हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर
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रविवार, 10 मई 2009
इक छोटी सी चिनगारी, अंगार बन गई।
जो इलाज़ थी मेरी
नासूर बन गई
वो पास आकर न जाने
क्यों दूर हो गई
उसे फूल था बनना
कटार बन गई।
इक छोटी सी चिनगारी
अंगार बन गई।
गैर न थी फ़िर भी
अंजान बन गई
वो ईमान थी मेरी
बे-ईमान बन गई
अब तो आरजू भी अपनी
तकरार बन गई
इक छोटी सी चिनगारी
अंगार बन गई।
-
विजय
नौकरी वाली पत्नी.....
प्रतिदिन उठते ही हो जाती है
यंत्रवत गृह कामों में व्यस्त।
कार्यालय की दूरी
समय की मजबूरी
बच्चों की तैयारी
ट्रेफिक की मारामारी।
भीगे वस्त्र और तन
धूप हो या ठिठुरन
हमेशा अड़चन।
ऑफिस में देर
घर में अबेर
ख़ुद परेशान
बच्चे हैरान
ऑफिस जाना
वापस आना।
सुबह का खाना
शाम को फिर से भोजन पाकाना
कई बार सोचा
ये इन्सान है
या मशीन .....
- विजय
सोमवार, 5 जनवरी 2009
आतंकवादी
लुटकर
चैन
हड़पकर
खुशियाँ
आतंकवादी
बढ़ रहे
और
ह
म
हैं
कि
शान्तिमार्ग
पर
चल रहे
-
किसलय
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