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सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हिंदी फिल्म संगीत में राग तत्त्व के अद्भुत विश्लेषक श्री के. एल. पाण्डेय


                  वैसे तो जबलपुर कला, संगीत, साहित्य, संस्कृति, धर्म एवं सामाजिक गतिविधियों में आदिकाल से ही अव्वल रहा है. संत विनोवा भावे द्वारा नामित "संस्कारधानी" भारतवासियों के लिए कभी अपरिचित नहीं रही. आदिकाल से ही लगातार जबलपुर के खाते में उपलब्धियों की संख्या गुणोत्तर बढ़ती जा रही है. भारतीय नेपोलियन कहे जाने वाले  कलचुरी के कर्णदेव, गौंड वंशीय रानी दुर्गावती, रानी अवंतिबाई,  कृष्णायन महाकाव्य  के रचयिता एवं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र, ओशो, महर्षि महेश योगी,  हरिशंकर परसाई आदि को कौन नहीं जानता. शहर को  अपने पावन-निर्मल-नीर से अभिसिक्त करती पुण्य सलिला माँ नर्मदा लोगों के अंतःकरण और भौतिक शरीर को परिमार्जित करती आ रही है. 
       ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं प्रेम भाईचारे की भावनाओं से ओतप्रोत ऐसा जबलपुर सभी को भाता है. जबलपुर  वासी भी पारखियों की तरह व्यवहार करते हैं. तरह तरह के रत्नों को अपने गले से लगाए रखते हैं. हृदय  में  बसा लेते हैं. जबलपुर  में अल्पावधि के लिए आये लोगों के भी मानस पटल पर जबलपुर अपनी  स्थाई जगह बना ही लेता है. मैं  ये  बात  स्वयं  नहीं  कहता, ये  वे  लोग  आज  भी  कहते  हैं  जो  एक  बार ही जबलपुर  क्यों न आये  हों. विरासत  में मिली इस परम्परा को जबलपुर  का प्रबुद्ध समाज  आज भी कायम रखे हुए है. 
मैंने इन संदर्भित  बातों का उल्लेख यूँ ही  नहीं किया है. इसकी अहम वजह एक  ऐसी सख्सियत है जिसकी विलक्षणता ने  मुझे क्या पूरे जबलपुर को अपनी ओर  आकर्षित किया. उनका ज्ञान, उनका अध्ययन, उनकी रचना-धर्मिता  और  उनका मिलनसारी व्यक्तित्व मुझे अलहदा लगा. आपकी   अभिव्यक्ति  में दृढ़ता, तथ्यों  में प्रामाणिकता, भाषा शैली में  प्रवाह के साथ-साथ रोचकता  हर किसी को  भाती है.
    लखनऊ विश्वविद्यालय से जीव रसायन में निष्णात यह प्रतिभा वर्तमान में मुख्य परिचालन प्रबंधक, पश्चिम मध्य रेल जबलपुर के रूप में हमारे शहर की शान बढ़ा रही है. विश्व के दर्जन भर देशों की यात्राएँ कर चुके ये रेलवे अधिकारी अब तक ६ विभिन्न विषयक गद्य-पद्य की पुस्तकें लिख चुके हैं. सच,  आप की उत्सुकता  निश्चित रूप से बढ़ रही होगी कि आखिर ये  कौन  हो सकते हैं ? तो  मैं बड़े फख्र के साथ  बताना चाहूँगा  कि  आप  आदरणीय श्री के. एल. पाण्डेय के अतिरिक्त  और  कोई हो ही  नहीं  सकते . हिंदी  फिल्म- संगीत और  विभिन्न  रागों के विश्लेषण में आपने  जितना परिश्रम और खोज की है वह  अभिनंदनीय  और  विरल है. आपकी शीघ्र प्रकाशित होने जा रही  लगभग  १२०० पृष्ठ की "हिंदी फिल्म  संगीत  में  राग-तत्त्व " नामक  संगीत से सम्बंधित पुस्तक में १९३१ से २०१२  तक की ३००० फिल्मों के लगभग ८००० गीतों में प्रयुक्त रागों का विस्तृत विवरण एवं  विश्लेषण समाहित है. हिंदी फिल्म संगीत में राग-तत्त्व विषय पर देश के विभिन्न शहरों में आपकी वृहद्-प्रस्तुतियों को सराहना प्राप्त हो रही है.  ये महज इत्तेफाक नहीं है, श्री के. एल. पाण्डेय जी ने स्वर्गीय ठा. शुकदेव बहादुर सिंह  जी से संगीत शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त  भारतीय शास्त्रीय  संगीत का विषद अध्ययन किया है. भारतीय शास्त्रीय, वेस्टर्न क्लासिकल और पुराने हिंदी फिल्म संगीत के संग्रह करने में, श्रवण करने में तथा हिंदी फिल्मों के संग्रह में आपकी विशेष अभिरुचि है. आप के पास  अभी तक  करीब एक लाख पचास हजार गीतों एवं दो हजार हिंदी फिल्मों के साथ ही २०० अंगरेजी फिल्मों का संग्रह हो चुका है.
(द टाईम्स ऑफ़ इंडिया ,अहमदाबाद में प्रकाशित समाचार )

       अभी-अभी  कुछ दिन पूर्व अहमदाबाद में श्री के. एल. पाण्डेय जी द्वारा "हिंदी फिल्म संगीत में राग तत्त्व" विषय पर दिए गए  व्याख्यान एवं प्रस्तुति  को वहाँ के प्रबुद्ध श्रोताओं ने तन्मयता से  सुना, देखा  और सराहा .  अखबारों ने भी प्रमुखता से विवरण प्रकाशित किया.  श्रोताओं द्वारा किये गए गूढ़ एवं कठिन प्रश्नों के सटीक उत्तर एवं प्रामाणिक समाधान किया.

     इस विषय पर आपका कहना  है कि यह  सब  मेरी  रूचि, लगन, अध्ययन तथा खोज-बीन का सुफल  है कि मैं  इतना सब  कर  पा रहा हूँ. श्री पाण्डेय जी को  हमारी  शुभकामनाएँ हैं कि  वे  यूँ ही शिखर  की ओर बढ़ते रहें.

प्रस्तुति-















डॉ. विजय तिवारी "किसलय" 
जबलपुर 

     

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

डॉ. विजय तिवारी 'किसलय' के पास १००० वर्ष से भी ज्यादा पुराना गेहूँ सुरक्षित.

मेरे पास कलचुरियों की राजधानी त्रिपुरी (वर्तमान तेवर ,भेडाघाट रोड, जबलपुर, मध्य प्रदेश ) से प्राप्त १००० वर्ष से भी ज्यादा पुराना गेहूँ सुरक्षित रखा है. गेहूँ के ये दाने पुराने होने के कारण काले पड़ गए हैं. जमीन के नीचे से निकले इन गेहूँ के दानों को सन १९८१ में जब परीक्षण हेतु बीरबल साहनी पेलियो बाटनी इंस्टिट्यूट लखनऊ भेजा गया तो इन्हें करीब ९५० वर्ष पुराना बताया गया. इनको छठवीं शताब्दि यानी कलचुरी कालीन  बताया  गया जैसा सभी जानते हैं कि कलचुरियों का साम्राज्य पाँचवीं सदी से बारहवीं सदी का माना गया है. त्रिपुरी को इसकी यशस्वी राजधानी होने का गौरव हासिल है.
(साधना न्यूज मध्य प्रदेश से साभार,१२अप्रेल २०१२ ) 






- विजय तिवारी 'किसलय'

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

नर्मदाष्टक नित नमन माँ नर्मदे के लोकार्पण अवसर के छाया चित्र


नर्मदाष्टक  'नित  नमन  माँ नर्मदे  के लोकार्पण अवसर के  छाया चित्र.  
नित नमन माँ
(नर्मदाष्टक  नित नमन माँ नर्मदे की आडियो सी डी का लोकार्पण करते हुए दायें से  सर्व प्रथम शीर्षस्थ ब्लॉगर अनूप शुक्ल (फुरसतिया ) , अष्टक रचनाकार विजय तिवारी 'किसलय', शिब्बू दादा , महंत  डॉ स्वामी  मुकुंद दास जी गुप्तेश्वर पीठ,  महान नर्मदा यात्री चित्रकार- लेखक सही अमृत लाल वेगड़, पार्षद अमरीश मिश्रा, कार्यक्रम संचालक भाई राजेश पाठक 'प्रवीण', पुत्र सुविल तिवारी, अंकित तिवारी, पत्नी  श्रीमती सुमन तिवारी.)
नर्मदाष्टक नित  नमन माँ नर्मदे को नीचे  क्लिक कर के सुनें :-









- विजय तिवारी 'किसलय'

विजय तिवारी 'किसलय' कृत नर्मदाष्टक 'नित नमन माँ नर्मदे'

 नर्मदाष्टक 'नित नमन माँ नर्मदे' को  लिखने के पीछे मेरी इच्छा  थी कि संस्कृत में लिखे  गए  
अष्टकों में  आम आदमी माँ की महिमा और  प्रताप  को  समझ ही नहीं पाता था, न ही  माँ के बारे में केवल ८ पदों में कुछ जान पाता था.  मैंने  अपने नित नमन माँ नर्मदे नामक  अष्टक में माँ नर्मदा की जीवनी में यथा संभव  पूर्णता लाने  की कोशिश की है. वैसे  माँ रेवा की  अपरम्पार  लीला को  भला कौन  जान  सकता है मेरी  माँ के चरणों में  एक  छोटी  सी भेंट है. मुझे  उम्मीद है  नर्मदा के  भक्तों को  पसंद  आएगा.

आइये इस  अष्टको  सुनते हैं :-


- विजय तिवारी 'किसलय'

बुधवार, 24 अगस्त 2011

दिनांक २३ अगस्त २०११ को जबलपुर में अन्ना हजारे और जन लोकपाल विधेयक पर केंद्रित कवि सम्मलेन में डॉ. विजय तिवारी 'किसलय' का काव्य पाठ.

दिनांक २३ अगस्त २०११ को जबलपुर में अन्ना हजारे और जन लोकपाल विधेयक पर केंद्रित  कवि सम्मलेन में मेरा   काव्य पाठ. हुआ.














- विजय तिवारी  " किसलय "

सोमवार, 14 मार्च 2011

महँगाई डायन के रूप में होगा होलिका दहन

(अपनी कलाकृति के साथ मूर्तिकार  शक्ति प्रजापति )
                                     देश में महँगाई की भूख इतनी बढ़ गयी है कि   अब मध्यम एवं निचला वर्ग इसका निवाला  बनने  लगा  है. रोजमर्रे की चीजों के मूल्य आसमान छू रहे हैं. लोगों को अपना गुजारा करने में दाँतों पसीना आ रहा है.

                           महँगाई  से तंग आकर सरकार को एक अलग ही तरीके से अपना विरोध  दर्ज कराने का तरीका लोगों ने अख्तियार किया है. हमें पता चला है कि मध्य प्रदेश स्थित  कटनी शहर के युवाओं ने इस बार तय किया है कि वे महँगाई डायन के रूप में  होलिका दहन करेंगे.

                                               इसके लिए  उन्होंने   अपने  इरादों  को  अमल  में  लाने  के लिए  बाकायदा  मूर्तिकार को निर्देशित किया  कि वे अपनी कल्पनाशक्ति से एक सुन्दर, आकर्षक एवं दिशाबोधी होलिका की प्रतिमा का निर्माण करें जो उनकी अपेक्षाओं पर खरी उतरे.इसके लिए शायद कटनी वासियों को जबलपुर के मूर्तिकार एवं चित्रकार शक्ति  प्रजापति पर ही भरोसा था कि वे  ही इस कार्य को बखूबी कर पायेंगे  और  सच मानिए  हुआ भी  ऐसा ही.
                                             आज शाम को जब मैं कार्यालय से लौटते वक्त उनकी कार्यशाला  पहुँचा तो देखा कि वे  अपने  अनुज एवं  जीजाजी  के साथ  कला को मूर्तरूप देने में तल्लीन  थे. प्रतिमा को  देख कर मुझे समझ में  नहीं आ रहा था कि इस फाल्गुन माह में इतनी विकराल, खाने को दौड़ने  वाली तथा  अपने हाव भाव से सब कुछ कह जाने वाली महँगाई जैसी इस युग की कौन सी  राक्षसी हो सकती है?  मेरे पूछने पर  शक्ति जी ने जब  उपरोक्त कहानी कहानी बतायी तो सारा माजरा समझ में आ गया. 

                       शक्ति की कल्पना  ने कलात्मक, आकर्षक,  आदमकद,  उद्देश्यपरक  एवं   बेजोड़ प्रतिमा को सार्थक रूप देकर पहला काम तो कर दिया है और  दूसरा   महत्वपूर्ण कार्य कटनीवासी करने वाले हैं.

                                    अब देखने वाली बात ये है कि देश के  अंधे-बहरे-गूँगे प्रशासन को क्या समझ में आता है.
                                  फिलहाल आप शक्ति प्रजापति की कला का बारीकी से अवलोकन करें.  प्रशंसा  और  अपनी खरी- खोटी  बात  इस अलहदा कलाकार तक अवश्य  पहुँचाएँ.


(शक्ति द्वारा की गयी ये है महँगाई डायन की कल्पना)



(महँगाई डायन पास से )

(महँगाई डायन के साथ देश के नेता-अफसर )

(विजय तिवारी अवलोकन करते हुए)


प्रस्तुति-

-विजय तिवारी 'किसलय'

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

सुगन जाट के छाया चित्रों में प्रकृति के नजदीक रहने की ललक भी दिखाई देती है : सुगन जाट के छाया चित्रों की तीन दिवसीय प्रदर्शनी का शुभारम्भ.


(श्री अजित वर्मा एवं कामता सागर जी )
(स्व. राम मनोहर सिन्हा ) 
                   २३ अक्टूबर २०१० को अपरान्ह ३ बजे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध चित्रकार एवं भारतीय संविधान की मूलकृति के अलंकरणकर्ता स्वर्गीय ब्यौहार राम मनोहर सिन्हा की तृतीय पुण्यतिथि पर " प्रकृति के संवाद " के तत्वावधान में वरिष्ठ छाया पत्रकार श्री सुगन जाट के छाया चित्रों की तीन दिवसीय प्रदर्शनी का शुभारम्भ रानी दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर स्थित कला वीथिका में हुआ. चित्रकार श्री विनय अम्बर ने सुगन जाट की कला यात्रा पर प्रकाशा डाला. भाई सुगन जाट के चित्रों में जिस सजीवता और सांकेतिक भाषा के दर्शन होते हैं वे प्रकृति और समाज की अलग कहानी कहते दिखाई देते हैं . उनके चित्रों में जहाँ मजदूरों की कथा-व्यथा स्पष्ट नज़र आती है वहीं प्रकृति के नजदीक रहने की ललक भी दिखाई देती है. अवसर, समय, समर्पण एवं    उनका नजरिया उन्हें एक दिन शिखर पर पहुँचायेगा ऐसी हमारी अशेष शुभ कामनाएँ.
 
(चित्रकार कामतासागर जी प्रदर्शनी देखते हुये ) 

 
  प्रस्तुति :
-विजय तिवारी "किसलय "

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

प्रकृति के साथ जुड़कर ईश्वर को खोजने की कोशिश- बसंत सोनी, जैविक-कला-चित्रकार.

रानी दुर्गावती संग्रहालय की कला दीर्घा में दिनांक १४ अक्टूबर १० को तीन दिवसीय जैविक-कला की अद्भुत चित्रकला प्रदर्शनी का विधिवत उदघाटन प्रसिद्द चित्रकार श्री अमृत वेगड़ ने श्री ज्ञान रंजन जी एवं श्री कामता सागर जी के साथ किया. "पहल" के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध जैविक-कला-चित्रकार श्री बसंत सोनी के ३२ से अधिक कोलाज दिनांक १४ अक्टूबर १० से १६ अक्टूबर १० तक प्रदर्शन हेतु लगाए गए हैं. इसके पूर्व अहमदाबाद की कंटेमपरेरी आर्ट गैलरी में सप्ताह भर की एकल प्रदर्शनी में श्री सोनी अपनी कला से लोगों को आश्चर्यचकित कर चुके हैं। इन्हें कला एवं संगीत का वातावरण बचपन से ही प्राप्त हुआ है. आपने बचपन में अपने पिता श्री सुन्दर लाल सोनी एवं बाद में श्री कामता सागर जी से कला की बारीकियों को सीखा. वरिष्ठ कलाकारों की सीख एवं निजी कल्पनाओं की सार्थकता धीरे धीरे आज हम सभी देख पा रहे हैं.
प्रदर्शनी के उदघाटन अवसर पर अपने उद्बोधन में उन्होंने बताया कि मैंने प्रकृति के साथ जुड़कर ईश्वर को खोजने की कोशिश की है. ईश्वर ऐसी ही कलाकृतियों और ऐसे ही कोलाज में पाया जाता है. जैविक-कला के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि इन कलाकृतियों के सृजन में काफी समय लगता है. वनस्पति जगत में पाए जाने वाले फूल, पत्ते, छिलके, पेड़ों की छाल आदि का उपयोग अलग-अलग रंगों की सतह (लेयर) के रूप में किया जाता है. पहले इन्हें गर्म पानी में डाल कर उबाला जाता है और सुखाने की प्रक्रिया के बीच इन्हें कोलाज पर रूप देने हेतु सीधा किया जाता है. इन विभिन्न रंगों वाली पत्तियों एवं फूलों आदि में कई छायाकृति, मिश्रित रंग अथवा आकृतियाँ भी अप्रतिम रूप से उभर का सामने आती हैं, मैं इन्हीं छिपी हुई चीजों को उभारता हूँ।





अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री वेगड़ जी ने बसंत सोनी को अनूठी प्रतिभा बताते हुए उनकी कला की भूरी-भूरी प्रशंसा की. इसके पूर्व "पहल" के श्री राजेंद्र चन्द्रकान्त राय ने संचालन के दौरान संस्था 'पहल', श्री बसंत सोनी और उनकी जैविक कला प्रकाश डाला. चित्रकार श्री सुरेश राव ने बसंत सोनी तथा उनके कृतित्व पर भाव-भीनी अभिव्यक्ति दी. उदघाटन समारोह में श्री रामशंकर मिश्र, डॉ. मलय, श्री गर्जन सिंह बरकडे, राजेंद्र दानी, रमेश सैनी, पंकज स्वामी, मनोहर बिल्लोरे, अरुण यादव, विनय अम्बर, सुन्दर लाल पाटकर, डॉ.अनुपम सिन्हा,शरद उपाध्याय,अरविन्द यादव आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही

श्री बसंत सोनी की कुछ जैविक-कला-कृतियाँ

पाठकों के दर्शनार्थ प्रस्तुत हैं :-







प्रस्तुति:
-विजय तिवारी " किसलय "

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

जबलपुर संस्कारधानी के प्रसिद्ध चित्रकार एवं कला परिषद भोपाल से सम्मानित स्वर्गीय अलवन ग्रेगरी के चित्रों में लयात्मकता के कारण एक गति दिखाई देती है - अमृत लाल वेगड़

दिनांक 07 सितंबर 10 को जबलपुर संस्कारधानी के प्रसिद्ध चित्रकार, कला परिषद भोपाल से सम्मानित, सबके चहेते, खुशमिज़ाज़ एवं मिलनसार इंसान श्री अलवन ग्रेगरी के आकस्मिक निधन का दुख किसे नहीं होगा ! स्वर्गीय अलवन ग्रेगरी के निधन पर संस्कार धानी के सभी कला प्रेमियों, मित्रों तथा नाते-रिश्तेदारों ने अपने हार्दिक श्रद्धा सुमन  अर्पित किए.  
                    अलवन ग्रेगरी एक महान ख्यातिप्राप्त प्रदेश एवं देश के चित्रकार थे. शासकीय ललित कला संस्थान जबलपुर में उन्होंने पाँच वर्ष तक चित्रकला की शिक्षा ली. इन्हीं दिनों वे ललित कला संस्थान में जबलपुर के कई प्रसिद्ध कला गुरुओं के संपर्क में आए, जिनमें प्रमुख हैं श्री हरि भटनागर, श्री अमृत लाल वेगड़, श्री कामता सागर, श्री विष्णु चौरसिया और अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त चित्रकार  राम मनोहर सिन्हा आदि.

 इन सभी कला गुरुओं का अलवन ग्रेगरी की कलात्मक सोच पर गहरा प्रभाव पड़ा. इन महान कला गुरुओं में से विष्णु चौरसिया एवं राम मनोहर सिन्हा जी अब इस दुनिया में नहीं हैं. महान कलागुरुओं एवं सहपाठियों ने स्वर्गीय अलवन ग्रेगरी को श्रद्धा-सुमन अर्पित कर अपने विचार व्यक्त किए



                 अलवन ग्रेगरी हमारे मेधावी छात्र रहे . वे आजीवन कला साधना में लगे रहे. उनके सुंदर चित्रों की प्रदर्शनी देखकर बेहद खुशी होती थी. उनके चित्रों में लयात्मकता के कारण एक गति दिखाई देती है. उनकी कल्पना और भावप्रवणता भी बरबस हमारा ध्यान आकर्षित करती है. उनके असामयिक निधन से कला-जगत को भारी क्षति हुई है.
                                                                                       - अमृत लाल वेगड़,
                                                                                         प्रदेश के वरिष्ठ चित्रकार.

                      अलवन ग्रेगरी के निधन का दुखद समाचार सुनकर बहुत दुख हुआ. कला जगत का एक चमकता सितारा डूब गया . मैंने उनकी प्रदर्शनियाँ देखी हैं. मैं उनके चित्रों की कलात्मक विशेषताओं से बहुत प्रभावित हुआ हूँ. व्यक्तिगत रूप से भी मैंने अल्वन ग्रेगरी को खूब समझा और जाना है. वास्तव में वे अच्छे चित्रकार ही नहीं एक अच्छे इंसान भी थे।
                                                                                     
-कामता सागर
                                                                                       वरिष्ठ चित्रकार (आर्टिस्ट मेकर)

            अलबन ग्रेगरी मेरे समकालीन चित्रकार रहे हैं. वे निरन्तर कला साधना में लगे रहते थे. उनके चित्रों में लयात्मकता, रूपांकन, एवं अद्भुत रंगयोजना की प्रधानता थी, जिनसे चित्र आकर्षक लगते थे और विशेष संरचना का आभास होता था. जब उन्हें सफलता प्राप्त होने वाली थी, तभी वे संसार से विदा हो गये. उनके असामयिक निधन से कलाजगत को भारी क्षति हुई.
                                                                                   -सुरेश कुमार श्रीवास्तव
                                                                                    राष्ट्रस्तरीय वरिष्ठ चित्रकार

                                 ग्रेगरी के चित्र किसी भी मीडियम में बने हों , वे प्रभावोत्पादक होते थे. कैनवास, कागज या अन्य वस्तुओं पर ब्रश को रंगों में डुबोकर सॉफ्ट स्ट्रोक्स लगाना तथा एक रंग को दूसरे रंग में विलय कर के अलग प्रभाव देना उनकी विशेषता थी. झाड़ियाँ, पत्थर, आकाश, झरने एवं मानवाकृतियाँ सब कुछ उनके लैण्डस्केप में संयोजित रहते जो सभी के ध्यानाकर्षण का केन्द्र हुआ करते थे. यथार्थवादी चित्रण के अलावा वे मार्डन पेण्टिग भी अपनी शैली में किया करते थे. जहाँ तक चित्रकारों की शैली का सवाल है   अलवन ग्रेगरी के चित्रों की शैली मौलिक थी. हर कलाकार अपने ढंग से ब्रश चलाता है. इस प्रकार अलग अलग ब्रश चलाने से कलाकारों की अलग अलग शैली भी बन जाती है. सम्भवतः ग्रेगरी के ब्रश चलाने का अपना अलग तरीका था जो चित्रकारी की एक अलग शैली को जन्म देता प्रतीत होता है और अलबन ग्रेगरी की यही शैली अन्य चित्रकारों के चित्रों को मौलिक रूप से अलग करती है.
चित्रों के चित्रांकन का कितना भी वर्णन किया जाये, अधूरा ही है, क्यों कि चित्र आँखों से देखी जाने वाली चीज है. चित्रकला को न कोई सुन सकता है और न कोई शब्दों जैसा पढ़ सकता है. जब तक हम   अलवन ग्रेगरी के चित्रों को नहीं देखेंगे, तब तक संयोजन, रंग-रूप, रेखाओं की प्रभावोत्पादक भाषा नहीं समझ पायेंगे. इस संदर्भ में स्वर्गीय   अलवन ग्रेगरी के चित्रों की प्रदर्शनी नगर की कलादीर्घा में अतिशीघ्र लगाने हेतु मध्यप्रदेश आर्टिस्ट फोरम जबलपुर द्वारा प्रयास किये जा रहे हैं. इस तरह अद्भुत कलात्मकता,  मिलनसारिता एवं दृश्यों को अपने नजरिये से देखकर उकेरने की क्षमता ने अलबन ग्रेगरी को बहुमुखी प्रतिभा के रूप में अमरता प्रदान की है.
-श्री सुभाष खरे.
वरिष्ठ चित्रकार, जबलपुर.

                    अल्बन ग्रेगरी मेरे एक अच्छे मित्र थे. जब तक वे मध्य प्रदेश विद्युत मंडल जबलपुर पदस्थ रहे, हमारी उनसे मुलाकात होती रहती थी. मंडल के वार्षिक कलेण्डरों में उनके चित्रों को देख देख कर उन्हें सदैव याद करते रहते थे. उनके घर पर भी हमने उन्हें अपनी चित्रशाला में तूलिका से जादुई करिश्मा करते देखा है. आधुनिकता के युग में उन्हें कंप्यूटर पर भी चित्रों को एडिट करते देखा है. घर हो या दफ़्तर, उनकी मुस्कराहट और मिलनसारिता बिसराना हमारे बस में नहीं है. उन्हें चित्रकार के रूप में सभी जानते हैं लेकिन मैंने उन्हे जिस नेक इंसान के रूप में जाना है वह आज के युग में दुर्लभ है. जबलपुर के गिरजाघरों और विद्यालयों में उनकी पेंटिंग उनके व्यक्तित्व को उजागर करती है. उनके हर चित्र निराले और उद्देश्यप्रधान होने के साथ साथ हमे प्रकृति, प्रगति, स्नेह, शांति और सादगी के पथ पर चलने हेतु प्रेरित करते हैं. मैं चित्रकार तो नहीं हूँ मगर एक कवि और साहित्यकार होने के नाते चिंतन -धारा से ज़रूर जुड़ा हुआ हूँ और उनकी तूलिका के पीछे उनकी मेहनत और लगन का मूल्यांकन अवश्य कर सकता हूँ. इस के साथ ही हम कह सकते हैं कि स्वर्गीय अलवन ग्रेगरी वाकई एक सुलझे और सही मायने में इंसान थे.
                                                                                   -विजय तिवारी " किसलय '
                                                                                    कवि एवं पत्रकार.

आलेख एवं परिकल्पना:- श्री सुभाष खरे. वरिष्ठ चित्रकार, जबलपुर.















 
प्रस्तुति:-
-विजय तिवारी " किसलय '

रविवार, 26 सितंबर 2010

आंचलिक साहित्यकार परिषद जबलपुर की साहित्य सभा में सद्भावना का संकल्प.

विगत २२ सितम्बर-१० को जबलपुर के गांधी भवन परिसर  में  गांधी  जी की प्रतिमा के समक्ष आंचलिक साहित्यकार परिषद जबलपुर द्वारा  आयोजित  साहित्य  सभा में संस्कारधानी जबलपुर के साहित्यकारों ने सद्भावना का संकल्प लिया. सभी ने समवेत स्वर में सामाजिक सद्भाव और भाईचारे  हेतु सक्रियता की बात कही. साहित्य सभा में पंडित रूद्र दत्त दुबे "करुण " एवं साथियों ने प्रेम भाईचारे के गीत प्रस्तुत किये.  कार्यक्रम   में प्रोफ़ेसर राजेन्द्र तिवारी  'ऋषि' ,  वरिष्ठ   कलासाधक  श्री कामता सागर,  ओंकार  श्रीवास्तव,  प्रो. जवाहर लाल 'तरुण',  डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव, प्रो. राजबहादुर सिंह 'रज्जू भैया', रामेश्वर नीखरा,  प्रमोद  तिवारी मुनि',  रमाकांत गौतम ,  मणि मुकुल,  विजय नेमा अनुज,  नीलेश रावल, प्रतुल श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे.
 प्रस्तुति:-
विजय तिवारी " किसलय "

बुधवार, 22 सितंबर 2010

वर्तमान पीढी द्वारा पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण हमारे लिए दुर्भाग्यजनक है - डॉ. नलिनी श्रीवास्तव

त्रिवेणी परिषद् जबलपुर मध्य प्रदेश, भारत द्वारा भातखंडे संगीत महाविद्यालय प्रेक्षा गृह में महादेवी वर्मा स्मृति एवं हिन्दी गरिमा दिवस तथा संस्था के रजत जयन्ती वर्ष के कार्यक्रम.

विगत दिवस त्रिवेणी परिषद् जबलपुर, मध्य प्रदेश, भारत द्वारा भातखंडे संगीत महाविद्यालय प्रेक्षागृह में महादेवी वर्मा स्मृति एवं हिन्दी गरिमा दिवस तथा संस्था के रजत जयन्ती वर्ष के कार्यक्रम आयोजित किये गए. कार्यक्रम की शुरुआत वन्दे मातरम, सरस्वती पूजन और पंडित गोविन्द प्रसाद तिवारी के गीत एक राष्ट्र भाषा हिंदी में कोटि कोटि जनता की जय हो से हुई.
कार्यक्रम संचालिका साधना उपाध्याय द्वारा मंचासीन अतिथियों का संस्था-सदस्यों के हाथों स्वागत कराया गया. इस अवसर पर मुख्य अतिथि की आसंदी से स्वर्गीय पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की पौत्री एवं सेंट थामस महाविद्यालय भिलाई की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. नलिनी श्रीवास्तव ने महादेवी जी के व्यक्तित्व तथा  कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि उनकी लेखनशक्ति सजीव एवं जीवन्त है. रचनाएँ मर्म स्पर्शी हैं. कुछ ऐसे है जो नदी की धार में बह जाते हैं पर कुछ हैं जो इतिहास बनाया करते हैं, महादेवी जी ऐसी ही प्रतिभा थीं. उन्होंने आगे कहा कि हमारी वर्तमान पीढी भारतीय संस्कृति को भुलाकर पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण कर रही है जो हमारे लिए दुर्भाग्यजनक है, ऐसे में हमारा दायित्व बनता है कि हम आगे आकर उन्हें अपनी संस्कृति परिचित कराएँ. विशिष्ट अतिथिकी आसंदी से झूले लाल मंदिर प्रबंध समिति प्रमुख श्री मोती लाल पारवानी ने त्रिवेणी परिषद के रजत जयंती वर्ष पर शुभकामनाएँ देते हुए देश को एक सूत्र में पिरोने हेतु हिन्दी की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया. कार्यक्रम अध्यक्ष प्रबुद्ध साहित्यमनीषी डॉ. गोकर्ण नाथ शुक्ल ने आयोजक " त्रिवेणी परिषद  "  को उनके सद्प्रयासों की सराहना की.  उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि हिन्दी हमारी अस्मिता की पहचान है और महादेवी वर्मा इस अस्मिता की प्रखर प्रतिनिधि कवयित्री हैं. हिन्दी की गौरव वृद्धि के लिए कोरे प्रदर्शन नहीं ईमानदारी पूर्वक प्रयत्न किये जाने चाहिए.
इस सारगर्भित आयोजन एवं श्रोताओं की गरिमामय उपस्थिति में मुख्य अतिथि डॉ. नलिनी श्रीवास्तव को त्रिवेणी परिषद सहित नगर की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया.
कार्यक्रम के प्रथम चरण में जबलपुर संस्कारधानी के सिंधी मातृभाषियों द्वारा यादगार पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रभाषा की सेवा के लिए पत्रिका-सम्पादक श्री दिलीप तलरेजा एवं श्री माधव कुन्दनानी सहित सिन्धु समाज के प्रतिनिधियों को " ऊषा देवी मित्रा अलंकरण"  प्रदान किया गया. नवांकुरित लेखिकाओं हेतु प्रतिस्थापित "सुनीति सक्सेना पुरस्कार" लेखिका एवं शिक्षिका श्रीमती विनीता श्रीवास्तव को दिया गया. बारहवीं बोर्ड परिक्षा २०१० में शास्त्रीय संगीत विषय पर जबलपुर में सबसे अधिक अंक अर्जित करने पर मालती बाई ताम्हनकर पुरस्कार कुमारी कंचन महेश कोष्टा को दिया गया. इसके बाद रचना कुन्दनानी ने स्वरचित हिन्दी कविता मैं औरत हूँ .. सब सहती हूँ , पर कुछ नहीं कहती हूँ .. गाकर वाहवाही लूटी.  लता लालवानी, विजय जादवानी ने भी अपनी रचनाएँ सुनाई. अबीरा दांडेकर ने महादेवी जी की रचना सजल कितना है सवेरा ... व नेन्सी ब्राउन ने तुम सो जाओ मैं गाऊँ... रचना का गायन किया . देवेन्द्र नाथ शुक्ला ने दुष्यंत कुमार रचना हो गयी है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए... का तथा तनु मिश्रा ने शरद नामदेव के रचनाओं का पाठ किया.
इस कार्यक्रम में डॉ. राजकुमार सुमित्र, डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे, वीणा तिवारी, आभा दुबे, चंद्रा भालेराव, गायत्री तिवारी, मनीषा गौतम, राजेश पाठक प्रवीण एवं सिन्धु समाज के सदस्यों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही.
कार्यक्रम के आभार का दायित्व-निर्वहन डॉ. अंजली शुक्ला द्वारा किया गया.
प्रस्तुति :-














डॉ. विजय तिवारी " किसलय "