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शनिवार, 24 सितंबर 2011

बेटी बचाओ अभियान : कन्या भ्रूण ह्त्या निश्चित तौर पर एक जघन्य सामाजिक बुराई है.

बेटी बचाओ अभियान


                    कन्या भ्रूण ह्त्या निश्चित तौर पर एक जघन्य सामाजिक बुराई है.  सरकारी एवं गैर  सरकारी संस्थाओं, संगठनों, आम तथा खास सभी को भ्रूण ह्त्या पता लगाने एवं रोकने हेतु प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है. समाज में महिलाओं  के  प्रति  नकारात्मक सामाजिक सोच के फलस्वरूप ही बेटियों में शिक्षा का वांक्षित स्तर नहीं बढ़ सका है. दहेजप्रथा कन्या भ्रूण ह्त्या का मूल कारक माना जा सकता है. इसके विरुद्ध कठोर एवं प्रभावी कानून बनाए जाने की आवश्यकता है. माता-पिता की बेटियों के प्रति असुरक्षा की भावना भी एक कारण है जिसके तहत बेटी का घर से बाहर निकालना,  विद्यालयों
में आये दिन अश्लील हरकतें प्रकाश में आना,  अस्पतालों में चिकित्सकों से डर,  सडकों
 पर दोपाये  जानवरों की कुत्सित भावनाएँ,सरकारी एवं गैर सरकारी कार्य के दौरान अभिभावकों  में शंका- कुशंकाओं को जन्म देता है.

आज लक्ष्मी, मैत्रेयी, गार्गी, महादेवी जैसी विलक्षण महिलाओं के देश में बेटियों का पैदा होना चिंता का विषय बन जाता है जबकि हमें स्वयं को गर्वित होना चाहिए कि बेटों से ज्यादा माँ-बाप से भावनात्मक रूप से बेटियाँ ही जुड़ी होती हैं. घर एवं समाज में बेटियों की अहमियत से सभी भलीभाँति परिचित हैं. आज के बदलते परिवेश में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बेटियों का सुनहरा भविष्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा है. बेटा-बेटी में फर्क करने से सबसे पहले ममतामयी माँ का हृदय ही आहत होता है. ऐसे समय में माँ की दृढता, आत्मविश्वास एवं जवाबदेही और बढ़ जाती है. उसे समाज, परिवार और स्वयं पर भी जीत हासिल करना होगी. जब बेटियों को समाज और शासन आगे बढ़ने का मौका देने लगा है तब यह भेद कैसा? यह तो सृष्टि से बगावत ही कहा जाएगा. आज हमें स्वीकारना ही होगा कि कन्या भ्रूण हत्या, बेटों की चाह के अलावा और कुछ भी नहीं है जिसे पुरुष प्रधान समाज में बड़ी अहमियत के तौर पर देखा जाता है तथा बेटियों के विषय में हीन भावना के परिणाम स्वरूप कन्या भ्रूण ह्त्या की जाती है. यह तय है कि पुरुष प्रधान समाज में इस भावना की जड़ें अभी तक जमी हुई हैं.

यूनिसेफ के अनुसार भारत में लगभग ५ करोड़ बेटियाँ एवं स्त्रियाँ गायब हैं. विश्व के अधिकतर देशों से तुलना की जाये तो भारत में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या कम होती जा रही है. संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार भारत में अनुमानतः प्रतिदिन २००० हजार कन्या भ्रूण हत्याएँ अवैध रूप से होती हैं जिससे बाल अत्याचार, विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध तथा यौनजनित हिंसा को बढ़ावा मिला है. यह एक विकासशील राष्ट्र के लिए बुरा संकेत है.२०११ की जनगणना में सामने आये आँकड़ों में कम शिशु लिंगानुपात ने देश की चिंता बढ़ा दी है. ऐसे में इस समस्या के निराकरण हेतु विशेष कार्ययोजना की आवश्यकता प्रतीत होती है.

जिस देश का इतिहास स्त्रियों की सेवा-भावना, त्याग और ममता से भरा पड़ा हो वहाँ अब उसी के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाना पुरुषों के लिए लज्जा की बात है. हीन विचारधारा एवं रूढ़िवादी प्रथाओं के कम होने पर भी कन्या भ्रूण ह्त्या का प्रतिशत बढ़ना हमारे समाज के लिए घातक हो सकता है. वंश परम्परा का प्रतिनिधित्व, बुढापे में सहारा की निश्चिन्तता एवं आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए परिवार में बेटों को प्रधानता दी जाती है. इसी सोच ने धीरे धीरे अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं

अब शिक्षा के सुधरते स्तर से इस कुप्रथा को उखाड फेकने की संभावना बढ़ी है परन्तु यह भावना अभी ग्रामीण एवं पिछड़े वर्ग तक पहुँचना शेष है. परमात्मा यदि सृष्टि निर्माता है तो नारी संतान का निर्माण करती है, जिससे समाज का अस्तित्व जुड़ा है फिर बिना नारी के समाज का बढ़ना क्या संभव है?

वर्तमान में नारी का आत्मनिर्भर होते जाना, सकारात्मक योगदान एवं घर-बाहर सामान रूप से अपनी योग्यता का लोहा मनवाना क्या हमारे लिए प्रमाणिक तथ्य नहीं है? फिर कन्या भ्रूण ह्त्या किस मानसिकता का द्योतक है? कन्या विरोधी मानसिकता केवल अशिक्षित एवं पिछड़े वर्ग में ही बलवती नहीं है, इसकी जड़ में ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं दैविक मान्यताओं तथा रूढ़िवादी प्रथाओं का ज्यादा हस्तक्षेप समझ में आता है. हमें इन विद्रूपताओं से निपटने के लिए अब आगे आना बेहद जरूरी हो गया है. पारिवारिक कार्यों में सहभागिता, व्यवसाय-भागीदारी में विश्वसनीयता एवं उत्तराधिकार के साथ साथ बुढापे में सहारे के रूप में बेटियों की अपेक्षा बेटों को ही समाज में मान्यता प्राप्त है. लड़का घर की उन्नति में सहयोग एवं श्रीवृद्धि करता है जबकि बेटियाँ पढ़ाई-लिखाई और पालन-पोषण के खर्च के बाद भी माता पिता को दहेज के बोझ से दबा कर पराये घर चली जाती हैं. इन सबके अतिरिक्त धार्मिक कार्यों में हिन्दु प्रथाओं के अनुसार केवल बेटे ही सहभागी बन सकते हैं. आत्मा की शान्ति हेतु बेटे द्वारा ही माता पिता को मुखाग्नि देने की मान्यता है. ऐसा नहीं है कि शासन के प्रयास कम हैं, परन्तु उनके क्रियान्वयन में कहीं न कहीं कमी के चलते अपेक्षित परिणाम हमारे सामने नहीं आ पाते वहीं हमारे समाज की उदासीनता भी आड़े आती है. समाज का इस विषय पर जागरूक होना अब अत्यावश्यक हो गया है. शासन के दहेज विरोधी क़ानून, शिशु लिंग की जानकारी के विरुद्ध क़ानून, बेटी की पैतृक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी के क़ानून एवं बेटियों के अधिकार के क़ानून लागू किये जाना इसके उदाहरण समाज के सामने हैं. यह मिशन तब सफल होगा जब नेता, अफसर और आम जनता में एक समन्वय स्थापित होगा.

पश्चिमी देशों के अंधानुकरण से भारत में भी अत्याचार, नारी अपमान, यौन शोषण की घटनाएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं. गांधी, बुद्ध और महावीर के देश में अब आध्यात्म एवं अहिंसा ने भी किनारा कर लिया है. कन्या भ्रूण ह्त्या एक अमानवीय तथा क्रूर कृत्य है. अहिंसा-प्रधान देश में कलंक है. यह सब हमारे दिमाग से उपज कर समाज में फ़ैली कुप्रथाओं-परम्पराओं का कुपरिणाम कहा जा सकता है. हम कन्या जनित अपमान, बेबसी, दहेज, असुरक्षा जैसे कारकों से प्रभावित हो गए हैं, जो अब शिक्षित समाज से खत्म होना चाहिए. आज अत्याधुनिक तकनीक ने कन्या भ्रूण परीक्षण के उपरान्त कन्या भ्रूण ह्त्या का औसत बढ़ा दिया है. यहाँ दुःख की बात यह भी है कि वह नारी समाज जो नारी अस्मिता, फ़िल्मी कल्चर, ब्यूटी काम्पटीशन, काल गर्ल एवं वेलेंटाइन कल्चर का पुरजोर समर्थन करता है, वही कन्या भ्रूण ह्त्या से जुड़े सवाल पर सकारात्मक तथा कड़ा प्रतिरोध क्यों नहीं करता ?

बेटी बचाओ अभियान के सन्दर्भ में कहा जा रहा है कि प्रदेश के मुख्य मंत्री से लेकर चपरासी तक इस कार्यक्रम को सफल बनाने में जुट गए हैं. अब यह देखना बाकी है कि इस अभियान की रूप-रेखा, दिशा-निर्देश औए कार्यान्वयन का स्वरूप कितना कारगर बनता है. यहाँ मैं यह बताना आवश्यक समझता हूँ कि सर्वप्रथम शासकीय, अशासकीय एवं प्रदेश की जनता की सहभागिता सुनिश्चित करने हेतु भी कार्य योजना पर समग्र दृष्टिपात करना होगा.

बेटियों के सम्मान एवं भेदभाव की समाप्ति हेतु राज्य में व्यापक स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है. कन्या भ्रूण ह्त्या के प्रति लोगों को हतोत्साहित करना इस मिशन का मुख्य मकसद है. यह ‘हतोत्साह’ समाज में कैसे और किन किन सुविधाओं तथा क़ानून से संभव है. यह काम सरकार को प्रमुखता से करना होगा. पिछड़ी एवं गरीब जनता को सामाजिक सुरक्षा, सहायता, बेटियों की विकासपरक योजनायें कारगर हो सकती हैं. जब तक समाज कन्या को बोझ समझना बंद नहीं करेगा, तब तक इस मिशन पर अनवरत कार्य करने की आवश्यकता है.

जानकार सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि कन्या भ्रूण ह्त्या ९ प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रही है. केवल डॉक्टरों पर अंकुश लगाने से इस भ्रूण ह्त्या का ग्राफ कम होने से रहा. कन्या भ्रूण ह्त्या करने वाले, कराने वाले तथा प्रत्यक्ष दर्शियों पर भी नज़र रखने हेतु शासन को कठोर कदम उठाने की जरूरत है. वैसे हम यह भी कह सकते हैं कि यदि यह कुप्रथा नहीं बढ़ रही होती तो बेटी का लिंगानुपात क्यों कम होता. कन्या-क्रच, स्ट्रिंग ऑपरेशन ग्रुप रैलियाँ, कन्या दिवस, लाडली लक्ष्मी योजना या फिर विभिन्न प्रोत्साहन योजनाओं को क्यों चलाना पड़ता. इसका सीधा सा आशय है कि अभी तक हम कन्या भ्रूण ह्त्या पर वांछित अंकुश लगाने में असमर्थ रहे हैं.

भारत की २००१ की गणना में सामने आये तथ्यों में बेटियों के घटते लिंगानुपात से चिंतित होकर शासन ने इस दिशा में अपने प्रयास तेज कर दिए थे फिर भी नई नई भ्रूण परीक्षण की सुविधाओं एवं बच्चियों के प्रति उदासीनता के चलते इस अनुपात में गिरावट जारी है. अब तो मात्र ५ सप्ताह के भ्रूण का लिंग परीक्षण करने वाले अत्याधुनिक रक्त परीक्षण किट ‘बेबी जेंडर केंडर’ के चलन से कन्या भ्रूण हत्या और भी आसान हो गई है. इसका उपयोग अविलम्ब प्रतिबंधित होना चाहिए.

आज जब बेटियाँ अनेक क्षेत्रों में बेटों से भी आगे निकल चुकी हैं, अब बेटा बेटी में भेदभाव समाप्त हो जाना चाहिए और माँ-बाप को निश्चिन्त होकर हर क्षेत्र में उसकी भागीदारी से सहमत होना चाहिए. बेटे के जन्म की तरह ही जब तक बेटी के जन्म पर समाज हर्षित नहीं होगा तब तक हमारे समाज का समग्र विकास संभव नहीं है. हमारे प्रधान मंत्री डॉ. सिंह ने भी कहा है कि कन्या भ्रूण ह्त्या अस्वीकार्य अपराध है जिसे व्यापक रूप से नवीन तकनीकों के दुरुपयोग से बढ़ावा दिया जा रहा है तथा जिसका विचारहीन व्यापारिक दुरुपयोग रोकना चाहिए.

हमें भी अपनी मानसिकता को बदलना होगा और याद रखना होगा कि भ्रूण में भी जीव होता है जिसकी ह्त्या करना हिंदू धर्मानुसार पाप माना गया है. इस पाप की सहज स्वीकृति परिवार के सारे सदस्य कैसे दे सकते हैं? अंध विश्वास, पाखण्ड एवं सामाजिक कुरीतियों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों एवं समाज की जागरूक जनता भी परस्पर समन्वय स्थापित करे. अभी तक बेटियों की स्थिति ज्यादा सुदृढ़ नहीं हो पाई है. आज भी पिता होने का मतलब अपना सिर झुकाना ही कहलाता है. बेटियों के विवाह में आर्थिक बोझ पड़ता ही है. कभी कभी तो विवशता में बेटी, पिता या माँ, भाई आत्महत्या तक करते पाए गए हैं.

वक्त धीरे धीरे बदल रहा है. भ्रूण हत्या के साक्षी होने पर हमें आगे आकार प्रतिरोध और कानूनी कार्यवाही में अपना सहयोग प्रदान करना चाहिए. केवल अफ़सोस भर करके चुप नहीं बैठना चाहिए. डॉक्टरों को चंद पैसों की लालच में कंस नहीं बनाना चाहिए. भ्रूण हत्या करने वाले परिवारों का समाज द्वारा बहिष्कार किया जाना चाहिए. इस लिए अब समय की यही पुकार है कि हम सब एक सचेतक की भूमिका का निर्वहन करें तभी हम इस कन्या भ्रूण ह्त्या के घिनोने कृत्य पर अंकुश लगाने में सफल होंगे. केवल बयानबाजी, भाषणबाजी, नारेबाजी, सभाओं, कार्यशालाओं से कुछ नहीं होने वाला. मेरे विचार से बेटी बचाओ अभियान को प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, इंटरनेट, ब्लाग्स, नुक्कड़, नाटक, रैलियाँ, नारालेखन, पेम्पलेट्स, एस एम एस के माध्यम से व्यापक प्रचारित-प्रसारित कर सफल बनाया जा सकता है. मैं भी इस “बेटी बचाओ अभियान” से जुड कर अधिक से अधिक सहभागिता प्रदान करने में अपने आप को धन्य समझूँगा. जय भारत.

- विजय तिवारी “किसलय”
२४१९, विसुलोक, मधुवन कालोनी,
विद्युत उप केन्द्र के आगे, उखरी रोड,
जबलपुर (म.प्र.) ४८२००२.

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

विवेचना जबलपुर : एक विहंगावलोकन - १९९४ से लगातार शिखरोन्मुखी सफ़र.

विवेचना द्वारा सन् 1994 से राष्ट्रीय नाट्य समारोह का आयोजन शुरू किया गया है। विवेचना का नाट्यदल पूरे देश में जाकर नाटकों का मंचन करता है। विवेचना के नाटकों के नियमित मंचन होते रहते हैं पर जबलपुर में ऐसे अवसर कम आते हैं जब दर्शक दूसरी संस्थाओं और निर्देशकों के नाटक देख सकें। विवेचना के द्वारा शुरू किये गये राष्टीय नाट्य समारोह के कारण जबलपुर और आस पास के शहरों कस्बों के रूचिसंपन्न दर्शकों को देश के प्रमुख निर्देशकों के नाटक देखने को मिले। इससे उन्हें देश के नाट्य संसार का परिचय मिला। विवेचना के अब तक आयोजित समारोहों में सर्वश्री हबीब तनवीर, बा.व.कारंत, बंसी कौल, सतीश आलेकर, जुगल किशोर, तनवीर अख्तर, दिनेश खन्ना, नादिरा बब्बर,दर्पण मिश्रा, अरूण पांडेय, उषा गांगुली, देवेन्द्र पेम, अरविंद गौड़, पियूष मिश्रा, रंजीत कपूर, नवीन चौबे, अनिलरंजन भौमिक, संजय उपाध्याय, इप्टा भिलाई श्रवण कुमार, वेदा राकेश, नजीर कुरैशी, बलवंत ठाकुर, के.जी.त्रिवेदी , भूषण भट्ट, जावेद जैदी, श्रीमती गुलबर्धन, अलखनंदन, लईक हुसैन, कमलेश सक्सेना, पंकज मिश्रा, विजय कुमार, अजय कुमार, विवेक मिश्रा, अशोक राही, वसंत काशीकर, श्यामकुमार, किशोर कुलकर्णी , दिनेश ठाकुर, जे पी सिंह अतुल पटेल, मानव कौल, एम सईद आलम महमूद फारूखी के नाटक मंचित हो चुके हैं। विवेचना के विभिन्न समारोहों में नादिरा बब्बर, सरिता जोशी, आशीष विद्यार्थी , सुनील सिन्हा, नेहा शरद, टॉम आल्टर जूही बब्बर आदि अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुके हैं।

विवेचना का पहला नाट्य समारोह बहुभाषी था। इसमें हिन्दी के अलावा मराठी और बंगला के नाटक भी आमंत्रति किए गए। पर बंगाली दर्शकों के उत्साह प्रदर्शन में कमी के कारण बंगला नाटकों का मंचन संभव नहीं हुआ। सतीश आलेकर का नाटक महानिर्वाण पूना की टीम के उत्साहवर्धक सहयोग के कारण संभव हो पाया। पहले नाट्य समारोह का उदघाटन स्व हबीब तनवीर ने किया। समारोह में हबीब साहब ने देख रहे हैं नैन का मंचन किया। यह मंचन आज भी दर्शकों को याद है। दूसरे दिन बंसी कौल के निर्देशन में वह जो अक्सर झापड़ खाता है का मंचन हुआ। नाटक बंसी कौल की डिजायन के कारण यादगार रहा। यह इस नाटक का पहला प्रदर्शन था जो अपेक्षित प्रशंसा नहीं बटोर सका। तीसरे दिन बा व कारंथ के निर्देशन में श्रीराम सेण्टर , दिल्ली के कलाकारों ने बाबूजी का मंचन किया। इसमें राजेश तिवारी ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। उनका अद्भुत अभिनय दर्शकों को बहुत भाया। बाबूजी के मंचन ने धूम मचा दी और पहले समारोह का यह नाटक दर्शकों की भारी उपस्थिति के कारण भी याद किया जाएगा। चौथे दिन महानिर्वाण का मंचन हुआ था। पूना के कलाकारों ने नायाब प्रस्तुति दी। हालांकि मराठी दर्शकों की उपस्थिति बहुत कम थी।

विवेचना के एक साथी ने मुंबई में नादिरा बब्बर का एक नाटक बात लात की हालात की देखा। उनका ब्रोशर लाए। नादिरा जी से बात की गई । वो जबलपुर आने को सहर्ष तैयार हो गईं । दूसरे समारोह में उनके दो नाटक हुए। बात लात की और संध्या छाया। इन नाटकों ने जबलपुर में धूम मचा दी। और इसी के साथ नादिरा जी का जबलपुर बार बार आना तय हो गया। तीसरे समारोह के समय विवेचना का गोआ दौरा हुआ। वहाँ उषा गांगुली अपने दल के साथ आई हुईं थी। उनसे बात हुई । परिणामस्वरूप तीसरे नाट्य समारोह में उषा गांगुली के दो नाटक हुए। रूदाली और कोर्ट मार्शल । इसी समारोह की एक और उपलब्धि थी फिरोजखान निर्देशित नाटक आल द बेस्ट। इस नाटक नेदर्शकों को हँसा हँसा के लोटपोट कर दिया। यह अकेला नाटक तरंग प्रेक्षागृह में हुआ था।

इस दौरान नाट्य समारोह की दर्शक  संख्या बढ़ चुकी थी। इसीलिए चौथे समारोह के समय राष्टीय नाट्य समारोह का आयोजन शहीद स्मारक से उठकर मानस भवन आ गया। इस साल सन् 1997 में हबीब तनवीर का नाटक वसंत ऋतु का अपना कामदेव का सपना नाटक मंचित हुआ। इसी साल पहली बार अरविंद गौड़ का नाटक फाइनल साल्यूशंस मंचित हुआ। सन् 1998 में पांचवे   समारोह में अरविंद गौड़ का नाटक एक मामूली आदमी बहुत पसंद किया गया वहीं नादिरा बब्बर के नाटक दिल ही तो है ने अपार प्रशंसा पाई । इसी वर्ष  अनिलरंजन भौमिक, इलाहाबाद का नाटक मंथन पहली बार जबलपुर में हुआ। छठवें समारोह में पहले दिन अरूण पांडे निर्देशित नाटक और अंत में प्रार्थना  में आर एस एस के लोगों ने हमला कर दिया और बम फोड़े, कुर्सियाँ चलाईं  । इस सबके बावजूद दर्शक  रूके रहे और नाटक पूरा हुआ। विवेचना के कलाकारों के इस दमखम और समर्पण  की बहुत तारीफ हुई। इसी साल नादिरा बब्बर का बहुत लोकप्रिय  नाटक सकुबाई  हुआ।

सातवें समारोह की खासियत यह रही कि यह समारोह तरंग में आयोजित हुआ। इसमें बलवंत ठाकुर के बच्चों के नाटक आप हमारे हैं कौन ने अद्भुत रंग जमाया। इस साल नादिरा बब्बर के नाटक संध्या छाया का दूसरा मंचन हुआ। पहली बार सन् 1995 में यह नाटक हो चुका था। इसी साल दयाशंकर की डायरी का मंचन हुआ जिसमें आशीष विद्यार्थी का एकल अभिनय था। इस नाटक की इतनी प्रशंसा हुई  कि दूसरे दिन शाम को इस नाटक का दूसरा मंचन आयोजित हुआ। आठवाँ  राष्ट्रीय नाट्य  समारोह 2001 फिर वापस मानस भवन में आयोजित हुआ। इसमें दो महत्वपूर्ण नाटक मंचित हुए।दर्पण  मिश्रा के निर्देशन  में शेर अफगन जिसमें सुनील सिन्हा ने कमाल का अभिनय किया था। अरविंद गौड़ का नाटक वारेन हेस्टिंग्ज का सांड़ बहुत सराहा गया। इसे देखने के लिए उच्च न्यायालय के अनेक न्यायाधीश आए। नवमें समारोह में सन् 2002 नाट्य समारोह पुन: तरंग प्रेक्षागृह पहुँच  गया और तबसे अब तक वहीं आयोजित हो रहा है। इस समारोह में लिटिल बैले टुप का बैले पंचतंत्र मंचित हुआ। इसी समारोह में नादिरा बब्बर का नाटक बेगम जान मंचित हुआ जो बहुत सराहा गया।

दसवाँ समारोह 2004 में हुआ जिसमें बलवंत ठाकुर का बच्चों का दूसरा नाटक उसके हिस्से की धूप कहाँ है के मंचन ने दर्शकों को गहरे तक प्रभावित किया। इसी समारोह में अरविंद गौड़ का नाटक माधवी जिसमें राशि बनी का एकल अभिनय था बहुत सराहा गया। 2005 में हुए ग्यारहवें राष्टीय नाट्य समारोह में विजय कुमार का नाटक ये आदमी ये चूहे मंचित हुआ। अनिल रंजन भौमिक इलाहाबाद का नाटक बाल भगवान आज भी याद किया जाता है। इस समारोह में अजय कुमार का नाटक बड़ा भांड़ तो बड़ा भांड़ प्रभावशाली था। 2006 में हुए बारहवें समारोह में जयपुर का नाटक चंपाकली का राम रूपैया बहुत भाया वहीं देवेन्द्रराज अंकुर का नाटक संक्रमण पहली बार मंचित हुआ। तेरहवें समारोह में सन् 2006 में विवेचना का नाटक मायाजाल मंचित हुआ। इस साल रिकार्ड सात नाटक मंचित हुए। इसमें देवेन्द्रराज अंकुर का नाटक हमसे तुमसे प्यार करेगा कौन और अनिल भौमिक का नाटक असमंजस बाबू बहुत चर्चित हुए। असमंजस बाबू का शो रविवार की सुबह 10 बजे रखा गया और भारी संख्या में दर्शक आए।

चौदहवाँ समारोह 2007 में आयोजित हुआ जिसमें पहले दिन विवेचना का नाटक मानबोध बाबू मंचित हुआ। इस समारोह में पहली बार दिनेश ठाकुर की भागीदारी हुई । उनका नाटक हम दोनों दर्शकों को बहुत पसंद आया। इसी समारोह में जे पी सिंह दिल्ली का नाटक अर्जेंट मीटिंग भी अच्छा जमा। पंद्रहवाँ समारोह 2008 में आयोजित हुआ जिसमें विवेचना का नाटक सूपना का सपना मंचित हुआ। पहले और दूसरे दिन मानव कौल के दो नाटक इल्हाम और शक्कर के पाँच दाने मंचित हुए। दूसरे दिन अलखनंदन का नाटक चारपाई और चौथे दिन अरविंद गौड़ का नाटक अनसुनी मंचित हुआ। अंतिम दिन सुबह 10 बजे आपरेशन थ्री स्टार का मंचन हुआ। विवेचना का सोलहवाँ राष्टीय नाट्य समारोह 2009 में आयोजित हुआ जिसमें विवेचना का नाटक मित्र पहले दिन मंचित हुआ। दूसरे दिन महमूद फारूखी की दास्तानगोई हुई । तीसरे दिन बंसी कौल का नाटक तुक्के पे तुक्का मंचित हुआ। चौथे दिन टॉम आल्टर का नाटक मिर्ज़ा गालिब मंचित हुआ। पांचवें और अंतिम दिन रंजीत कपूर का नाटक अफवाह मंचित हुआ।

विवेचना का सत्रहवाँ नाट्य समारोह आगामी 27 अक्टूबर से 31 अक्टूबर 2010 तक आयोजित है। इसमें पहले दिन विवेचना का नया नाटक मौसाजी जै हिन्द मंचित होगा। दूसरे दिन त्रिपुरारी शर्मा के निर्देशन में रूप अरूप का मंचन होगा। तीसरे दिन बलवंत ठाकुर का नाटक घुमाई मंचित होगा। चौथे दिन हबीब तनवीर का नाटक चरण दास चोर मंचित होगा। अंतिम दिन नादिरा बब्बर का नाटक यार बना बडी मंचित होगा।
आलेख एवं परिकल्पना- विवेचना.

प्रस्तुति:






















रविवार, 26 सितंबर 2010

निःस्वार्थ भाव से की गई परसेवा सदैव समाज हितैषी एवं आत्म संतुष्टि दायक होती है -किसलय.

यदि हम सामाजिक व्यवस्थाओं के दायरे में रहकर जीवन-यापन करें तो गैर भी इस हेतु प्रेरित होते हैं. अपरिग्रह की प्रवृत्ति मनुष्य को कहीं न कहीं लोभी और स्वार्थी बनाती है. आवश्यकता से अधिक संग्रह ही हमें वास्तविक कर्म से विलग करता है. एक सच्चे इंसान का कर्तव्य अपनी बुद्धि एवं विवेक का सदुपयोग करना होता है. 'स्व' के स्थान पर 'सर्व' की चिंता करना, समाज के काम आना और समाज में रहते हुए परस्पर भाई-चारे का परिवेश निर्मित करना हर मनुष्य का सिद्धांत होना चाहिए. हमारे नेक सिद्धांत ही हमें आदर्श पथ पर चलने हेतु प्रेरित करते हैं तथा हमारे समाज में भी यही संदेश जाता है, जो दूसरों को इस दिशा पर चलने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है. इंसान का आदर्श होना कोई जन्मजात गुण नहीं होता. हम समाज में रहते हैं, सामाजिक गतिविधियों और आचार- व्यवहार को निकट से देखते हैं. यदि हम अपने चिंतन और मनन से अच्छाई-बुराई एवं हानि-लाभ के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष परिणाम की सूक्ष्मता से थाह लें तो उचित एवं अनुचित के काफ़ी निकट पहुँचा जा सकता है. इन दोनों पहलुओं में हमें उचित पहलू पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है तथा अनुचित पहलू के प्रति नकारात्मक रुख़ भी अपनाना होता है.



सकारात्मक दृष्टिकोण ही हमारे आदर्श मार्ग का प्रथम चरण होता है. हमारी भावनाएँ हमारे संस्कार, हमारी शिक्षा-दीक्षा और हमारी लगन का इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहता है. हम इन गुणों से उचित और अनुचित का फर्क सहजता से समझ सकते हैं. अपने धीरज और विवेक से अनुचित का प्रतिकार नियोजित ढंग से कर सकते हैं. समाज का उत्थान हम सबकी अच्छाई पर निभर करता है. बुराई समाज को पतन की ओर ले जाती है. हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा. यदि ऐसा है तो ये शुरुआत हम स्वयं से ही क्यों न करें. कल हमारा परिवार, हमारा मोहल्ला और हमारा नगर इस हेतु प्रेरित होगा. दीप से दीप जलेंगे तो तिमिर हटेगा ही. जब हम एक से दो, दो से चार होंगे तब जग में सुधार की लहर बहना सुनिश्चित है और उसकी परिणति भी सुखद होगी. निश्चित रूप से हमारे मन में आएगा कि ऐसा कभी हो ही नहीं सकता  कि  सम्पूर्ण जग सुधर जाएगा, परन्तु लोग ऐसा सोचते ही क्यों हैं. ऐसे निःस्वार्थ कार्यों में आगाज के पहले ही अंजाम की सोचना आपका पीछे हटना ही माना जाएगा. एक बार हम इतिहास के  पन्ने पलट कर तो देखें. हमारे पूर्वजों ने सब कुछ अपनी ख़ुशी के लिए नहीं किया है. ऋषि-मुनियों ने कठिन त्याग-तपस्या, देशभक्तों ने अपने प्राणोत्सर्ग, अकल्पनीय परसेवा मानवहितार्थ ही की है. पेड़ लगाने वालों ने यदि सोचा होता कि जब उन्हें इसके फल ही चखने को नहीं मिलेंगे तो क्या आज हम उनके द्वारा लगाये गए पेड़ों के फलों का स्वाद चख पाते? इसी तरह यदि हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए कुछ नहीं करेंगे तो वह आपको कैसे याद करेगी ? बस यही बात है आपको याद किये जाने की, आपको अमरता प्रदान करने की. आपके कर्तव्य और आपका सामाजिक योगदान ही आपकी धरोहर है जो पीढ़ी-दर-पीढी हस्तांतरित होती है जिसका संवाहक हमारा यही समाज होता है. हमारी गीता में लिखा है " कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन " यहाँ पर इसका आशय यह लगाना चाहिए कि हम कर्म करेंगे तो उसका फल हमें अवश्य प्राप्त होगा. एक एक बिन्दु से रेखा बनती है. रेखाओं से अक्षर, अक्षरों से शब्द और यही सार्थक शब्दसमूह अभिव्यक्ति के माध्यम बनते हैं. शब्दशक्ति से कौन अपरिचित है. विश्व की हर क्रान्ति के पीछे शब्दशक्ति का ही हाथ रहा है. बड़ी से बड़ी क्रान्ति भी विफल हो गयी होती यदि "अभिव्यक्ति" जन-जन तक न पहुँचती. तात्पर्य यही है कि एक बिन्दु या एक इंसान भी आदर्श मार्ग पर चलेगा तो वह रेखा जैसा बिन्दुसमूह या यूँ कहें कि उस जैसे लोगों का एक कारवाँ तैयार होता जाएगा जो समाज को नई चेतना जागृत करने के साथ-साथ विकास के पथ पर भी अग्रसर करेगा. ऐसा नहीं है कि इंसान संपन्न एवं उच्च पदस्थ होकर आम आदमी के दुःख-दर्द का एहसास नहीं कर सकता. मेरी मान्यता तो यही है कि परिस्थितिजन्य विचार और परिवर्तित दृष्टिकोण वह सब करने की इजाजत नहीं देते जो उसके अंतस में विद्यमान एक " साधारण आदमी " करना चाहता है. आखिर ऐसा क्यों करता है यह तथाकथित विशिष्ट वर्ग? इस विशिष्ट वर्ग के आचरण ही समाज में दूरियाँ पैदा करते हैं. हम सदियों से देखते आ रहे हैं कि इस वर्ग की आयु बहुत ही कम होती है क्योंकि झूठ और अनैतिकता की बुनियाद पर खडा इंसान कभी स्थायित्व प्राप्त कर ही नहीं सकता.



बात तो तब है जब इंसान इंसान के काम आये. ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, और अमीर-गरीब के बीच की खाई पाटी जाए. जीव अमर नहीं होता, सम्पन्नता और विपन्नता जब यहीं पर धरी रह जाना है तो फिर ये बात लोगों की समझ के परे क्यों है. कम से कम हम अपने व्यवहार और वाणी से मधुरता तो घोल ही सकते हैं. मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसे पेट के साथ दो हाथ और दो पाँव मिलते ही इसलिए हैं कि वह इनसे अपना और अपने परिवार का उदर-पोषण कर सके. हम ईर्ष्यालुओं और विघ्नसंतोषियों को छोड़ दें तो शायद ही कुछ प्रतिशत लोग ऐसे होंगे जो सम्पन्नों से कोई विशेष उम्मीद करते हों ? आम इंसान को अपनी मेहनत और लगन पर पूरा भरोसा रहता है. वह जीवन में आगे बढना तो चाहता है परन्तु अच्छी नियत से. बुराई तो घोली जाती है, क्योंकि ईश्वर तो हमें इस स्वर्णिम धरा पर निश्छल ही भेजता है. आदमी छोटा हो या बड़ा, यदि उसमें निश्चलता भरी है तो वह सच्चे अर्थों में इंसान है.  इंसान सदैव दूसरों के लिए जीते हैं.  अपने लिए तो कोई भी जी सकता है. हमारे व्यवहार और हमारी भाषा ही हमें समाज में विशिष्ट स्थान दिलाती है. हमारे सद्कर्म हमें स्वयं यश-कीर्ति दिलाते हैं . निःस्वार्थ भाव से की गई परसेवा का प्रतिफल सदैव समाजहितैषी एवं आत्मसंतुष्टिदायक होता है. तुलसी-कबीर, राणा-शिवा जी, लक्ष्मीबाई, गांधी, विनोबा, मदर टेरेसा ऐसे ही नाम हैं जो इतिहास के पन्नों में अमर रहेंगे. हम इतिहास उठाकर देख सकते हैं कि अधिकांश स्मरणीय व्यक्तित्व सम्पन्नता या महलों में पैदा नहीं हुए और पैदा हुए भी हैं तो वय की परिपक्वता के साथ-साथ वे वैभव-प्रासाद से निर्लिप्त होते गए, क्योंकि सच्चरित्र, सद्ज्ञान और शिक्षा-दीक्षा आपसी नजदीकियाँ बढाती है. वैभव-प्रासाद साधारणतः आम आदमी को दूर रखता आया है. हमारा चरित्र और हमारा व्यवहार दिल दुखाने वाला कभी नहीं होना चाहिए. अपने बोल-चाल और सहयोगी भावना से दूसरों को दी गई छोटी से छोटी खुशी भी आपको चौगुनी आत्मसंतुष्टि प्रदान करती है. आप एक बार इस पथ पर कदम बढायें तो सही. मुझे विश्वास है कि आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन परिलक्षित होने लगेंगे जिनपर आपको स्वयं विश्वास नहीं होगा. यह एक सच्चाई है कि नजदीकियों से गुणों का आदान-प्रदान होता है. हम अच्छाई के निकट रहेंगे तो अच्छे बनेंगे. बुराई के निकट रहेंगे तो बुरे बनेंगे. जब हम अच्छे-बुरे को याद करने के लिए अपनी स्मृति पर जोर डालते हैं तो बुरे लोगों की बजाय जेहन में अच्छे लोग ज्यादा आते हैं. इसका सीधा आशय है कि बुरे लोगों को कोई भी याद नहीं रखना चाहता. बुरे लोग केवल उदाहरण देने हेतु ही याद रखे जाते हैं.



हमारा ध्येय स्पष्ट है कि सच्चाई, परोपकार और सौहार्द की दिशा में बढाए गए कदम हमें विकास के शिखर तक अवश्य ले जायेंगे . यही मानव जीवन की सार्थकता और उपादेयता भी है.













-विजय तिवारी " किसलय " जबलपुर.


शनिवार, 24 जुलाई 2010

जबलपुर की किरण खत्री : राजनैतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक गतिविधियों की त्रिवेणी

भारतीय होने पर हर हिन्दुस्तानी गर्व करता है. भारत ने सनातन परम्पराओं, रीति-रिवाज़, संस्कृति और भाईचारे की सम्पूर्ण विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है.  हम आदिकाल से अब तक का इतिहास उठा कर देखें तो आध्यात्म से लेकर धर्म तक और सामाजिक सरोकारों से लेकर तकनीकी तक हम कहीं भी पिछड़े नहीं हैं. विश्व में भले ही हमारी आध्यात्मिक और 'देसी-तकनीकियों ' को विकास का दर्ज़ा न मिला हो लेकिन समाज और मानव को एक सूत्र में पिरोने का जितना कार्य भारत में हुआ है, विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं हुआ. वैसे भी सहस्राब्दिओं पहले रचित वेदोक्त वाक्य " वसुधैव कुटुम्बकं " से कौन अपरिचित है ?  हमारे  पूर्वजों और ऋषि-मुनिओं ने स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ को जो महत्व दिया है वह आज किसी से छिपा नहीं है.  आदि से अब तक कभी ऐसा अंतराल नहीं आया कि हमारे देश में विलक्षण प्रतिभाओं की कमी रही हो . विसंगतियाँ और बुराईयाँ जीवन के अंग होते हैं.  हम इनको यदि हाशिये पर रख कर सोचें तो एक प्रबुद्ध और सद्मार्गी  वर्ग समाज में पाया ही जाता है, जो निरंतर बुराईयों के प्रति सचेत कराने के साथ साथ अच्छाई का भी पथ-प्रदर्शक होता है . मोहल्ले से लेकर देश तक हर जगह ऐसे लोगों की इंसानियत के चर्चे सुने जा सकते हैं.  इनकी कर्तव्य-परायणता के उदाहरण देखे जा सकते हैं.  इस तरह के मानवीय और सामाजिक कर्म-भूमि में पुरुषों का बाहुल्य तो सहज दिखाई देता है परन्तु पारिवारिक उत्तरदायित्वों एवं भारतीय परम्पराओं का निर्वहन करते हुए यदि कोई महिला मानवीय और सामाजिक क्षेत्र को कर्म-भूमि को चुने ?  निर्धन और असहायजनों का दर्द महसूस करे ?  इतना ही नहीं उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर उसके निराकरण का सार्थक प्रयास करे तो हमें आश्चार्यमिश्रित गौरव का भान होता है. असहज और कठिन होने के बावजूद आज भी मानव समाज के उन्नयन हेतु अनेक महिलायें अग्रणी दिखाई देती हैं. आखिर वे कैसी परिस्थितियाँ और परिवेश होते हैं जो महिलाओं को ऐसा संकल्पित होकर इस क्षेत्र में अग्रसर होने के लिए प्रेरित करते हैं.  सामयिक घटनाओं एवं सामाजिक क्रिया-कलापों का भी अनजाने में प्रभाव पड़ता है.  इसके साथ ही निश्चित रूप से इसके पीछे उनके माता-पिता, संस्कार, शिक्षा- दीक्षा और पारिवारिक माहौल का वृहद योगदान रहता  है.  इन सबका एक उदाहरण हैं जबलपुर की श्रीमती किरण खत्री, जिनको मैंने भी नजदीक से जाना है.  उनसे बातचीत करने और उनकी कार्यशैली देखने से लगता है कि उनमें निहित कर्तव्यनिष्ठा उन्हें विरासत में मिली है और उस पर " सोने पे सुहागा " वाली कहावत को चरितार्थ किया है वरिष्ठ समाज-सेवी, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संचेतना के संवाहक उनके पति श्री अविनाश खत्री जी ने .
(श्रीमती किरण खत्री एवं उनके पति श्री अविनाश खत्री )


समाज में व्याप्त विसंगतियाँ, महिलाओं का पिछडापन एवं गरीबों की समस्याओं के प्रति उनके जैसा दृष्टिकोण एवं समाधान का उत्स कम ही लोगों में दिखाई देता है. सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक गतिविधियों के समानान्तर एक कवयित्री का होना उन्हें अलग श्रेणी में लाकर खड़ा करता है.  एक नेता मंच पर खडा होकर भाषण दे सकता है, सामजिक कार्यकर्ता जन-समस्याओं का निराकरण करा सकता है, लेकिन श्रीमती किरण खत्री मंच से बोलती हैं, सामाजिक गतिविधियों में संलग्न रहती हैं एवं धार्मिक भावनाओं का भी आदर करती हैं.  उपरोक्त कार्यों से प्राप्त अनुभवों एवं अपने आसपास घटित घटनाओं पर सदैव चिन्तन-मनन करना भी उनकी संवेदनशीलता को प्रदर्शित करता है.  इतना ही नहीं उनके अन्दर का " कवि मन " उद्वेलित भावों को  लेखनी से कागज पर उकेरने में  अहम भूमिका निभाता है.       
  
                                     
( किरण जी का  परिचय )
   इनके भावों की जीवन्तता उनके सद्यप्रकाशित " अश्कों की लोरियाँ " काव्य-संग्रह में देखने को मिलती है.  संग्रह की अधिकांश रचनाओं को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि उनका अन्तर्मन समाज के असंयत व्यवहार एवं क्रिया-कलापों से अत्यंत आहत हुआ  है.  उन्हें  मानवीय  एवं नैतिक अवमूल्यन, लिंग-भेद, महिलाओं की धीमी  प्रगति, गरीबों की पीड़ा , भाईचारे एवं आदर-भाव में गिरावट होना खलता है.  आज की बदलती सामाजिक संरचना के अधीन जीवन-यापन कर रहे लोगों और अपने समाज में कुछ नयापन लाने की ललक उनकी आँखों  में स्पष्ट नज़र आती है.  अर्धशतकीय जीवन के बावज़ूद उनकी दिनचर्या और सक्रियता देखकर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि श्रीमती किरण खत्री अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु अनवरत अग्रसर  हैं.  वे आज भी समाज, शहर और अपने राष्ट्र की चतुर्दिक उन्नति के  लिये सकारात्मक कार्यों में अपना योगदान देती रहती हैं. मेरी दॄष्टि से यदि समाज में श्रीमती किरण खत्री जैसी क्रियाशीलता एवं समाज के प्रति समर्पण जाग्रत हो जाये तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा समाज चहुँमुखी विकास के साथ सुख-सम्रद्धि से परिपूर्ण होगा.  हमारी श्रीमती किरण खत्री के उज्ज्वल भविष्य एवं स्वस्थ्य जीवन की शुभकामनायें. 
हम आदरणीया श्रीमती किरण खत्री जी की रचना   'आओ ऐसा राष्ट्र बनायें'  " को उनकी ही आवाज़ में आप सब को सुनवा रहे हैं :-
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रचना 'आओ ऐसा राष्ट्र बनायें' सुनने के लिए  [इसे]   क्लिक करें
 













- विजय तिवारी " किसलय " 

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

आरोपों अथवा दोषों के कारण को समझने में भी हमारी भलाई निहित है

 अक्सर देखा गया है कि जो हमारी कमियाँ या दोषों को इंगित करता है हमें उस पर गुस्सा आता है. हमें उसका इशारा नागवार गुजरता है. कभी कभी तो हम उसके इस सकारात्मक कृत्य पर बदले की दुर्भावना से उसे हानि पहुँचाने की ठान लेते हैं. जो इंसान आपकी गलती को सुधारना चाहता हो, आपकी कमियों को दुरुस्त करने की सोचता हो अथवा एक बार हम मान भी लें कि वह हमारी निंदा कर रहा है तब भी हमें यह मान कर चलना चाहिए कि वह आपका मित्र है. आपकी कमियों, आपके दोषों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट कराने वाला सचेतक है. आपको मशविरा देने वाला निःशुल्क सलाहकार है. यदि हम ऐसे समय निश्छल मन से तटस्थ होकर कभी आत्मावलोकन करें तो हमें हमारा निंदक सच में शुभचिंतक नज़र आएगा. यदि वाकई वह हमारी गलत निंदा कर रहा है अथवा गलत दोष निकाल रहा है तब भी हमें धीरज से काम लेना चाहिए क्योंकि आप ऐसा करके अपनी धैर्यशक्ति को और मजबूत बना रहे होते हैं. इस सम्बन्ध में मेरा भी मानना है कि लगाए गए आरोपों अथवा दोषों के कारण को समझने में हमारी ही भलाई निहित है.



कहा भी गया है कि -
" निंदक नियरे राखिये, आँगन, कुटी छबाय .
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल कहां सुभाय "










- विजय तिवारी " किसलय "

बुधवार, 14 जुलाई 2010

नीरोग रहने के लिए मन का संयमित और स्थिर रहना परमावश्यक है.

अधिकतर इंसान नियम और संयम के साथ जीवन यापन करना चाहता है परंतु वह विभिन्न परिस्थितियों और परिवेश के चलते ऐसा करने में लाचार सा नज़र आता है. आज हम टी वी पर, योग गुरुओं की सभाओं में , सुबह-सुबह बाग-बगीचों और फुटपाथों पर स्वस्थ्य और संयमित रहने हेतु लोगों की संलिप्तता देख सकते हैं. इन सब के बावज़ूद भी अधकाँश लोग आज के दौर में अस्वस्थ रहते हैं, एक रोगी की तरह अपने आपको पाते हैं. आख़िर लोग इस पर आत्म चिंतन क्यों नहीं करते ? देखा जाए तो इनके होते भी हैं अनेक कारण !! लेकिन मैं यहाँ उन कारण को नहीं गिनाऊंगा जो आपके जेहन में आते हैं.. मैं तो बस यह बताना चाहता हूँ कि इंसान शारीरिक स्वस्थता एवं संयम मात्र से नीरोग नहीं बन पाता. यदि इंसान अपने जीवन में असंतुष्टता की चादर ओढ़े हुए है, ईर्ष्या और द्वेष का चश्मा पहने हुए है, अनैतिक कृत्यों में संलिप्त है तो भला वह इंसान निरोगी कैसे हो पाएगा? तात्पर्य ये हुआ कि शारीरिक संयम के साथ-साथ जब तक हमारा मन संयमित नहीं होगा , मन शांत नहीं होगा, तब तक इंसानी काया सही मायने में नीरोगी कहलाएगी ही नहीं. हम कह सकते हैं कि सुख, शांति और नीरोग रहने के लिए मन का संयमित और स्थिर रहना परमावश्यक है.
 
 
 
 
 
 
 
 
 
- डॉ विजय तिवारी " किसलय "

बुधवार, 6 जनवरी 2010

जबलपुर के कल्चुरी तीर्थ में श्री अशोक "आनंद" के "मानव मंदिर" की साकार होती परिकल्पना - एक परमार्थिक विवरण

भारत के मध्य में स्थित जबलपुर का ऐतिहासिक, धार्मिक, आध्यात्मिक एवं साहित्यिक महत्व तो अद्भुत है परंतु प्रचार, प्रसार और जागरूकता के अभाव में वह प्रसिद्धि नहीं मिल पाई जो आज दिल्ली, नालंदा, इलाहाबाद अथवा वाराणासी जैसे शहरों के खाते में गई है त्रिपुरारि की युद्ध-स्थली, शिशुपाल की राजधानी , ओशो और महर्षि महेश योगी की नगरी, "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी है" अमर कविता की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान और व्यंग्य विधा के जनक हरिशंकर परसाई की कर्मभूमि "जबलपुर" से आज लोग भले ही अनभिज्ञ हों परंतु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर उपरोक्त नाम किसी प्रसिद्धि के मोहताज़ नहीं हैं.
आज का जबलपुर पूर्व का 'गोंडवाना', उसके पूर्व कल्चुरियों की राजधानी 'त्रिपुरी' है। महाभारत कालीन शिशुपाल का 'चेदि राज्य' और पृथ्वीराज चौहान का 'ननिहाल' भी है. वर्तमान के ज्ञात इतिहास में कल्चुरी कालीन शासकों ने जो वैभव, ख्याति, सम्मान और महत्व प्राप्त किया है वह स्वर्णाक्षरी इतिहास ही नहीं शासन-प्रशासन का भी मानक बन गया है. प्रशासनिक व्यवस्थाओं ने जहाँ कल्चुरी राज्य को विस्तारित किया वहीं धार्मिक आस्था के चलते अनेक महत्व्पूर्ण धर्म स्थलों और मूर्तिकला को नये आयाम दिए जिसके उदाहरण आज भी इस क्षेत्र में विद्यमान हैं. वर्तमान जबलपुर के आसपास या यूँ कहें कि कल्चुरियों की राजधानी त्रिपुरी के भग्नावशेष, प्राचीन मूर्तियाँ, प्राचीनतम सिक्के, शिलालेख एवं अव्यवस्थित-खंडित स्थलों का वैभव आज भी अनुभव किया जा सकता है।


आज जब संपूर्ण मानव समाज भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल हो चुका हो, ऐसे में हमारे इतिहास की खोज-खबर तो दूर की बात है, स्मरण करना भी कोई अपना नैतिक दायित्व नहीं समझता परंतु आज भी कुछ लोग हैं जिनके जेहन में अपने समाज, अपने पूर्वजों और अपने इतिहास को अक्षुण्य बनाने की समर्पण भावना हिलोरें ले रहीं हैं. इन में से हम एक नाम बड़े गर्व के साथ ले सकते हैं वह नाम है एक इंजीनियर का- जिन्हें धर्म से लगाव है, इतिहास से जुड़ाव है और बेहद रूचि है अध्यात्म और वेद पुराणों से । गहन अध्ययन और खोजी प्रवृत्ति के चलते आज वे हमारे सामने ऐसे-ऐसे प्रामाणिक और तार्किक तथ्य प्रस्तुत करने में संलग्न हैं जो पुरातत्वविदों और जानकारों को नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर रहे हैं. ऐसे व्यक्तित्व का नाम है इंजीनियर अशोक राय. जी हाँ, मध्य प्रदेश जबलपुर निवासी श्री अशोक "आनंद" ने अपनी सठोत्तरी आयु को कभी बाधक नहीं माना. वे अपनी सक्रियता से नव युवकों को भी मात देने का ज़ज़्बा रखते है.


कल्चुरियों की राजधानी त्रिपुरी और इसके समीप विस्तारित वैभव से प्रभावित श्री राय ने जबलपुर के आसपास फैले कल्चुरी क्षेत्र की कल्पना "कल्चुरी तीर्थ" के रूप में की एवं इस दिशा में वे कार्य भी प्रारंभ कर चुके हैं. जबलपुर से पश्चिम में करीब २१ किलोमीटर दूर राष्ट्रीय मार्ग-12 पर शहपुरा-भिटोनी के पहले हीरापुर बँधा में पुण्य सलिला नर्मदा के किनारे धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं मानव सेवा से जुड़ा एक विशाल स्थल "श्री राजराजेश्वर रिद्धि सिद्धि सिद्ध पीठ" विकसित किया जा रहा है जो "कल्चुरी तीर्थ" को मूर्तरूप प्रदान करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा. हीरापुर बँधा के निकट नर्मदा नदी के किनारे विकसित किए जा रहे इस बहुआयामी स्थल पर वर्तमान में दुष्प्रभावहीन प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में प्रयास जारी हैं. यहाँ निःशुक्ल/न्यूनतम शुल्क में वे सारी सुविधाएँ उपलब्ध हो सकेंगी जो एक आम इंसान के लिए आज की महँगाई के चलते संभव नहीं है । यहीं पर वृद्ध और असहाय जनों के लिए सेवा केंद्र भी बनाने की योजना है जिससे यथार्थ में मानव मंदिर का सपना पूरा हो सकेगा । लौह धातु के ग्रह कोप नाशक शनि देव, वंश वृद्धि, संतानोत्पत्ति एवं सुख- शांति की कामना पूर्ण करने वाले प्राचीन सिद्धेश्वर एवं इसी मंडप में वांछित फल दायी गोस्थापित दुर्लभ शिव लिंग के भी दर्शन सुलभ हैं । यहाँ पर किए जा रहे वृक्षारोपण से पर्यावरण संतुलन एवं औषधि उपलब्धता को भी सार्थकता प्राप्त होगी. इसी परिसर में नव दुर्गा के नौ गुफा-मंडप बनाए गये हैं जहा साधक एकांतवास कर अपनी साधना सम्पन्न कर सकते हैं. यहाँ पर सिद्धेश्वर और गोस्थापित शिवलिंग से मनोकामना हेतु अर्पित नारियल को बाँधने हेतु "मन्नत का वृक्ष " भी है , जहाँ नारियल के भीतर घी और शक्कर भर कर बाँधने से माँगी गई मन्नतें अवश्य पूर्ण होती हैं।

मेरी दृष्टि में श्री अशोक "आनंद" के इन सद्प्रयासों में सहभागिता करना हर सच्चे इंसान का कर्तव्य होना चाहिए और शायद इसी सोच के कारण आज उनसे जुड़ने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है. कल अशोक 'आनंद' जी द्वारा एक प्रयास शुरू किया गया था , आज उसे साकार करने लोग जुट और जुड़ रहे हैं. मुझे तो विश्वास है कि निकट भविष्य में हम स्वयं और हमारी संतानें उसके सुफल चखेंगी. उसका सार्थक स्वरूप देखना हमारी प्राथमिकता है ऐसा इस अभियान से जुड़ने वाला हर सदस्य मानता है. श्री अशोक "आनंद" एवं उपरोक्त उद्देश्यपूर्ति हेतु कर्तव्यरत महामनाओं को मेरी शुभकामनाएँ।


- विजय तिवारी " किसलय

गुरुवार, 21 मई 2009

इच्छाशक्ति, संतोष और सफलता

सुख की चाह समग्र जीव जगत में पाई जाती है। इंसान में सुख केवल चाह न रहकर आवश्यकता बनता जा रहा है । सुख की खातिर आदमी आज कुछ भी करने को तैयार है । वह भविष्य को सुखमय बनाने के लिये नैतिक-अनैतिक हर कार्य करने से नहीं हिचकता । आज ईमानदारी, सत्यता और न्याय की बातें किताबी लगने लगी हैं। नीति, आदर्श और परोपकार की कथायें और संस्मरण अब लोग सुनने से भी कतराने लगे हैं। आज के बदलते परिवेश और सुख-स्वार्थ की अन्धी दौड़ में हम अपनी संस्कृति और धर्म को भूलते जा रहे हैं।
हमारा वेदोक्त वाक्य " संतोषम् परम् सुखम् " अब हमारी सुख-सुविधाओं के रास्ते का रोड़ा जैसा प्रतीत होने लगा है । संतोष शब्द अब अभाव और अक्षमता का प्रतीक माना जाने लगा है । आज चादर को ही ऐन-केन-प्रकारेण पैरों के बराबर बड़ा करने का प्रचलन है, भले ही इसके लिये हमें कितना भी ऋण क्यों न लेना पड़े या अनैतिकता को अपनाना पड़े । आज किसी को ईश्वर या समाज का डर नहीं रह गया है। सामाजिक निन्दा को प्रसिद्धि जैसा माना जाता है । आयकर के छापे को करचोरी नहीं स्टेटस सिम्बॉल के रूप में देखा जाता है। सारा विश्व संतोष नामक मृग-मरीचिका के पीछे भागता नजर आ रहा है। इंसान जितनी सुख-सुविधायें और संपन्नता पाता है, संतोष का लक्ष्य उससे उतना ही दूर होता जाता है । पैदल चलने वाला सायकल, सायकल वाला कार और कार वाला हवाई साधन चाहता है। शहरों, महानगरों, विदेश के बाद आज ऐशोआराम हेतु धनाढ्य स्वयं के छोटे-छोटे द्वीप तलाशने लगे हैं।
एक गरीब और अमीर के शरीर की भौतिक एवं आंतरिक संरचना समान होने के बाद भी दोनों के बीच जमीन-आसमान जैसा अंतर बढ़ गया है। गरीब सूखी रोटी और झोपड़ी में रहकर उतना आत्मसंतोष प्राप्त करता है जितना कि एक अमीर छप्पन भोग और आलीशान कोठी में रहते हुए प्राप्त करता है। इस आत्म संतुष्टि और खुशी में कोई अन्तर नहीं होता क्योंकि खुशी खुशी होती है। वह अमीर और गरीब में भेद नहीं करती। स्वरूप भले ही बदल सकता है परिमाण समान रहता है। यहाँ पर सबसे अहम् बात इच्छा शक्ति की आती है। संतोष और इच्छा शक्ति का संबंध बिलकुल चोली-दामन जैसा है। इच्छा शक्ति पर संतोष और संतोष पर इच्छा शक्ति का नियंत्रण निर्धारित होता है । हम सब एक जैसे पैदा होते हैं, एक जैसे मरते हैं। हर आदमी की प्रसिद्धि , यश-कीर्ति और सामर्थ्य होती है, बस अंतर होता है तो उसके स्वरूप का। हर इंसान अपने छोटे या बड़े वृत्त के अंदर रहने वाले मानव समाज में एक जैसी सम्वेदनायें और एक जैसी स्मृति छोड़कर जाता है।
आज हम संतोष की चाह में इतने सम्वेदनशून्य हो गये हैँ कि हमें अपने माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी और बच्चों के प्रति अपनत्व की भी सुध नहीं रह पाती, लेकिन जब होश आता है या पीछे मुड़कर देखते हैं तब तक देर हो चुकी होती है। अपनों द्वारा प्राप्त होने वाले इस दुनिया की सबसे अमूल्य निधि "अपनत्व" से बहुत बड़ी दूरी बना बैठते हैं। संतोष की चाह मेँ हम उसी संतोष से इतने दूर निकल जाते हैं कि फिर से इस जन्म में वह दुबारा नहीं मिल पाता, न ही वे बचपन, जवानी, और गृहस्थी के क्षण दोहराये जाते, जिनके लिये हम किसी समय सर्वस्व तक लुटाने के लिये तैयार रहा करते थे।
हम कह सकते हैं कि निःशुल्क उपलब्ध इच्छा शक्ति के रथ पर सवार होकर हम संतोष रूपी लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं, बशर्ते हम उन आदर्शों को समझ लें जो मानव जीवन के लिये श्रेष्ठतम् उपहार हैं। मैं अंत में पुनः कहना चाहूँगा कि यदि हम अपने ज्ञानवान ऋषियों की वाणी और वेद-ऋचाओं का अध्ययन करें , उनमें मानवीय संवेदनाओं, परोपकारी भाव तथा आत्म शान्ति को ढूँढें तो हमें "संतोष" ही सुगम पथ नजर आयेगा, जो केवल हमारी इच्छा शक्ति के नियंत्रण से संभव हो सकता है। इसी इच्छा शक्ति से प्राप्त संतोष की भावना और लगनपूर्वक किये गये प्रयास सदैव सफलता ही दिलाते हैं इसमें संशय की किंचित गुंजाइश नहीं है।
- विजय तिवारी " किसलय "

मंगलवार, 19 मई 2009

खुद की आलोचना पर आत्मावलोकन

मानव के दुर्गुण जब समाज के सामने आते हैं तब उसकी निंदा होना स्वाभाविक है । यदि किसी की आलोचना होती रहे तो वह निन्दित-दुर्गुणों की ओर ध्यान अवश्य देगा और उनके निराकरण के उपाय भी सोचेगा । वहीँ निंदा से घबराए इंसान अक्सर समाज में अपनी प्रतिष्ठा नहीं बना पाते . वैसे किसी ने सच ही कहा है कि निंदा की सकारात्मक स्वीकृति एक बड़े साहस की परिचायक है। यदि इंसान अपनी निंदा करना स्वयं शुरू कर दे और उन पर अमल करे तो इसे हम " सोने पर सुहागा " वाली कहावत को चरितार्थ होना कहेंगे। मन से दुर्गुण रूपी मैल के निकल जाने से इंसान में चोखापन आता है. स्वयं की बुराइयों को नज़र अंदाज़ करने वाले इंसान को कभी भी नीचा देखना पड़ सकता है, लेकिन इंसान अपने आप में सद्विचार और परिवर्तन लाता है तब वह दूसरों को भी सुधारने या सद्मार्ग की ओर प्रेरित करने का हक़ प्राप्त कर लेता है. यही कारण है कि ऐसे इंसान के समक्ष कोई भी दुर्गुणी ज्यादा देर तक टिक ही नहीं पाता. यह कहना भी उचित है कि कोई भी व्यक्ति सर्वगुण संपन्न हो ही नहीं सकता और यदि सर्व संपन्न है तो वह मानव नहीं देवता कहलायेगा। हम सभी ये जानते हुए भी कि सद्कर्मी सर्वत्र प्रशंसनीय होते हैं, फिर भी हमारी प्रवृत्ति सद्कर्मोन्मुखी कम ही होती है. हम अपने गुणों का बखान करने के स्थान पर यदि आत्मावलोकन करें और बुराईयों को दूर करने का प्रयत्न करें तो निश्चित रूप से हमारे अन्दर ऐसे परिवर्तन आयेंगे जिससे हम समाज में कम से कम एक अच्छे इंसान के रूप में तो जाने जायेंगे. अंत में निष्कर्ष यही निकलता है कि अपनी निंदा या आलोचना को सदैव सहज स्वीकृति देते हुए उस पर आत्मावलोकन करें, आत्म चिंतन करें और जो निष्कर्ष सामने आएँ उनका अनुकरण करें तो इंसान कभी भी दुखी या निराश नहीं रहेगा।
- विजय तिवारी " किसलय "


सोमवार, 18 मई 2009

शालेय जीवन में यौन शिक्षा : मेरी दृष्टि से

प्रायः देखा गया है कि प्रत्येक चीज की जानकारी होते ही लोग सर्वप्रथम उसके दुरुपयोग पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं । परमाणु ऊर्जा की खोज विकास के लिये की गयी थी, लेकिन उससे हुए दुरुपयोग को कौन नहीं जानता । समाचार पत्र- पत्रिकाओं और न्यूज चेनलों की जानकारियों और समाचारों के द्वारा भी प्राप्त ज्ञान का उपयोग कम, दुरुपयोग ही ज्यादा हुआ है । जब बताया जाता है कि चोरों ने तिजोरी को इस तरह से खोला तब अन्य चोर भी उस विधि से अवगत हो जाते हैं । हत्या कैसे की गई, विस्फोटक सामग्री कैसे बनाई गई, आतंक कैसे फैलाया गया या फिर इलेक्ट्रानिक और प्रिण्ट मीडिया द्वारा एक नेता पर फेके गये जूते का समाचार आया तो हर आदमी समझ गया कि ऐसा करने से ख्याति या कुख्याति प्राप्त की जा सकती है । आप ही आत्म अवलोकन करें कि मीडिया द्वारा यह बताया जाना अनिवार्य है कि विस्फोटक सामग्री आतंकियों ने ऐसे बनाई, संसद भवन में सुरक्षा घेरे में किस तरह सेंध लगाई अथवा ताज होटल में आतंकियों को कैसे घेरा गया ? हम यह भी कह सकते हैं कि थोड़े से टी. आर. पी. बढ़ाने और स्वार्थ के चक्कर में हम स्वयं और अपने देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं । यहाँ बात पहुँचती है किसी भी माध्यम से जानकारी सम्प्रेषण पर हुए लाभ और हानि की । यह बात शालेय जीवन पर भी लागू होती है ।
सृष्टि का नियम है कि हर चीज समय पर ही अच्छे परिणाम देती है, चाहे वह फल हो, फसल हो अथवा हमारे जीवन की विभिन्न अवस्थायें । हम यहाँ शास्त्रोक्त बातें नहीं बताना चाहेंगे लेकिन यह बताना जरूरी है कि बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था के कार्यों में उलट-फेर करें तो समाज में अराजकता फैल जायेगी ।
इंसान में ईश्वर प्रदत्त बुद्धि और विवेक ऐसी अद्भुत शक्तियाँ हैं जो इंसान को अन्य जीव-जन्तुओं से पृथक करती है । इंसान को कभी भी समग्र रूप से नहीं समझाना पड़ता, वह स्वमेव अधिकांश बातें सीख जाता है । यह सीखने की प्रवृत्ति इंसान में जन्मजात पाई जाती है । जैसे जैसे उम्र बढ़ती है इंसान घर, बाहर, प्रकृति तथा अन्य जीव-जन्तुओं के क्रिया-कलाप , दृश्य और अवस्थाओं को देख-सुनकर, अपनी बुद्धि-विवेक के सहारे उसकी वास्तविकता, गुण-दोष, हानि-लाभ आदि के काफी निकट पहुँच जाता है । उम्र के अनुसार प्राप्त अनुभव हर परिस्थितियों में सटीकता और सामंजस्य की गुणवत्ता बढ़ाता है । आज के परिवेश में दृश्य, श्रव्य एवं लिखित इतना कुछ उपलब्ध है कि अलग से कुछ विशेष बातें ही समझाने के लिये शेष बचती हैं ।
आज शालेय जीवन में ही जब विद्यार्थियों का ध्यान केवल पढ़ाई और भविष्य संवारने में लगा होना चाहिये तब हम उन्हें स्त्री-पुरुषों के जननांगों की बारीकियों और हानि-लाभ के साथ-साथ संबंधित सुरक्षा उपायों की शिक्षा देना चाहते हैं तब विद्यार्थी बाकी बातौं को तो साधारण रूप से ग्रहण करेंगे लेकिन, सुरक्षा उपायों पर उनका ध्यान जरूर केन्द्रित होगा जिससे यौन क्रियाओं की प्रवृत्ति को बल मिलेगा । आज भी रेडियो, टेलीविजन और समाचार पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापन, फिल्मों और समाचारों द्वारा परोसी जा रही सामग्री के परिणाम दिखाई देने लगे हैं ।
हम यहाँ यौन शिक्षा के शत-प्रतिशत विरोधी नहीं हैं । शालेय स्तर पर यौन शिक्षा प्रणाली लागू करने के पूर्व इसके समस्त पहलुओं का बारीकी से अध्ययन नितान्त आवश्यक है । इसके तात्कालिक और दूरगामी परिणामों का प्रामाणिक सर्वेक्षण और परीक्षण होना अनिवार्य है । पश्चिमी देशों का अंधानुकरण और जल्दबाजी में उठाया गया कोई भी गलत कदम हमारी पारम्परिक सामाजिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर सकता है । जहाँ तक मेरा मानना है कि शालेय पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा का विशेष पाठ्यक्रम न होकर अन्य विषयों का स्वरूप ही ऐसा होना चाहिये जिससे छात्र प्रशिक्षित शिक्षकों के अध्यापन से ही यौन शिक्षा का भी आदर्श ज्ञान प्राप्त कर सकें।
आज हर बच्चा औसतन जयादा जिज्ञासु प्रतीत होता है। वह आस-पड़ोस के परिवेश से पूर्णरूपेण परिचित होना चाहता है । एक छोटी सी गलत जानकारी उसके भविष्य में गतिरोध बन सकती है। अतः उसकी सारी जिज्ञासाओं का समाधान ऐसे तरीकों से माँ-बाप और शिक्षकों द्वारा किया जाना चाहिये जिससे वह यौन शिक्षा को सहजता से स्वीकार करे, न कि उसके दुरुपयोग हेतु किसी जानकारी के रूप में ग्रहण करे.
हम यहाँ यह भी बताना चाहेंगे कि आज के छात्र और छात्रायें अपने भविष्य के प्रति अधिक जागरूक और संवेदनशील हैं । भूमंडलीयकरण के चलते हर छात्र अपना भविष्य देश-विदेश की अच्छी से अच्छी नौकरी के रूप में देखता है । हम कह सकते हैं कि जब छात्र स्वमेव अपने भविष्य के प्रति सजग है तब हम ऐसी कोई भूल न करें जिससे सुनहरा भविष्य और सकारात्मक सोच दिग्भ्रमित हो ।
आज आवश्यकता है अपनी संस्कृति और अच्छी परम्परओं के बीज अपनी संतानों में डालने की । उनमें आदर्श मानवीय भावनायें जगाने की, क्योंकि आज हमारी हिन्दु संस्कृति सम्पूर्ण विश्व में केवल अपनी विशेषताओं के कारण सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है । हमारे समाज और हमारी शिक्षा प्रणाली में आज ऐसी भावनाओं और विचारों का समावेश किया जाना अत्यावश्यक हो गया है, जिससे शालेय जीवन में हमारी संतान बिना दिग्भ्रमित हुए यौन शिक्षा प्राप्त करे और प्राप्त जानकारियों का उपयोग कर अपना जीवन विकासोन्मुखी बना सके ।
- विजय तिवारी " किसलय "

मंगलवार, 12 मई 2009

इन्द्रिय आवेग पर नियन्त्रण और प्रेम

इन्सान का इन्द्रियों के वश में होना स्वाभाविक प्रक्रिया है । इन्द्रियों का आवेग प्रायः अनैतिक, अधार्मिक एवं असामाजिक गतिविधियों की ओर प्रेरित करता है । वहीं दूसरी ओर इन्द्रियाँ इच्छा शक्ति के समक्ष झुकती भी है । ऐसे अनेक प्रमाण हमारे वेद पुराणों में उपलब्ध हैं । यदि ऐसा नहीं होता तो समाज में नैतिकता और अनैतिकता का बेमेल मिश्रण बन जाता । हमारे अंदर का ज्ञान और हमारे अंदर की कर्त्तव्यपरायणता सदैव इन्द्रिय आवेग बढ़ने का विरोध करती है । हमें लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है । बुद्धि और विवेक के प्रयोग से लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। मन यदि भटकता है तो उसे उचित दिशा की ओर ले जाया जा सकता है । ऐसा करने पर हम जहाँ अपने अंदर की बुराईयों का अंत कर पाने में अपने आप को समर्थ पाते हैं, वहीं ईर्ष्या, घृणा, क्रोध, अत्याचार से भी बचा जा सकता है । हम विनम्रता, प्रेम, सहयोग, परमार्थ और अपनत्व जैसे गुणों से बुराईयों पर विजय प्राप्त कर नैतिक मूल्यों की विचारधारा के ध्वजवाहक भी बन सकते हैं ।
हमें आज अपनी उन कमजोरियों के प्रति चिन्तन करने की आवश्यकता महसूस होने लगी है जो हमारे राष्ट्र और हमारी निजी जिन्दगी को भी प्रभावित कर रही है। आज हम अपनी कमजोरियों पर नहीं, दूसरों की सफलताओं पर चिन्तित होते है । आज हम अपनी कमजोरियों को दूर करने के स्थान पर दूसरों के अवगुण और दोष ढूँढते में अपना कीमती वक्त बरबाद करते हैं। छोटे छोटे स्वार्थ के वशीभूत होकर हम ईश्वर प्रदत्त इस प्रेम की नियामत को जहरीला बनाने में भी गुरेज॒ नहीं करते। प्रेम तो दूसरों की उपलब्धियों और सद्गुणों पर न्यौछावर होने को आतुर रहता है। उन्हें मान और सम्मान देता है । प्रेम कभी किसी का निरादर या उपेक्षा नहीं करता। प्रेम सम्पूर्ण जगत में जन्मजात पाया जाने वाला गुण है। जब जीवजन्तु तक इस प्रेम को जानते पहचानते और एहसास करते हैं तब विवेकशील कहे जाने वाले इन्सान को तो और अधिक सम्वेदनशीलता का परिचय देते हुये प्रेम पथ पर अग्रसर होना चाहिये । हमारे इर्द गिर्द पनपने वाली हर छोटी छोटी बुराईयाँ जो बाद में विकराल रूप धारण कर सकती हैं, उन्हें अपने प्रेम रूपी अस्त्र से समाप्त करते रहना चाहिये । शायद यही आज के भावना शून्य और तनाव भरे जीवन की महती आवश्यकता भी है ।
-विजय तिवारी " किसलय "

सोमवार, 4 मई 2009

भारत का प्रमुख ऐतिहासिक एवं महत्त्वपूर्ण नगर 'जबलपुर'

जबलपुर विशाल भारत के प्रमुख ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण नगरों में से एक है। आचार्य विनोबा भावे द्वारा ‘संस्कारधानी‘ नाम से विभूषित जबलपुर शब्द की उत्पत्ति के संबंध में इसको जाउलीपत्तन का अपभ्रंश माना जा सकता है जो कि कल्चुरी नरेश जयसिंह के ताम्रलेख के अनुसार एक मण्डल था। जाबालि ऋषि की तपोभूमि होने के कारण इसे जाबालीपुरम् से भी जोड़ा जाता है। जबलपुर एवं इसका निकटवर्ती प्रक्षेत्र ऐतिहासिक, दार्शनिक , राजनैतिक, साहित्यिक एवं सामरिक दृष्टि से अपना विशेष महत्व रखता है।
प्राकृतिक सुन्दरता की गोद में बसे जबलपुर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती पावन नर्मदा एवं दूर तक दृष्टिगोचर होती पर्वत श्रृंखलाओं के फलस्वरूप इस नगर की सुन्दरता में एक अनोखा सामंजस्य बन गया है। भेड़ाघाट में संगमरमरी चट्टानों की सुरम्य घाटियों के दृश्य देखते हुए लोगों की आँखें आश्चर्य चकित हो जाती हैं। पास ही प्रकृति की अनोखी धरोहर ‘धुआँधार‘ नामक जलप्रपात के रूप में दिखाई देता है।
यहीं पहाड़ी पर बना चौसठ योगिनी का मन्दिर प्राचीन शिल्पकला का अनूठा उदाहरण है। एक चक्र के आकार में 86 से भी अधिक देवी, देवताओं एवं योगिनियों की मूर्तियों में अद्भुत शिल्पकला के दर्शन होते हैं। भेड़ाघाट के समीप ही नर्मदा के ही लम्हेटाघाट में पाई जाने वाली चट्टानें विश्व की प्राचीनतम चट्टानों में गिनी जाती है। भूगर्भशास्त्रियों द्वारा इनकी उम्र लगभग 50 लाख वर्ष बताई गई है तथा विश्व की भूगर्भीय भाषा में इन चट्टाओं को लम्हेटाईट नाम से जाना जाता है। जबलपुर की पश्चिम दिशा में भेड़ाघाट रोड पर स्थित वर्तमान तेवर ही कल्चुरियों की राजधानी त्रपिुरी है जो कि शिशुपाल चेदि राज्य का वैभवशाली नगर था। इसी त्रिपुरी के त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध करने के कारण ही भगवान शिव का नाम ‘त्रिपुरारि‘ पड़ा।
गांगेय पुत्र कल्चुरी नरेश कर्णदेव एक प्रतापी शासक हुए, जिन्हें ‘इण्डियन नेपोलियन‘ कहा गया है। उनका साम्राज्य भारत के वृहद क्षेत्र में फैला हुआ था। सम्राट के रूप में दूसरी बार उनका राज्याभिषेक होने पर उनका कल्चुरी संवत प्रारंभ हुआ। कहा जाता है कि शताधिक राजा उनके शासनांतर्गत थे।
कल्चुरियों के पश्चात् गौंड़ वंश का इतिहास सामने आता है और गढ़ा-मण्डला की वीरांगना रानी दुर्गावती की वीरता तथा देशभक्ति याद आती है। मुगलों से लड़ते हुए उनके पुत्र वीरनारायण की शहादत एवं अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए स्वयं के प्राणोत्सर्ग की घटना दुर्लभ कही जा सकती है। महारानी दुर्गावती के पूर्व मदनशाह की स्मृति में सुरम्य पहाड़ियों के मध्य बना मदन महल हो अथवा रानी दुर्गावती के सेनापति अधार सिंह, श्वसुर संग्राम शाह, चेरी अर्थात दासी की स्मृतियों में बने रानीताल, अधारताल, संग्राम सागर, चेरीताल के रूप में आज भी गौड़ वंश की स्मृतियाँ जीवित हैं। गौंड़ साम्राज्य चार भागों में बँटा हुआ था। उत्तर प्रान्त की राजधानी सिंगौरगढ, दक्षणि- पूर्व की मण्डला, पश्चिम की चौरागढ़ तथा मध्य की गढ़ा राजधानी थी। गढ़ा समस्त साम्राज्य का केन्द्र था।
स्वतंत्रा संग्राम की लड़ाई में भी जबलपुर का सक्रिय योगदान रहा है। भारत में झण्डा आंदोलन का सूत्रपात जबलपुर से ही हुआ था। जबलपुर वासियों की स्वतंत्रता के प्रति सक्रयिता का ही परिणाम था कि सन् 1939 में अखिल भारतीय कांग्रेस का 52 वाँ ‘त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन‘ जबलपुर में हुआ। ज्ञातव्य है कि इस अधिवेशन में महात्मा गांधी समर्थित पट्टाभि सीतारमैया को हराकर सुभाष चन्द्र बोस के राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर गांधी जी और उनके बीच मतभेद की परिणति सुभाष बाबू के फारववर्ड ब्लाक के गठन के रूप में हुई, जिसकी स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका रही। ज्ञातव्य है कि श्री सुभाष चन्द्र बोस स्वतंत्रा आंदोलन में जबलपुर सेन्ट्रल जेल में भी रहे हैं।
‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी‘ कविता की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान, व्यंग्य विधा के जनक हरिशंकर परसाई जैसे साहित्यकारों की नगरी जबलपुर में ख्यातिलब्ध व्यक्तित्वों की कमी नहीं रही। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र, मध्य प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष कुंजीलाल दुबे, सेठ गोविन्ददास, राजर्षि परमानन्द भाई पटेल, राजस्थान के पूर्व राज्यपाल निर्मल चंद जैन, साहित्य मनीषी रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल‘ एवं वर्तमान में मध्य प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष श्री ईश्वरदास रोहाणी को कौन नहीं जानता।
जबलपुर की माटी और संस्कृति में पल्लवित आचार्य रजनीश एवं महर्षि महेश योगी विश्वविख्यात विभूतियाँ हैं। सम्पूर्ण भारत के डाकतार विभाग में पिन कोड अर्थात पोस्टल इन्डेक्स नंबर की प्रणेता भी जबलपुर की ही श्रीमती चौरसिया थीं। मध्य प्रदेश राज्य विद्युत मण्डल मुख्यालय, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, पश्चिम-मध्य रेलवे जोन मुख्यालय, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय एवं आयुध निर्माणियों का यह नगर देश में अपना विशेष स्थान रखता है।
उपनगरीय क्षेत्र गढ़ा में पर्वतश्रृंखला पर स्थित जैन मंदिर समूह एवं नीचे नंदीश्वर द्वीप सहित कांग्रेस अधिवेशन की स्मृति में निर्मित गांधी स्मारक कमानिया गेट, त्रिपुरी कांग्रेस स्मारक, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय भवन, गोकुलदास धर्मशाला आदि इमारतें आज भी वैभव एवं वास्तुकला के प्रमाण हैं। सुभाष चन्द्र बोस, विनोबा भावे, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू की अनेक प्रवासों की स्मृतियाँ संजोए जबलपुर आज भी राजनीति, साहित्य और संस्कारों की निजी पहचान बनाए हुए हैं।
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-विजय तिवारी "किसलय" जबलपुर

रविवार, 26 अप्रैल 2009

पावस और पर्व पर विहंगावलोकन

आदि से अब तक सृष्टि का संचालन नियमानुसार चला आ रहा है । सूर्य का अपना क्रम निर्धारित है . चंद्रकलाएँ आज भी वैसी ही घट - बढ़ रही हैं . सभी ग्रह - नक्षत्र अपने अपने नियत पथ पर गतिशील हैं . पृथ्वी भी सुनियोजित चलायमान है. जल - वायु - अग्नि - आकाश सभी अपने नियमों के पालनार्थ कटिबद्ध हैं .
पृथ्वी के सन्दर्भ में कहा जाता है कि अपनी ही धुरी पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा के दौरान सूर्य से उसकी दूरी की घट-बढ़ ही ऋतुओं की जनक है . वर्ष भर पूरे विश्व में अलग-अलग कालखण्ड में अलग-अलग ऋतुएँ होती हैं जिन्हें उनकी प्रकृति और गुणों के अनुरूप जाना जाता है. आदि काल में ही मानव ने ऋतुओं का महत्व समझ लिया था . मानव क्या सभी जीव जन्तु भी ऋतुओं के अनुसार हर्ष और विषाद प्रकट करते हैं . अपने रहनसहन में बदलाव लाने के साथ - साथ समयानुसार अपना खानपान भी बदल लेते हैं .
भारत को प्राकृतिक, जलवायु, वनस्पति, मिट्टी, भाषा, जनसंख्या, ऋतुओं सहित अनेक आधार पर विभिन्न भागों में बाँटा जा सकता है। भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भारत के क्षेत्र विशेष एक दूसरे से भिन्नता लिए दिखाई पड़ते हैं . कश्मीर से लेकर केरल तक या गुजरात से लेकर असम तक सभी जगहों पर भौगोलिक भिन्नता के परिणामस्वरूप ऋतुओं में भी भिन्नता है. इसके अलावा भी भारत अनेक क्षेत्रों में अनोखा है . भारत जैसी वर्गीकृत ग्रीष्म - वर्षा - शरद - शिशिर - हेमंत - बसंत नामक छः ऋतुएँ भी विश्व में कहीं नहीं हैं . इन सभी ऋतुओं की अपनी अपनी अलग पहचान एवं विशेषताएँ हैं .
संपूर्ण वर्षाकाल को चौमासा नाम से संबोधित किया जाता है । भारत में पर्वों इसकी समयावधि जून से सितंबर तक मानी गई है . मई के आसपास आकाश में बादलों के झुंड दिखाई देने लगते हैं. बिजली आकाश में चमकने लगती है . दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में कहीं - कहीं बारिश भी होने लगती है . मानसूनी हवाओं, बारिश, पानी, हरियाली एवं पर्वों की बहुलता के कारण सभी इस ऋतु के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं . ज्येष्ठ मास वैसे भी वर्षा के आगमन का संकेतक कहा गया है. भीषण गरमी के बावज़ूद वृक्षों में पानी चढ़ने लगता है . पीपल, बरगद अपने नये पल्लवों से हरे भरे हो जाते हैं . सूखे पलाश भी नये पत्तों के साथ अपनी शाखाएँ हिलाकर हरियाली प्रदर्शित करते हैं. कहीं कहीं हल्की बारिश के चलते मेढक वर्षादूत बनकर पावस के आगमन का संदेश सुनाते प्रतीत होते हैं. यह वही समय होता है जब धरा के सभी जीव - जन्तु विकराल गर्मी से व्याकुल हो उठते हैं . नौतपा की गरमी अग्निवर्षा जैसी लगती है . नौतपा के साथ ही वायु मंडलीय गतिविधियों से बारिश की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं और तभी बारिश हम सभी को खुशियों की सौगात देती है . बाहर निकालकर मेढकों की टर्राहट बारिश के प्रति आशान्वित करती है . शीतलता पाकर पक्षियों के समूह चहकने लगते हैं, मयूर नृत्य द्वारा अपनी खुशी प्रदर्शित करते हैं . धरा पर हरियाली आच्छादित होने लगती है . मेघ जहाँ पृथ्वी को संतुष्ट करने की होड़ लगाते हैं वहीं कृषक और आम आदमी राहत की साँस लेता है . ऐसी पावस की ऋतु में भला साहित्यकार भी चुप कैसे बैठ सकते हैं . वे भी पावस की सतरंगी दुनिया को अपनी लेखनी के माध्यम से समेटने का प्रयास करते हैं ।
हमारा भारत कृषि प्रधान देश है और कृषि का तो सर्वस्व ही वर्षा पर निहित होता है । वर्षा की न्यूनाधिकता पर ही कृषकों की खुशियाँ निभर करती हैं . चौमासे में प्रायः लोग यात्राएँ कम ही करते हैं . ऐसे में सामाजिक - धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व - उत्सवों की बाढ़ सी आ जाती है . वर्षाकालीन बीमारियों का भी भय रहता है . ज़रा सी भी असावधानी बीमारी को आमंत्रण दे देती है . शायद इसी कारण इस ऋतु में हमारे बुजुर्गों ने अन्य ऋतुओं की अपेक्षा व्रत एवं उपवास कुछ ज़्यादा ही बना कर रखे हैं . हमारे विशाल देश में विभिन्न जातियों, समुदाय तथा भाषा - भाषाई लोग निवास करते हैं . इनके रहन - सहन , ख़ान - पान तथा रीति - रिवाज़ भी एक दूसरे से भिन्न होते हैं, परंतु मूलरूप में हिंदू संस्कृति की एकरूपता इनमें समाविष्ट है .
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि व्रत एवं पर्वों का एक ही ध्येय होता है और वह है मन पर नियंत्रण करते हुए शारीरिक तथा आध्यात्मिक स्वस्थता प्राप्त करना । व्रत अनेक रोगों से मुक्ति के साथ - साथ मानव के स्वस्थ जीवन यापन में सहायक होते हैं. व्रतों से आत्म शुद्धि भी होती है .
प्राचीन काल में इस बहुपर्वी ऋतु के सभी व्रत - पर्वों को नियमबद्धता से मनाया जाता था । उसका ही प्रतिफल था कि उस काल में आज जैसे रोगों का बाहुल्य नहीं था. लोग नीरोगी तो होते ही थे, शतायु भी होते थे . कहा जाता है कि व्रत - पर्व एवं उत्सव नास्तिक को आस्तिक, स्वार्थी को परमार्थी, भोगी को योगी, कृपण को उदार और नीरसता को सरसता में बदलकर उन्हें बनाता है . लक्ष्योन्मुखी बनाता है .
पावस में जहाँ आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को सरयू तट पर रथ यात्रा में असंख्य श्रद्धालु एकत्र होते हैं वहीं आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को भगवान वेद व्यास की जन्म तिथि पड़ती है । गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने वाला यह पर्व गुरु - शिष्य परंपरा का द्योतक है . इसी पावस में गुन्डिचा मंदिर में जो भगवान जगन्नाथ जी का महोत्सव होता है उसे गुन्डिचा महोत्सव कहते हैं . श्री हरि के शयन काल में व्रत परायण होकर वर्षा के चार महीने अर्थात चौमासा व्यतीत करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है . चौमासे में व्रत पालन से व्रती रोगमुक्त होने के साथ साथ सुखमय जीवन यापन करता है . आषाढी देवता का पूजन पूरे आषाढ़ मास चलता रहता है . यह पूजन - व्रत वैसे तो वन देवता के लिए होता है, लेकिन इसमें सभी देवताओं की पूजा - अर्चना की जाती है . भाद्र पद कृष्ण अष्टमी को जगन्नियन्ता , जगतपालक भगवान विष्णु ने ही कृष्ण रूप में श्री वसुदेव जी के यहाँ कंसासुर के कारागृह में देवकी के गर्भ से अवतरित होकर कन्स जैसे राक्षस का वध किया था . यह तिथि मुक्ति प्रदायक है . शास्त्रानुसार रोहणी नक्षत्र युक्त अष्टमी तिथि अर्ध रात्रि में हो तो उस तिथि के उपवास से करोड़ों यज्ञ का फल प्राप्त होता है .
श्रावण मास में आशुतोष भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है . हरियाली तीज, नागपंचमी, हरितालिका के साथ भाई - बहन का सबसे पावन एवं महत्वपूर्ण पर्व रक्षाबन्धन भी पावस में ही मनाया जाता है .
भाद्र पद की शुक्ल चतुर्थी सिद्धि विनायक चतुर्थी के नाम से जानी जाती है । इनमें किया गया दान, उपवास, पूजन - अर्चन गणेश जी की कृपा से बढ़ कर सौ गुना हो जाता है, परंतु इस चतुर्थी को चंद्र दर्शन वर्जित है क्योंकि इस दिन चंद्र दर्शन से मिथ्या कलंक लगता है, ऐसा कहा गया है . उपरोक्त व्रत - पर्वों के अतिरिक्त ऋषि पंचमी, संतान सप्तमी, राधा जन्माष्टमी , अनंत चतुर्दशी, महालक्ष्मी व्रत जैसे पावस ऋतु के अनेक व्रत - पर्व एवं उत्सव हैं जिन्हें भारतीय बड़ी श्रद्धा भक्ति और आस्था के साथ मनाकर अपने शरीर को नीरोगी तथा आत्मा को निर्मल रखने में सफल होते हैं .
इस तरह पावस ऋतु जहाँ आशाओं को सफलता में रूपांतरित करती है, वहीं भारतीय पारंपरिक रीति - रिवाज़ से मनाए जाने वाले पर्व मानव जीवन में संजीवनी की तरह फल दायक है .
- विजय तिवारी " किसलय "

रविवार, 19 अप्रैल 2009

वृद्धावस्था आज भी बड़ी समस्या है.

प्रायः यह देखा गया है कि हमारे समाज में वृद्धों की स्थिति अधिकाँशतः दयनीय ही होती है, भले ही वे कितने ही समृद्ध एवं सभ्य क्यों न हों . उनकी संतानें उनके सभी दुख-सुख एवं उनकी समस्याओं का निराकरण नहीं कर पाते, ये मैं नहीं बताना चाहूँगा कि इनके पीछे कौन कौन से तथ्य हो सकते हैं. जिस वस्तु की उन्हें आवश्यकता होती है या उनका मन चाहता है वे आसानी से प्राप्त नहीं कर पाते, तब उनके मन एवं मस्तिष्क में उस कमी के कारण चिंता के बीज अंकुरित होने लगते हैं जो उनके के लिए घातक सिद्ध होते हैं. वैसे भी आधुनिक युग में वृद्ध अपनी जिंदगी से काफ़ी पहले ऊब जाते हैं. अधिकतर वृद्धों के चेहरों पर मुस्कराहट या चिकनाहट रह ही नहीं पाती . उनका गंभीर चेहरा उनके स्वयं की अनेक अनसुलझी समस्याओं का प्रतीक सा बन जाता है. उनकी एकांतप्रियता भी दुखी हृदय का द्योतक होती है.
इस तरह की परिस्थितियाँ वृद्धावस्था में ही क्यों आती हैं? बचपन और जवानी के दिनों में क्यों नहीं आतीं ? इनके बहुत से कारणों को आसानी से समझा जा सकता है. बचपन में संतानें माता - पिता पर आश्रित रहती हैं. उनका पालन - पोषण, शिक्षा - दीक्षा एवं नौकरी - चाकरी तक माँ - बाप लगवा देते हैं. इतने लंबे समय तक बच्चों को किसी भी प्रकार की कमी नहीं होती. प्रत्येक चाही-अनचाही आवश्यकताओं की पूर्ति माता - पिता ही करते हैं. बच्चे जवानी की दहलीज़ पर पहुँचते - पहुँचते अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं और अपने परिवार का भी दायित्व निर्वहन करने में सक्षम हो जाते हैं. अपनी इच्छानुसार अनेक मदों में धन का व्यय करके अपनी अधिकांश आवश्यकताएँ पूरी करते रहते हैं.
इन्हीं परिस्थितियों एवं समय में वही परंपरागत वृद्धावस्था की समस्या अंकुरित होने लगती है । जब वृद्ध माता - पिता के ख़ान-पान , उनकी उचित देख-रेख और उनके सहारे की अनिवार्य आवश्यकता होती है तभी वे संतानें जिन्हें रात-रात भर जागकर सुलाया, खुद ही इनके मूत्र भरे गीले कपड़ों में सोकर इन्हें सूखे बिस्तर में सुलाया। इनका पालन - पोषण और प्रत्येक इच्छाओं को पूरा करते हुए पढ़ाया- लिखाया तथा रोज़ी-रोटी से लगाया । उनका विवाह कराया ,उनके हिस्से के सारे दुखों को खुद सहा और वह केवल इसलिए की वे खुश रहें और वृद्धावस्था में सहारा बनें,परंतु आज की अधिकतर कृतघ्न संतानें अपने माता - पिता से नफ़रत करने लगती हैं। उनकी सेवा सुश्रूषा से दूर भागने लगती । उनकी छोटी छोटी सी अनिवार्य आवश्यकताओं को भी पूरी करने में रूचि नहीं दिखातीं ऐसी संतानों को क्या कहा जाए जो उनसे ही जन्म लेकर अपने फ़र्ज़ को निभाने में कोताही करते हैं। उनकी अंतिम घड़ियों में उनकी आत्मा को शांति नहीं पहुँचाती
आज ऐसी शिक्षा कि आवश्यकता है जिसमें माता - पिता के लिए भावनात्मक एवं कृतज्ञता की विषयवस्तु का समावेश हो । आवश्यकता है पाश्चात्य संस्कृति के उन पहलुओं से बचने की जिनकी नकल करके हम अपने माता - पिता की भी इज़्ज़त करना भूल जाएँ.वहीं दूसरी ओर समझाईस के रूप में यह भी आवश्यक है की वृद्ध माता - पिता को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि संतान के परिपक्व होने के पश्चात उसे अपनी जिंदगी जीने का हक होता है और उसमें अनावश्यक हस्तक्षेप हानिकार ही होगा. अतः बात -बात पर, समय- असमय, अपनी संतानों को भला - बुरा अथवा अपने दबाव का प्रभाव ना ही बताना श्रेयस्कर होगा अन्यथा वृद्धों की यह परंपरागत समस्या निराकृत होने की बजाय भविष्य में और भी विकराल रूप धारण कर सकती है.
- विजय तिवारी "किसलय "
(पाठकों से निवेदन है कि वे इस आलेख को संकेतात्मक स्वीकार करें , अपवाद तो हर जगह संभव हैं)

कुंठा नहीं एक साहित्यकार की सहज पीड़ा

गिरीश भाई का आलेख " आलोचक ही नहीं सभी तो बीस-बीस वाला मैच खेल रहे हैं ....!! ." पढ़ा. आलेख में गिरीशजी ने लिखा है कि "इस आलेख को आप कुंठा ही कहेंगे" तो मैं कहना चाहूँगा कि ये आपकी कुंठा नहीं एक साहित्यकार की सहज पीड़ा है. ये उस साहित्य सेवक के मन को कचॉटने वाली बात बात है जो इस तरह वरिष्ठ साहित्यकारों के लिए कुछ सकारात्मक करने की सोच रखता हो और यथा संभव कर भी रहा हो. बिना नींव के स्थाई मकान की कल्पना की तरह हम अग्रज पीढ़ी के साहित्यकारों और उनके लेखन की अनदेखी कर के ना ही साहित्य का भला कर पाएँगे और ना ही स्वयं का . इस तरह के कार्यों में देखा गया है कि वे लगभग सारे लोग जो माइक पर आदर्श , सक्रियता और बड़े- बड़े सुझावों की बातें करते है वही सबसे ज़्यादा उपेक्षा करते देखे गये हैं. महत्वाकांक्षा रखने वाले इन सबका सुदीर्घ साहित्यिक जीवन हो ही नहीं सकता . ये सारे लोग वहाँ पाए जाते हैं जहाँ इनका स्वार्थ सिद्ध होता है. ये लोग सहयोग की छोड़िए, आपको हतोत्साहित करने से भी नहीं चूकते.
इस लिए गिरीश जी से मेरा निवेदन है कि वे भी केवल कर्तव्य पर विश्वास करते हुए आगे बढ़ें मैं तो यथासंभव जो बनता है कर ही रहा हूँ. आप अकेले नहीं हैं मैं भी हूँ और मेरे जैसे और भी लोग हैं अभी इस दुनिया में जो निश्चल भाव से साहित्य कि सेवा में लगे हुए हैं. मैं आपकी विचारधारा की कद्र करता हूँ और आभार मानता हूँ की आपने मेरी बात को आगे बढ़ाया.
- विजय तिवारी ' किसलय '

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

ज्ञानरंजन जी को साधना सम्मान और मराल जी को सारस्वत सम्मान

"वागर्थ" का प्रकाशन करने वाली "भारतीय भाषा परिषद्" ने संस्कारधानी जबलपुर के श्री ज्ञान रंजन सहित ४ वरिष्ठ साहित्यकारों को साधना सम्मान-२००८ देने का निर्णय लिया है.
ज्ञात हो कि हिंदी के शीर्ष साहित्यकार एवं "पहल" के संपादक श्री ज्ञान रंजन को उनके द्बारा की गई उल्लेखनीय हिंदी साहित्य सेवा हेतु १८ अप्रेल २००८ को कोलकाता में इंक्यावन हजार रुपये की सम्मान निधि के साथ उक्त "साधना सम्मान " से अलंकृत किया जायेगा, साथ ही पंजाबी साहित्य
के लिए डॉ. महेंदर कौर गिल, तमिल साहित्य के लिए श्री वेरामुत्तु और उड़िया साहित्य
के लिए श्री रामचंद्र बेहरा को भी साधना -२००८ सम्मान से नवाजा जायेगा।


वहीँ जबलपुर के ही वरिष्ठ कवि, साहित्यकार एवं दो दर्जन पुस्तकों के रचयिता डॉ. गार्गी शरण मिश्र "मराल" को विगत दिनों लखनऊ में यू एस पत्रिका द्बारा सारस्वत सम्मान से विभूषित किये जाने पर संस्कारधानी के साहित्य जगत में खुशियों का माहौल निर्मित हो गया है।

आदरणीय ज्ञान जी एवं मराल जी को हिंदी साहित्य संगम की हार्दिक बधाई .

- विजय तिवारी " किसलय "

बुधवार, 25 मार्च 2009

क्या शीर्षस्थ नेता योग्य प्रत्याशी चुनने का माद्दा रखते हैं ?

राष्ट्र की उन्नति, राष्ट्र का विकास, राष्ट्र का नव निर्माण देश की ज़िम्मेदार जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधियों एवं शासन की नीतियों के सफल क्रियान्वयन से ही संभव होता है. यदि देश के जनप्रतिनिधि ईमानदार, देशभक्त एवं लगनशील होंगे तो इसमें दो मत नहीं कि राष्ट्र विकास की धारा तीव्र से तीव्रतम होती जाएगी और यदि हमारे द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही स्वार्थी, पदलोलुप और भ्रष्टाचारी होंगे तो राष्ट्र के गर्त में गिरने से कोई नहीं बचा पाएगा. यहाँ यह कहना पड़ रहा है कि देर ज़रूर होती है अंधेर नहीं.
हमारे राष्ट्र भारत की विशालता से सभी परिचित हैं. चीन के बाद आबादी में हमारे राष्ट्र ने इस धरा को सबसे अधिक बोझ से दबाया है. देश बड़ा है तो जनसंख्या भी बड़ी है. जनप्रतिनिधि भी ज़्यादा होते हैं. आधे से अधिक लोगों को भारत की भौगोलिक संरचना और सीमा की भी जानकारी नहीं होगी. एक ही देश के नागरिक होने पर भी देश के दूसरे छोर के लोगों की भाषा नहीं जानते, उनसे सामान्य संवाद नहीं कर पाते हम तो कहेंगे कि संवाद हीनता की स्थिति भाषाई आधार पर बाँटे गये प्रांतों के कारण निर्मित हुई है. गुजरात का नागरिक असम और काश्मीर का नागरिक तमिल जानने कि कोशिश ही नहीं करता. सबकी अपनी ढपली अपना राग है. कोई क्षेत्रीयता और राज्य से ऊपर उठ कर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में चिंतन करने का सोचता ही नहीं है.
राष्ट्र के प्रतिनिधि, मंत्री तक राष्ट्रीय भावना को दर किनार रख कर अपनी जीत सुनिश्चित करने हेतु क्षेत्रीयता और जातिवाद पर ही ज़ोर देते देखे जाते हैं. राजनैतिक दलों में भी स्वार्थी भावना किसी से छिपी नहीं है अपने दल की जीत हेतु सामने वाले दल की हर बात का विरोध करना अपना दायित्व समझ बैठे हैं, भले ही वह बात राष्ट्र हित का अहम हिस्सा ही क्यों न हो.
आज इन विचारधाराओं में तब्दीली भले ही चुनौती हो लेकिन बदलना बहुत ज़रूरी हो गया है अब राष्ट्र में ऐसा महसूस किया जाने लगा है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अन्य विकसित राष्ट्रों की बराबरी तक पहुँचने के लिए कुछ ऐसे प्रयास/प्रयोग किए जाएँ जिनकी सही मायने में राष्ट्र को ज़रूरत है. इनमें राजनैतिक दलों द्वारा चुनाव प्रक्रिया के चलते योग्य (यथार्थ में) प्रत्याशियों का चयन भी महत्व्पूर्ण कड़ी है.
चुनाव सिर पर आते ही सभी राजनैतिक दल अपनी प्रत्याशी चयन प्रक्रिया में व्यस्त हो जाते हैं. राजधानी में बैठे शीर्षस्थ नेता प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की राजनैतिक परिस्थितियों का आकलन कर ऐसे प्रत्याशी का ही चयन करते हैं जो जीत दिला सके. प्रिंट तथा एलेक्ट्रॉनिक मीडिया, कृत्रिम लोकप्रियता, झूठे विज्ञापन / पत्राचार एवं तरह तरह की वज़नदारी दिखाकर आज अधिकांश अयोग्य भी अपनी टिकिट पक्की करने में सफल हो जाते हैं. वहीं दूसरी ओर राष्ट्र और राजनैतिक दलों को समर्पित सच्चे जनसेवियों की टिकिट कट जाती है. शीर्षस्थ नेता साम-दाम-दंड-भेद के चक्रव्यूह में फस कर, झूठी, स्वार्थपरक जानकारियों पर विश्वास कर लेते हैं. आर्थिक मजबूती की चमक-दमक के आगे नेतृत्व को भी झुकना पड़ता है जो हमारे लोकतंत्र के लिए घातक है.
उचित तो यह है कि राष्ट्रहित एवं दलीय मापदंड के अनुरूप ही प्रत्याशी की दावेदारी का आकलन किया जाना चाहिए. सर्वप्रथम प्रत्याशी का स्थानीय होना अतिआवश्यक है क्योंकि वह ही शतप्रतिशत स्थानीय बातों की जानकारी से अवगत रहता है. बाहर से थोपे गये प्रत्याशी को अधिकांश लोग नापसंद करते हैं. दावेदार द्वारा जनहित में किए गये कार्यों / प्रयासों का सप्रमाणिक ब्यौरा देखा जाना चाहिए. जनमानस में उसकी छवि एक सुलभ, समाजसेवी एवं जनप्रिय कार्यकर्ता की होना चाहिए. टिकिट के दावेदार राष्ट्र एवं क्षेत्र के विकास हेतु कितना समर्पित है, इसका भी पता चयनकर्ताओं को होना चाहिए. ऐसा भी देखा गया है कि उम्मीदवार अपने प्रभाव, अपनी धन-दौलत, सही-ग़लत प्रभावी जनप्रतिनिधियों के अनुमोदन एवं गुटीय आधार का फ़ायदा उठाकर भी अपनी नीति में सफल हो जाते हैं. जातिगत और क्षेत्रीय मुद्दे भी अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं.यदि उचित प्रक्रिया द्वारा प्रत्याशियों का चयन हो तो निश्चित ही देश और समाज की प्रगति में चार चाँद लग सकते हैं, भले ही प्रत्याशी किसी भी राजनैतिक दल /गुट से संबद्ध क्यों न हो.......
लेकिन
मुझे लगता है कि आज हमारे देश में ऐसे शीर्षस्थ नेताओं कि कमी है जो योग्य प्रत्याशी चुनने का माद्दा रखते हों ?

- विजय तिवारी " किसलय "