्र को उसकी इस छद्म दुनिया से बाहर निकालने का काम सच्चे मित्रों के अलावा और कोई कर ही नहीं सकता... मुंबई की "एकजुट" संस्था का नाटक "यार बना बडी" इसी विचारधारा को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है. संस्कारधानी जबलपुर के खचाखच भरे तरंग प्रेक्षागृह में विवेचना द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय १७ वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह के अंतिम दिन 'एकजुट' मुंबई की निर्देशिका नादिरा बब्बर ने अपनी टीम के सज्ज़ाद खान, यशपाल शर्मा और राजेश बलवानी के साथ एक नई परिकल्पना के साथ "यार बना बडी" नाटक की समृद्ध प्रस्तुति दी. 
मिथिलेश खुराना (यशपाल शर्मा), कार्तिक कोठारी (राजेश बलवानी) एवं जयदीप वानखेड़े (सज्ज़ाद खान) बचपन के सच्चे और परस्पर समर्पित मित्र हैं. वक्त के साथ और रुचियों के अनुरूप तीनों अपनी अपनी अलग ज़िंदगी जीते हैं. जयदीप पाश्चात्य संस्कृति में इतना डूब जाता है कि वह भारतीयता और अपनों को भी हेयदृष्टि से देखने लगता है. दोस्तों की सोच और बातचीत में भी उसे ओछापन नज़र आता है. यह सब देखकर मिथिलेश चुप नहीं बैठ पाता. वह जयदीप के बेमानी परिवेश, अतिशय फिजूलखर्ची एवं सुगना से मंगनी तोड़ने पर बहुत परेशान होता है. वह तीसरे मित्र कार्तिक के साथ मिलकर अपने मित्र को हक़ीकत की दुनिया में वापस लाने का बीड़ा उठाता है. मित्र की खातिर बेइज्जती, स्वाभिमान यहाँ तक की अपनी पत्नी तक को कही गई अनाप-शनाप बातों पर भी संयम बरतता है. उसका मानना है कि हर रिश्तों से बड़ा मित्रता का रिश्ता होता है. यह अपनी मरजी का रिश्ता है जिसे कभी भी बनाया और कभी भी तोड़ा जा सकता है. एक सच्चा दोस्त भला अपने मित्र की फ़िजूलखर्ची और उसको बिगड़ते भला कैसे देख सकता है. बस ऐसी ही मीठी-नमकीन बातें हैं जो दर्शकों के सीधे दिल में उतर जाती हैं. दोस्तों के बीच गिलेशिकवे, रूठना-मनाना, गाली-गलोच, आरोप-प्रत्यारोप, जयदीप को तरह-तरह से समझाना, उसके अनावश्यक महंगे शौक को औचित्यहीन निरूपित करना जैसे संवादों के दृश्य नाटक के लिए तैयार भव्य सेट के अन्दर बखूबी प्रस्तुत किये गए. इन दोस्तों की तीन चार बैठकों में ही आखिर जयदीप की आँखें खुलती हैं. वह अपने सच्चे मित्रों की मित्रता पहचानता है. अपनी पूर्व मंगेतर सुगना से माफी माँगता है. यहाँ तक कि जापान के मशहूर आर्टिस्ट से ली गई एक करोड़ रुपये की बहुमूल्य कलाकृति को ही मित्रता के आड़े आने की बात कह कर डंडे से तोड़ देना चाहता है. ये आँसुओं से धुले वही पल होते हैं जब तीनों मित्रों की निश्छल , पवित्र और निःस्वार्थ मित्रता नए आयाम तय करती है.

बोलचाल की सीधी-सपाट बयानबाजी, चरित्रों के अनुरूप भाषाशैली, सटीक उत्तर-प्रत्युत्तर, खुशी-ग़म, मिलन-विरह, घमंड-विनम्रता, परस्पर समर्पण भावना की सहज प्रस्तुति एवं भूत-अभूत से हटकर वर्तमान की जानी-मानी बातों का ताना-बाना अर्थात "यार बना बडी" नाटक अपनी पटकथा को लेकर निश्चित रूप से हटकर साबित हुआ है. इस सफल प्रस्तुति के लिए पूरी एकजुट मुंबई बधाई की पात्र है.

समीक्षा आलेख एवं प्रस्तुति :












- विजय तिवारी "किसलय"

सोमवार, 1 नवंबर 2010

नाटक के बहाने- ४ : बचनबद्ध "चरणदास चोर" राजा बनने की बजाय सजा-ए-मौत चुनता है.

छत्तीसगढ़ की लोक परम्पराएँ, जीवनशैली, आदिवासी कलाएँ, पंडवानी सहित लोकगीत एवं नृत्य जगप्रसिद्ध हैं. बाहरी दुनिया से अनभिज्ञ भोले-भाले आदिवासी आज भी पुरानी परम्पराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते जा रहे हैं. इनकी संस्कृति, इनके रहन-सहन और मुरझाए चेहरों का व्यवसायिक लाभ तो सभी उठाते हैं परन्तु वास्तविकता ये है कि आज भी इनका जीवन स्तर अभावग्रस्त ही है. स्वर्गीय हबीब तनवीर जी, तीजन बाई आदि ने विश्व में जो कला की छत्तीसगढ़ी छवि बनाई है उससे बाहरी लोगों का इस ओर निश्चित रूप से झुकाव बढ़ा है.  बदलाव समय का तकाजा है और प्रकृति की नियति भी. छतीसगढ़ कुछ दशकों से प्रगति पथ पर तीव्र गति से अग्रसर हुआ है. लोग जागरूक हुए हैं. प्रगति दूर-दराज़ के गाँवों तक दस्तक दे रही है. साहित्य, संगीत, कला एवं परम्पराओं के ' संवाहक तथा सृजक '  ही समाज में रची-बसी कड़ियों को टूटने नहीं देते.  अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर विधाओं को अगली पीढी तक पहुँचाने का कार्य करने वाले ये व्यक्तित्व पूज्यनीय और चिर स्मरणीय हैं.  इन जाने अनजानों को आज भी वह सम्मान प्राप्त नहीं है जिसके ये वाजिब हकदार हैं.  इनकी प्रशंसा एवं इनका सम्मान ही हमारी कला और संस्कृति का सम्मान है.  कुछ ही लोग होते हैं जिनको अपने कर्म, भाग्य और प्रयत्नों से जगजाहिर होने के अवसर मिलते हैं. शेष उसी माटी में पैदा होते हैं और उसी के इर्दगिर्द अपनी खुशबू फैलाकर दुनिया से विदा ले लेते हैं. छतीसगढ़ी लोकशैली के नृत्य गायन की बात करें तो अनपढ़ तीजन बाई "पंडवानी" के बल पर विश्व स्तरीय ख्याति अर्जित कर चुकी हैं. नाटक और अभिनव की बात करें तो छत्तीसगढ़ के स्वर्गीय हबीब तनवीर का नाम पुस्तक के आमुख की तरह सामने आता है. पूरा जीवन कलासाधना में लगा देने वाले और छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े इलाके का नाम दुनिया के नक़्शे पर उकेरने वाले इस शख्स ने अपने छतीसगढ़ को सदैव सर्वोपरि रखा. आजीवन सक्रिय नाट्यकला से जुड़े रहकर और दक्षता के बल पर अपनी विश्वस्तरीय छाप छोड़ने में भी कामयाब हुए. इनकी अभिनय क्षमता का लाभ सिने-संसार पूरी तरह से नहीं उठा पाया. नया थियेटर संस्था के माध्यम से विभिन्न नाटकों ने प्रसिद्धि पाई है. इनकी इस विरासत को अब उनकी बेटी नगीन तनवीर कितना सम्हालेंगी ये तो वक्त ही बतायेगा लेकिन नया थियेटर में वो बात कहाँ जो हबीब तनवीर के समय थी.

दिनांक ३० अक्टूबर २०१० को जबलपुर के तरंग प्रेक्षागृह में विश्व के कई देशों में धूम मचाने वाले छतीसगढ़ी नाटक 'चरणदास चोर' का मंचन हुआ. अवसर था विवेचना जबलपुर का १७वाँ राष्ट्रीय नाट्य समारोह जिसके पाँच नाटकों में से यह चौथी प्रस्तुति थी. नाटक के नाम से ही तरंग प्रेक्षागृह में दर्शकों की उपस्थिति अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक थी. नाटक 'चरणदास चोर' की शुरुआत ही चोर के पीछे भागती पुलिस के दृश्यांकन से होती है. चरणदास एक चतुर और वाक् पटु युवक है जो चोरी को अपनी रोजी और धर्म मानता है. गाँव में आये संत से गुरुदीक्षा के समय गुरु द्वारा चोरी छोड़ने के स्थान पर अपनी चतुराई और तार्किकता से ऐसे चार वचन दे देता है जो उस जैसे चोर के लिए पाना या तो असंभव थे अथवा वह निर्वहन कर सकता था. उन वचनों में झूठ न बोलना, सोने चाँदी के बर्तनों में न खाना, हाथी पर सवारी न करना और राजा न बनना भी शामिल थे. लेकन भाग्य की बातें किसे पता होती हैं. धीरे-धीरे यही चारों बाते उसके जीवन में घटती हैं और हर बात पर उसे अपने गुरु को दिए वचन याद आ जाते हैं. वचनबद्ध चरणदास चोर वैसा नहीं करता जबकि उसे सलाह दी जाती है कि वह अपने गुरु से ये सब करने के लिए माफ़ी माँग कर स्वीकृति ले ले. उसकी ईमानदारी की बात राज्य की रानी के पास तक पहुँचती है जब राज्य के खजाने से वह मात्र ५ मोहरें चोरी कर ले जाता है . दरबार में बुलाये जाने पर जब उसे १० मोहरों का आरोपी बनाया जाता है और जाँच के दौरान पता चलता है कि पाँच मोहरें तो उन्हीं के मुनीम द्वारा ही चुराईं गईं हैं. उसकी ईमानदारी देख कर रानी उससे प्रभावित होकर सम्मान स्वरूप उसे हाथी पर बैठाकर नगर में घुमाने की आज्ञा देती है परन्तु वचन से बंधे चरणदास द्वारा मना करने पर उसे बंदी बना लिया जाता है. सम्मान की बात कह कर बंदी बनाए जाने पर विचलित रानी उसे अपने पास बुलाती है. यहाँ भावातिरेक की स्थिति निर्मित होती है. रानी एक चतुर और ईमानदार राजा की चाहत में उस से विवाह का प्रस्ताव रखती है . इस बार भी चरण दास की किस्मत वचनबद्धता के कारण मात खा जाती है. जब वह राजा बनना स्वीकार नहीं करता तो रानी उस पर झूठा और संगीन आरोप लगाकर उसे सजा-ए-मौत का आदेश दे देती है. यहाँ नाटक में चरणदास चोर की ईमानदारी और वचनबद्धता राज-प्रासाद, धन-दौलत के साथ-साथ चोरी पर भी भारी पड़ती है. यही नाटक का अंतिम एवं अविस्मरणीय दृश्य दर्शकों के दिल को छू जाता है.
                               जब चोर की ईमानदारी और चरित्र की लोग चर्चा करें तो स्वाभाविक है कि चोर चोर के आलावा भी बहुत कुछ होगा. नायक चरण दास की भूमिका का निर्वहन करने वाले पात्र ने सम्पूर्ण नाटक में दर्शकों को बाँधे रखा. हास्य-विनोद, चपलता और ईमानदारी का मिश्रित घोल सहज ही दर्शकों के गले उतरा. पुलिसकर्मी, संत, पुरोहित के पात्रों का सधा हुआ अभिनय सराहनीय रहा. संगीतबद्ध लोकगीत गायन और समूहगान से नाटक रसमय बना रहा. नाटक में धार्मिक पूजा-पाठ और रामचरित मानस की पंक्तियों से सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं को बल मिला. रानी के रूप में नया थियेटर की संचालिका स्वयं नगीन तनवीर थीं परन्तु वे अपने सपाट संवादों तथा लचर अभिनय से पात्रानुरूप प्रभाव नहीं डाल सकीं जो नाटक की मांग थी. हबीब जी के निर्देशन में, हबीब जी के समय के पात्रों में जो बात और कशिश दर्शकों ने देखी थी वह इस मंचन से नदारत थी. सच ही कहा गया है की प्रसिद्धि स्वयं चलकर नहीं आती, उसके लिए जीवन की आहुति तक देना पड़ सकती है. अंततः हमें खुशी इस बात की है कि जबलपुर में विवेचना और नगीन तनवीर के नया थियेटर भोपाल के कारण जबलपुर के दर्शकों ने विश्वविख्यात नाटक "चरणदास चोर" की प्रस्तुति देखी और उसे समझा. यह जबलपुर के लिए चिरस्मरणीय रहेगा.

 समीक्षा आलेख एवं प्रस्तुति:











-विजय तिवारी " किसलय "