अवसर विशेष लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अवसर विशेष लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

कदम संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पौधारोपण कर विजय तिवारी "किसलय" ने अपना जन्म दिवस मनाया

       भाई श्री योगेश गनोरे जी के नेतृत्व में कदम संस्था  १७ जुलाई सन २००४ से प्रतिदिन सुबह १० बजे लोगों के जन्म दिवस पौधारोपण करके मनाती चली आ रही है. संस्कारधानी की पहचान बन चुकी "कदम" के इस अभियान की जितनी प्रसंशा की जाए कम है. 













   


















 आज दिनांक ५ फरवरी २०१३ को प्रातः ठीक १० बजे  "कदम" ने डॉ. विजय तिवारी "किसलय" के जन्म दिवस पर मॉडल हाई स्कूल जबलपुर के प्रांगण में "पौधारोपण" कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें संस्था प्रमुख श्री योगेश गनोरे जी, कदम नेक प्रभारी श्री पंकज गोस्वामी, संस्था संरक्षक समाजसेवी श्री अरुण जैन, मॉडल हाई स्कूल जबलपुर के प्राचार्य श्री घनश्याम सोनी, श्रीमती सुमन तिवारी, श्री सुविल तिवारी सहित स्कूल के विद्यार्थी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित थे.
   










   आज ही के दिन  जन्मे श्री महेंद्र कुमार भसीन द्वारा भी पौधारोपण में सहभागिता दर्ज की गई. इस अवसर पर श्री गनोरे जी तथा श्री गोस्वामी जी ने संस्था की प्रतिबद्धताएँ एवं पौधारोपण के महत्त्व पर प्रकाशा डाला.






















 श्री अरुण जैन ने अपनी निम्न ४ पंक्तियों के माध्यम से पौधा रोपण पर  अपने  विचार रखे-
धार के विपरीत जाकर देखिये
ज़िंदगी को आजमाकर देखिये
आँधियाँ मोड़ लेंगी खुद रास्ता अपना
प्यार से इक पौधा तो लगाकर देखिये.


  









      जबलपुर साहित्य रत्न  डॉ. विजय तिवारी 
"किसलय" ने अपने वक्तव्य में कदम के इस अनूठे अभियान की प्रसंशा करते हुए कहा की जनहितैषी गतिविधियों से ही संस्थाओं की सार्थकता सिद्ध होती है. पर्यावरण के संरक्षण के लिए हमारे आसपास पौधारोपण एवं उनके संवर्धन पर ध्यान देना हम सबका दायित्व है जिसका निर्वहन सुनिश्चित किया जाना चाहिए. कार्यक्रम के उपरान्त अथिथियों द्वारा शुभकामना-पत्र प्रदान किये गए.

प्रस्तुति- 
मोहन

रविवार, 23 दिसंबर 2012

24 दिसंबर 2012 को शाम 6.30 बजे ड्रीम लेंड फन पार्क सिविक सेंटर जबलपुर मध्य प्रदेश में स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त स्मृति सम्मान समारोह आयोजित है

कल दिनांक 24 दिसंबर 2012 को शाम 6.30 बजे ड्रीम लेंड फन पार्क सिविक सेंटर जबलपुर मध्य प्रदेश में स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त स्मृति सम्मान समारोह आयोजित है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व उप महाधिवक्ता उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश श्री आदर्श मुनि त्रिवेदीजी तथा मुख्य अतिथि श्री कृष्ण कान्त चतुर्वेदी पूर्व निदेशक कालिदास अकादमी ,मध्य प्रदेश होंगे। 15 वर्ष पूर्व प्रारम्भ किये गए "स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त स्मृति पत्रकारिता सम्मान " से इस वर्ष वरिष्ठ पत्रकार श्री चैतन्य भट्ट को सम्मानित किया जायेगा .
सव्यसाची स्वर्गीया श्रीमती प्रमिला बिल्लोरे स्मृति सम्मान से इस बार संस्कारधानी जबलपुर ही नहीं मध्य प्रदेश के जाने माने उद्घोषक, राष्ट्र स्तरीय सामाजिक पत्रिका "सनाढ्य संगम" के यशस्वी संपादक , साहित्यकार श्री राजेश पाठक "प्रवीण" को नवाजा जायेगा।
संस्कारधानी की भावना के अनुरूप इस कार्यक्रम में हम स्वर्गीय रामेश्वर गुरु जी को भी नहीं भूले। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के चलते हम उनका भी स्मरण करेंगे। डॉ रामशंकर मिश्र जी स्वर्गीय रामेश्वर गुरु जी के साहित्य दर्शन पर एक सारगर्भित आलेख का वाचन करेंगे।

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

श्रीराम भगवान : साथ भक्त हनुमान

        हनुमान जयंती के पावन अवसर पर हमारे मित्र 
प्रेस फोटोग्राफर श्री बी एस दीवान जबलपुर (म.प्र.)
ने हमें ये दुर्लभ छायाचित्र भेजा है. और ख़ास बात
ये है कि कल ६ अप्रेल २०१२ यानी  हनुमान जयंती
पर आप राम भक्त हनुमान को  श्री राम के नजदीक
पाकर आनंद की अनुभूति प्राप्त कर सकें.
भगवान श्रीराम एवं प्रतीकात्मक श्री हनुमान 






















अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं 
दनुजवनकृशानुं ज्ञानीनामग्रगण्यं 
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं 
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं  नमामि  















प्रस्तुति - विजय तिवारी 'किसलय'






सोमवार, 30 जनवरी 2012

विजय तिवारी 'किसलय' कृत नर्मदाष्टक 'नित नमन माँ नर्मदे' - सन्दर्भ नर्मदा जयंती ३० जन २०१२.


माँ नर्मदा
साथियो,
आज दिनांक ३० जनवरी २०१२, माघ शुक्ल सप्तमी है, अर्थात माँ नर्मदा का जन्म दिन है.
आज अमरकंटक से खम्भात की खाड़ी तक के सभी तटों पर माँ नर्मदा की जयंती बड़ी भूमधाम से मनाई जा रही है.
आज आप सबको मैं स्वयं का लिखा नर्मदाष्टक.  "नित नमन माँ नर्मदे" सुना / दिखा रहा हूँ.
इसे पल्लवी थापा और अजिंक्य खडसन ने गया है.  संगीतबद्ध किया है जबलपुर के श्री परशुराम पटेल जी ने.  एन वी आर स्टूडियो के भाई नरेन्द्र कुमार ने इस गीत को संवार कर हमें सौंपा है.

विजय तिवारी 'किसलय'
                                             अनेक  वर्षों से  मैं कई महापुरुषों के नर्मदाष्टक सुनता आ रहा था. कुछ संस्कृत में हैं कुछ जनसामान्य को माँ नर्मदा की धार्मिक, भौगोलिक. सांस्कृतिक, ग्रामीण, शहरी एवं सभ्यता के बारे  में वांछित  नहीं दे पा रहे थे. मैं अकिंचन  भी माँ के  बारे  क्या जानकारी दे सकता हूँ, परन्तु  कुछ नवीनता तथा जन साधारण  की समझ को  ध्यान  में  रख कर  मेरा स्वयं का लिखा नर्मदाष्टक.  "नित नमन माँ नर्मदे" माँ के  जन्म दिवस पर अर्पण कर रहा हूँ. 






                          आप भी सुन कर माँ का आशीष  प्राप्त करें- 



- विजय तिवारी "किसलय"

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

श्रेष्ठ विचारों के संवाहक श्री ओम कोहली को स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त स्मृति समारोह में "सव्यसाची प्रमिला बिल्लोरे पत्रकारिता सम्मान " से अलंकृत किया जाना निश्चित रूप से पत्रकारीय मूल्यों को सम्मान देना है-- विजय तिवारी " किसलय"

श्री ओम कोहली, सम्पादक डीजी केबल जबलपुर

इंसान पैदा होता है. उम्र के साथ वह अपनी एक जीवन शैली अपना कर निकल पड़ता है अपने जीवन पथ पर वय के पंख लगा कर. समय, परिवेश, परिस्थितियाँ, कर्म और योग-संयोग उसे अच्छे-बुरे अवसर प्रदान करता है. इंसान बुद्धि और ज्ञान प्राप्त कर लेता है परन्तु विवेक उसे उसके गंतव्य तक पहुँचाने में सदैव मददगार रहा है. विवेक आपको आपकी योग्यता का आईना भी दिखाता है और क्षमता भी. विवेक से लिया गया निर्णय अधिकांशतः सफलता दिलाता है. सफलता के मायने भी वक्त के साथ बदलते रहते हैं अथवा हम ही तय कर लेते हैं अपनी लाभ-हानि के मायने. कोई रिश्तों को महत्त्व देता है कोई पैसों को या फिर कोई सिद्धांतों को. समाज में यही सारे घटक समयानुसार प्रभाव डालते हैं. समाज का यही नजरिया अपने वर्तमान में किसी को अर्श और किसी को फर्श पर बैठाता है किन्तु एक विवेकशील और चिंतन शील व्यक्ति इन सारी चीजों की परवाह किये बिना जीवन की युद्ध-स्थली में अपना अस्तित्व और वर्चस्व बनाए रखता है. शायद एक निडर और कर्मठ इंसान की यही पहचान है. समाज में इंसान यदि कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी एवं मानवीय दायित्वों का स्मरण भी रखता है तो आज के युग में यह भी बड़ी बात है. आज जब वक्त की रफ़्तार कई गुना बढ़ गयी है, रिश्तों की अहमियत खो गयी है, यहाँ तक कि शील-संकोच-आदर गए वक्त की बातें बन गयी हैं, ऐसे में यदि कहीं कोई उजली किरण दिखाई दे तो मन को शान्ति और भरोसा होता है कि आज भी वे लोग हैं जिन्हें समाज की चिंता है. बस जरूरत है उस किरण को पुंज में बदलने की और पुंज को प्रकाश स्रोत में बदलने की.

आपको आज भी इस श्रेणी के लोग मिल जायेंगे जो लगातार अपने प्रयास और कर्तव्य से समाज का मार्गदर्शन करते चले आ रहे हैं. ऐसे ही लोगों में एक नाम है वरिष्ठ पत्रकार श्री ओम कोहली का जिन्होंने अपनी सोच, मर्यादा और अपनी जीवन शैली को सुरक्षित रखा है. युवा होते ही इन्हें शब्दशक्ति का महत्त्व ज्ञात हो गया था. वे कहते हैं जैसे किसी चित्रकार को मालुम हो जाता है कि वह चित्र बना सकता है, उसी तरह उन्हें भी लगा कि वे लिख सकते हैं और फिर अध्ययन काल में ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया.

०७ जनवरी १९४९ को श्री जी. एम. कोहली के घर जन्में श्री ओम कोहली ने विज्ञान स्नातक तक सम्पूर्ण शिक्षा जबलपुर में ही प्राप्त की. अध्ययन के दौरान ही श्री कोहली जी ने पत्रकारिता के अपने रुझान को कार्यरूप में परिणित किया और जबलपुर से ही पत्रकारिता शुरू की. तत्कालीन दैनिक अखबार "युगधर्म" को श्री कोहली अपना प्रथम अखबार एवं प्रशिक्षण केन्द्र मानते हैं. नवभारत जबलपुर में पत्रकारिता करते करते उनके जीवन में एक ऐसा भी दौर आया जब इन्होंने निजी व्यवसाय शुरू किया और अपनी प्रिंटिंग प्रेस के साथ साथ अपना साप्ताहिक समाचार-पत्र " जबलपुर पोस्ट " भी अनेक वर्ष तक निकाला, लेकिन नियति और तात्कालिक सोच के चलते एक बार फिर जयलोक, कार्तिक टाइम्स में अपनी सेवायें देते हुए सिटी मिरर में कई वर्ष सम्पादक पद पर कार्यरत रहे. श्री कोहली वर्तमान में इलेक्ट्रोनिक मीडिया के "डीजी केबल" में संपादकत्व कर रहे हैं.

साहित्य के प्रति गहरी रुची न होते हुए भी आपने अपने पत्रकारिता जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव और दर्द को अपनी चर्चित पुस्तक "अस्थियों की पोटली" में पाठकों के साथ बाँटने की कोशिश की है. पत्रकारीय संरचना के बदलने के बावजूद भी श्री कोहली की चाहत और भी हैं. उनके अनुसार आज भी सामान्य पत्रकार आर्थिक रूप से संपन्न नहीं होता. पत्रकारिता के क्षेत्र में भी दूसरी जगहों जैसी प्रतियोगिता है. आज खबरें बेचने का दौर चल पड़ा है. इसी दृष्टिकोण ने पहले और वर्तमान की पत्रकारिता में फर्क उत्पन्न किया है .यह फर्क इलेक्ट्रोनिक मीडिया में ज्यादा दिखाई देता है. खबरों के प्रकाशन में भी भेदभाव आम बात हो गयी है. आज हाई प्रोफाईल की खबरें प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों ही सरआँखों लेते हैं. यदि संपादकों के मापदंड की बात करें तो समाज के प्रति उत्तरदायी होने की अपेक्षा कमाई देने वाला सम्पादक आज ज्यादा सफल माना जाता है. आज जब तख्वाह और सुविधाएँ बढ़ी हैं तब परिश्रम और खोजी पत्रकारिता में गिरावट के कारणों पर चिंतन की आवश्यकता है. 'खबरों की खोज की' गुम होती ललक को फिर जीवंत करने की जरूरत है. समाज की पीड़ा और परेशानियों समझने का वक्त है. आज पत्रकार जगत को अपने उत्तरदायित्व को समझना होगा और अपने विचारों से समाज को सही दिशा प्रदान करने के भी प्रयत्न करने होंगे तभी पत्रकारिता की छवि में बदलाव आ पायेगा.

आज दिनांक २४ दिसंबर २०१० को ऐसे श्रेष्ठ विचारों के संवाहक श्री ओम कोहली को स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त स्मृति समारोह में "सव्यसाची प्रमिला बिल्लोरे पत्रकारिता सम्मान " से अलंकृत किया जाना निश्चित रूप से पत्रकारीय मूल्यों को सम्मान देना है. इस अवसर पर संस्कारधानी, पत्रकार जगत एवं हमारी अशेष शुभकामनाएँ.












- विजय तिवारी " किसलय "

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

सकारात्मक एवं आदर्श ब्लागिंग की दिशा में अग्रसर होना ब्लागर्स का दायित्त्व है : जबलपुर ब्लागिंग कार्यशाला पर विशेष.

       संजय की दिव्यदृष्टि के बारे में हम सभी जानते हैं कि उन्होंने धृतराष्ट्र को घर बैठे महाभारत का आँखों देखा हाल सुनाया था. द्वापर के बाद हम कहें कि वर्तमान उससे भी आगे बढ़ चुका है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. आदिकाल से जिज्ञासु प्रवृत्ति वाला मानव कल्पनाओं को साकार करने शाश्वत क्रियाशील रहा है. किस्सागोई, लेखन, प्रिंटिंग, रिकार्डिंग और दृश्यांकन से प्रारम्भ होकर आज हम ऑनलाइन, अपने अधिकांश कार्यों का सम्पादन करने में सक्षम हैं. चार-पाँच दशक पूर्व कल्पना से परे अविष्कार आज अनपढ़, मजदूर और ग्रामीणों को भी सहज सुलभ होते जा रहे हैं. विकास और त्वरण की क्रांति आँधी-तूफ़ान से तेज चल रही है. सन्देश एवं साहित्य का आदान-प्रदान ध्वनियों, चित्रों और लिपियों से प्रारम्भ होकर आज अंतरजाल की दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है. अंतरजाल तकनीकी अब तक ज्ञात सर्वाधिक विकसित सुविधा प्रणाली है. विश्व की विभिन्न भाषाओं के साथ ही इसका हिंदी में भी प्रचलन बढ़ा है. इस बहुआयामी अंतरजाल तकनीकी से हमारा साहित्य एवं पत्रकार जगत भला कैसे पीछे रहता. आवश्यकतानुसार शनैः शनैः अंतरजालीय उपकरणों एवं साफ्टवेयर्स के माध्यम से आज हम किसी से कम नहीं हैं. अंतरजाल की सहायता से शुरू हुई ब्लागिंग आज निश्चित रूप से संचार क्रांति की विशेष उपलब्धि है. साहित्य, संदेश, समाचार, वार्तालाप, जानकारियाँ, नवीन अविष्कार, त्वरित प्रसारण के साथ-साथ कांफ्रेंसिंग जैसी सुविधाएँ की-बोर्ड की चन्द बटनों के दबाते ही आपकी स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाती हैं. आज इन्हीं सारी सुविधाओं से परिपूर्ण हमारे हिन्दी ब्लॉगर्स त्वरित गति से विश्व में अपनी पहचान कायम कर चुके हैं. आज विश्व का अधिकांश जनसमुदाय भले ही अंतरजालीय सुविधा से वंचित हो परन्तु ब्लॉग्स, ई-मेल और नेट बैंकिंग जैसी सुविधाओं की जानकारी रखता है. आज विश्व में ब्लॉग्स और उनके पाठकों की बढ़ती संख्या इस विधा की सफलता के प्रमाण हैं. दो दशक पहले और आज के परिवेश में आमूल चूल बदलाव आ चुका है. आज देश, प्रदेश, शहर और कस्बाई स्तर पर भी ब्लागिंग के चर्चे होने लगे हैं. ब्लागर्स की बढ़ती संख्या और उसकी लोकप्रियता आज किसी से छिपी नहीं है. ब्लाग के जन्म और उसकी विकास यात्रा जो हम देख रहे हैं ये मात्र पड़ाव हैं, मंजिल नहीं. मंजिल तो हमारे द्वारा तैयार किए जा रहे आधार और तय की गई दूरी के बाद ही मिलेगी. आज हम जिस मंजिल की कल्पना कर रहे हैं वह तभी प्राप्त होगी जब हमारा आधार मजबूत होगा. यहाँ पर इसी आधार को मजबूत बनाने के लिये ब्लागिंग कार्य शाला का आयोजन किया गया है. ब्लागर्स जानते हैं कि इलाहाबाद, छत्तीसगढ़, वर्धा और दिल्ली में ' ब्लॉगर्स संगठन एवं इसके प्रचार-प्रसार हेतु आयोजित ब्लागर्स मीट '  भी इसी दिशा में उठाए आधारभूत कदम हैं. आज जब संस्कारधानी जबलपुर में ब्लागिंग पर चर्चा हो रही है तब ब्लागिंग के स्वरूप, प्रस्तुति, मर्यादा और आचार-संहिता पर भी चिन्तन और वार्तालाप जरूरी है.
                आज मैं चन्द छोटे-छोटे किन्तु महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर आप सभी का ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूँ , जिन पर अमल कर हम सकारात्मक एवं आदर्श ब्लागिंग की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं:-

धुआँधार जलप्रपात जबलपुर

1. आज अनेक ब्लागर बन्धुओं ने ब्लागिंग को ‘चौराहे की चर्चा’ तक सीमित कर रखा है जबकि ये व्यक्तित्व, कृतित्व एवं सामाजिक सरोकारों की अभिव्यक्ति का विशाल मंच तथा हमारे सर्वांगीण विकास का माध्यम बन सकता है.
2. छोटी-छोटी अनुपयुक्त एवं खालिस व्यक्तिगत बातें, स्वार्थपरक वक्तव्य, वैमनस्यतापूर्ण आलेख तथा टिप्पणियों से बचने के साथ ही इन्हें बहिष्कृत भी करना होगा.
3. वाह-वाह, बहुत खूब एवं अतिसुन्दर जैसी ‘गिव्ह एण्ड टेक’ वाली टिप्पणियों से परहेज करना होगा तथा दूसरों की पोस्ट पर यथासम्भव पढ़कर ही अपना अभिमत देने की मानसिकता पर बल देना होगा.

4. ब्लाग्स की वरिष्ठता के मानदण्ड छद्म पाठक नहीं पोस्ट की साहित्यिक गुणवत्ता और उपयोगिता को बनाना होगा. इससे एक ओर टिप्पणियों के बेतुके आदान-प्रदान के सिलसिले पर अंकुश लगेगा वहीं दूसरी ओर सकारात्मक लेखन को और प्रोत्साहन मिलेगा.
5. हमें अपनी ब्लागर मित्रमंडली के घेरे से बाहर निकलना होगा.
6. नव आगन्तुकों को स्नेह-आशीष के साथ ही उनके हितार्थ ‘परामर्श की कड़ी’ बनाना होगी ताकि भावी ब्लागिंग में आशानुरूप परिष्करण प्रक्रिया को दिशा मिल सके.
7. ब्लागिंग में उपयोगी जानकारी एवं सुविधाओं के प्रचार-प्रसार के लिए भी लगातार ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी पोस्ट प्रकाशित होते रहना चाहिए.
8. बदलते परिवेश में ब्लागिंग की महत्ता देखते हुए व्यक्तिगत एवं सहकारी तौर पर ज्ञानपरक पुस्तकें प्रकाशित होना चाहिए.
9. ब्लागिंग की उपयोगिता को शासकीय एवं अशासकीय शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया जाना चाहिए ताकि ब्लाग्स में निहित विभिन्न विषयों  की नई-पुरानी जानकारी विद्यार्थी-शोधार्थी आसानी से प्राप्त कर सकें. साथ ही इसकी उपयोगिता एवं प्रचार-प्रसार के लिए शासन के साथ विधिवत पत्राचार किया जाना चाहिए.
10. अन्तिम बिन्दु पर विशेष ध्यान दिलाना चाहूँगा   कि अब ब्लागिंग हेतु सर्वमान्य आचार संहिता का होना बहुत आवश्यक हो गया है. इसके क्रियान्वयन के पश्चात ब्लागिंग आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले ब्लॉगर्स पर अंकुश और प्रतिबन्ध लगाना भी सम्भव हो सकेगा.
             इस तरह मुझे उम्मीद है कि हमारे विद्वान साथी मेरी उपरोक्त बातों पर अवश्य ध्यान देंगे. आज इस ब्लागिंग कार्य शाला के परिणाम ब्लॉगर्स को नई दिशा देने में अहम भूमिका का निर्वहन करेंगे, ऐसी मेरी कामना है.
                                     जय हिन्दी - जय ब्लागर्स
दिनांक. 01 दिसम्बर २०१०    
             











- विजय तिवारी "किसलय"
(हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर)

रविवार, 7 नवंबर 2010

होली नेम स्कूल की ममतामयी मिशेल ओबामा


ओबामा दम्पति दीप प्रज्ज्वलित करते हुये
(याहू से साभार)
   आज दिनांक ७ नवम्बर २०१० को  जब   ओबामा दम्पति मुंबई के नेम हाई स्कूल मुम्बई  में बच्चों के संग दीपावली मनाने पहुँचे तो  ऐसा  लगा  जैसे  वे  किसी  अपने  पारिवारिक  कार्यक्रम   उन्होंने छात्रों  की दो  नृत्य प्रस्तुतियाँ देखीं. नृत्य के बीच बीच में दोनों तालियों से ताल मिलाते नज़र आये और प्रसन्न मुद्रा में भी दिखाई दिए. मिशेल के चेहरे पर प्रशासन का अहम दूर-दूर तक नज़र नहीं आया. 
ओबामा दम्पति नृत्य करते हुए
(याहू से साभार)
  नृत्यगान का आनंद ले रहीं मिशेल  एक समय स्वयं बच्चों के बीच  लय, तान और भारतीय  नृत्यमुद्राओं   के साथ नृत्य करने लगीं, तब ऐसा लगा कि वे इसी संस्कृति का एक हिस्सा हैं. बच्चों के बीच ममतामयी माँ के अनुरूप उनका व्यवहार और घुलने-मिलने का अंदाज़ उनके आदर्श व्यक्तित्व  को परिलक्षित कर रहा था. मैं राजनीति एवं वैश्विक दृष्टिकोण से हट कर कहना चाहता हूँ कि ऐसी  मातृशक्ति और ममता पर मानव जाति को गर्व होना चाहिये. मिशेल ओबामा से हमारी अपेक्षा है  कि वे सदैव "वसुधैव कुटुम्बकं" की भावना  से विश्व को  आदर्श दिशा में प्रेरित करने के  मानवीय  दायित्वों का इसी तरह  निर्वहन करती रहेंगी.

प्रस्तुति: 










- विजय तिवारी " किसलय "

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

वे समय के साथ बँधना नहीं चाहते इसीलिए घड़ी नहीं पहनते : चित्रकार कामता सागर के अमृत महोत्सव पर विशेष.



सागर जैसी व्यापकता और कला की सूक्ष्म दृष्टि जब सृजन हेतु क्रियाशील होती है तब अन्तस का विचार मंच कैनवास पर एक सजीव संसार को जन्म देता है। लगन परिश्रम और निर्विकार भाव से गढ़ा गया कल्पना और यथार्थ का मिश्रण अतुल्य एवं अविस्मरणीय सुखद अनुभूति देता है। प्रत्येक इंसान कला का प्रसंशक होता है, परंतु कलाकार मुश्किल से पैदा होते हैं। उनके अंदर की विलक्षण कल्पना-शक्ति, दृश्य-अदृश्य, जीव-निर्जीव, धरती-आकाश अथवा वर्षा-गरमी-ठण्ड को कैनवास पर प्रतिबिंबित ही नहीं करती, उसे प्रांजल स्वरूप भी प्रदान करती है। कलाकार ईश्वरीय उपहार हैं तो कला के प्रति समर्पण उनकी महानता है। कला और शिक्षा कभी पूर्ण नहीं होती। कलाकार का स्थिर होना अधूरेपन का द्योतक है। निरंतरता और नियमित अभ्यास उत्कर्ष के नये शिखर खड़े करते हैं। जीवन में संतुष्टि के लिये निरंतरता उतनी ही आवश्यक है, जितना स्वास्थ्य के लिए व्यायाम आवश्यक होता है। एक तरह से जीवन में ठहराव हारने जैसा होता है और निरंतरता को विजय का प्रतीक मानना चाहिए।


(श्री कामता सागर जी)
आज साठोत्तरी समाज में ऐसे लोगों का प्रतिशत अत्यल्प है जो आज भी अपनी सक्रयिता और अपनी जीवनशैली से सबको आकृष्ट करते हैं। इनकी संख्या भले ही कम है लेकिन ये वर्तमान पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक होने के साथ-साथ हमारे लिए एक मिसाल की तरह हैं। इन्होंने जीवनभर अपनी कला को निखारा है, बाँटा है। उदारमना बनकर अपनी विधा अगली पीढ़ी को सौंपी है। वर्तमान पीढ़ी का दायित्व है कि वह ऐसे बुजुर्गों का सम्मान करे, उनके अधूरे कार्यों को पूरा करे। मेरा तो मानना है कि हम उनकी तृप्ति हेतु उनके कार्यों में सहभागी बनें। कहीं ऐसा न हो कि उनकी उपलब्धियाँ एवं हुनर उन्हीं के साथ चली जाएँ। हर इन्सान अमर होना चाहता है और हम सब जानते हैं कि वही इन्सान अमरत्व पाता है, जो समाज को अमूल्य या अनोखा उपहार देकर जाता है। क्या हम ऐसे लोगों से लाभान्वित होना चाहते हैं? शायद हाँ और नहीं भी। जब तक समाज है और समाज में इन्सान हैं तब तक ये ऊहापोह की स्थिति बनी रहेगी, लेकिन आप, हम और हमारे जैसे लोग ही इस दिशा में आगे बढ़ेंगे तो ये साठोत्तरी समाज के लिए आदरभाव एवं कृतज्ञता कहलाएगी।
हम संस्कारधानी में रहते हैं, इसका हमें गर्व हैं लेकिन संस्कारी पथ पर चलना उससे भी बड़ी बात है। इस बड़ी बात के लिए आज भी ऐसे लोग हैं, जो कभी पीछे नहीं हटे। आज भी ऐसी संस्थाएँ एवं संगठन हैं, जो निरंतर इस हेतु समर्पित हैं। जब बात आती है समग्र जीवन ‘‘कला साधना‘‘ में आहूत करने वाले व्यक्तित्व की। जब बात आती है चित्रकला में राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने वाले की अथवा जब बात आती है पूर्ण कर्तव्य निष्ठा से अपनी कला को दान में देकर शिष्यों को कलापथ पर अग्रसर करने वाले की, तब संस्कारधानी का ये विशेष वर्ग भला पीछे क्यों रहता?
बात है 10-10-10-10-10 की । अर्थात 10 अक्टूबर सन् 10 के 10 बजकर 10 मिनट की. आशय है संस्कारधानी में पुष्पित-पल्लवित कलासाधक, हम सबके मा‘साब कामता सागर के अमृत महोत्सव की । आदरणीय मा‘साब को हमारी शुभ-कामनाएँ। हम उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से पूर्व परिचित हैं परन्तु इस खुशियों भरे अविस्मरणीय अवसर पर उनका संक्षिप्त जीवन परिचय देना आवश्यक समझते हैं:-

वरिष्ठ कलासाधक, साहित्य अनुरागी आदरणीय श्री कामता सागर जी का जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले में 10 अक्टूबर 1933 को हुआ। पिता श्री गंगासागर जी सहित पूरा परिवार गीता-मानस प्रेमी था। उनके घर का परिवेश साहित्य, संगीत एवं कला की त्रिवेणी था। इस तरह श्री कामता सागर जी को संस्कार, साहित्य, संगीत एवं कला की शिक्षा घर पर स्वमेव प्राप्त हुई । बुन्देली भाषा के चहेते श्री कामता सागर जी हिन्दी, अँग्रेजी एवं चित्रकला में निष्णात हैं। खेलकूद, छायांकन एवं संगीत में दखल रखने वाले मा‘साब सन् 1976 से मध्य प्रदेश आर्टिस्ट फोरम के अध्यक्ष पद पर रहते हुए आज भी सक्रिय हैं। सन् 1953 से सन् 1993 तक माडल हाई स्कूल जबलपुर में आप एक कला शिक्षक के रूप में पदस्थ रहे। आपने सन् 1960 के पूर्व सर जे. जे. स्कूल आफ आर्ट , मुंबई में चित्रकला की शिक्षा ग्रहण की एवं छ: वर्ष तक मुंबई के प्रसिद्ध पृथ्वी थियेटर में अभिनय तथा कला की बारीकियाँ सीखते हुए ख्याति अर्जित की। यहाँ मंचित नाटकों में आपके अभिनय को स्व. पृथ्वी राजकपूर की भी सराहना प्राप्त हुई । आज भी संस्कारधानी की विविध साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं कला संस्थाएँ इनके अनुभव एवं ज्ञान से लाभान्वित होती रहती हैं। नयी एवं पुरानी पीढ़ी के मध्य एक सेतु के रूप में आपकी भूमिका सदैव स्मरणीय रहेगी। सफेद-कुर्ता-पायजामा एवं कंधे पर लटका थैला उनकी पहचान बन गए हैं। इनकी डायरी में संदेश, सूक्तियाँ, अनुभव एवं जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख मिलता है। जबलपुर विश्वविद्यालय सहित प्रान्तीय शिक्षण महाविद्यालय, उच्चतर माध्यमिक विद्यालय एवं अनेक संस्थाओं के मोनोग्राम बनाने का श्रेय कामता मा‘साब को ही जाता है। भारत शासन द्वारा जारी गांधी जी के चित्र का एक रुपये वाला डाक टिकट आपका ही डिज़ाइन किया हुआ है। तीन मूर्ति भवन नई दिल्ली में जाकर बनाया गया स्वर्गीय इंदिरा गांधी का चित्र आज भी वहाँ देखा जा सकता है। आपके द्वारा स्क्रेच किया गया चित्र ‘‘नन्दिनी‘‘ धर्मयुग सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में चर्चित हुआ। ‘‘अनंता के दो बिन्दु‘‘ भी चर्चित चित्र प्रान्तीय शिक्षण महाविद्यालय जबलपुर में देखा जा सकता है। आदरणीय कामता सागर द्वारा लिखे गये शताधिक चिंतन आलेख आकाशवाणी से प्रसारित हो चुके हैं, इसे भी एक उपलब्धि माना जा सकता है। आपकी एक और विशेषता है कि 77 वर्ष की आयु में भी ये रूढ़िवादी नहीं है। विकास और परिवर्तन के साथ वे भी बदलाव में विश्वास रखते हैं। वे समय के साथ बँधना नहीं चाहते इसीलिए घड़ी नहीं पहनते। नई तकनीकी, नई वैज्ञानिक खोजों एवं इलेक्ट्रानिक युग की जानकारी इनको समय के साथ चलने में सहायक सिद्ध होती है। स्नेही-स्वजनों पर दृष्टि पड़ते ही चेहरे पर आत्मीय मुस्कुराहट बिखेरने वाले एवं अपनी स्नेहिल वाणी से अपनत्व परोसने वाले आदरणीय श्री कामता सागर को उनके अमृत महोत्सव पर हमारी अशेष शुभ-कामनाएँ एवं जीवेत् शरद: शतम् के भाव।

श्री कामता सागर जी की निम्न रचना पाठकों हेतु प्रस्तुत है :-

बाँसुरी नहीं बजती, आदमी बजता है
कितनी सुरीली थी
फेरी वाले ने खुद
बजा कर सुनाई थी।
तब खरीद लाये थे
घंटों से उलझे हो
पसीने-पसीने हो
अँगुलियाँ हथौड़े सी
चलती हैं।
किंतु निकल नहीं पाते
वैसे मीठे स्वर।
तो रख दो, छोड़ दो,
ओर पोंछ डालो
पसीने को
बाँसुरी नहीं बजती
आदमी बजता है।
=000=
-आलेख-
- विजय तिवारी ‘किसलय’

रविवार, 22 अगस्त 2010

विवेचना ने स्व. हरिशंकर परसाई का जन्म दिवस मनाया

विवेचना द्वारा आयोजित  स्व. हरिशंकर परसाई के  जन्म दिवस पर  प्रो. हनुमान वर्मा, प्रो. ज्ञानरंजन, डॉ. हरि भटनागर, प्रो. अरुण कुमार, अमृत लाल वेगड़, कामता सागर, रजनीकांत यादव,  आशुतोष श्रीवास्तव , रामेश्वर नीखरा, प्रहलाद पटेल, राजेन्द्र चंद्रकांत राय, मदन तिवारी, राजेन्द्र दानी, बसंत मिश्र, रमेश सैनी   सहित नगर के गण्यमान साहित्यकारों ने परसाई  और  उनके  व्यक्तित्व एवं कृतित्व को याद किया. इस अवसर पर ज्ञान जी ने  साहित्य की निरंतरता की गति  के सन्दर्भ में कहा कि  परसाई के बाद स्थिति सोचनीय है. साहित्य की लगभग सभी विधाओं का यही हाल है.  प्रो. अरुणकुमार ने साहित्यकार से  जनप्रिय साहित्यकार और फिर जनता का साहित्यकार के रूप में परसाई जी को प्रस्तुत किया. पूर्व सांसद श्री रामेश्वर नीखरा ने अपने विद्यार्थी कालीन संस्मरण सुनाते हुये बताया कि वे उनका कालम " सुनो भाई साधू " अक्सर पढ़ा करते थे. विवेचना के हिमांशु राय ने परसाई की कृतियों पर आधारित  अनेक संस्मरणों का उल्लेख किया प्रो. हनुमान वर्मा ने अपने मित्र परसाई की विभिन्न व्यक्तिगत बातों का उल्लेख करते हुये उन्हें जनता की आवाज को उठाने वाला और जनता के दुःख-दर्द को लेखन और अखवार के माध्यम से उजागर करने वाला सचेतक बताया.
               इस अवसर पर श्री  संजय गर्ग द्वारा अभिनीत   "शवयात्रा  का तौलिया" का एकल नाट्य मंचन भी किया गया. विवेचना के वसंत काशीकर, पंकज स्वामी, अरुण यादव आदि की सक्रियता सराहनीय रही.अंत  में विवेचना के श्री बांके बिहारी ब्यौहार के आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ.
प्रस्तुति-
- विजय तिवारी " किसलय "
  श्री महेंद्र मिश्र जी की पोस्ट "प्रसिद्द व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई जी का जन्मदिवस"



http://mahendra-mishra1.blogspot.com/2010/08/blog-post_22.html

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

रेशम का धागा

कि रणें सुन्दर लगें भोर की,
शो  भा देती रात चाँदनी.
हे हृदय में भैया ऐसे,
द्वि ज-रसना ज्यों वेद-रागिनी..

वे णु के स्वर मिश्री घोलें,
दी पक जैसे तम को हरता.
रे शम का धागा वैसे ही,
खा लीपन भैया का भरता..

पा ते हम स्नेह भाई से,
न् यौछावर   उन पर तन-मन-धन.
डे रा हो खुशियों का आँगन,
ही भावना है अंतर्मन ... 









- विजय तिवारी " किसलय "

बुधवार, 18 अगस्त 2010

राखी

इस कविता में एक बहन अपने भाई से स्नेह बनाये रखने, भाई के घर की खुशियों और भाई के दीर्घायु रहने  की आकांक्षा रखते हुये  राखी के  महत्त्व का चित्रण करती है  कविता के रूप में पत्र  की भावनाओं   का रसास्वादन लें----

देखा बचपन से मैंने  जो,
वही नेह जीवन भर रखना.

कीमत क्या ? "कच्चे-धागे" की,
नंदित हो उसका फल चखना..

दम्भ कभी न उपजे मन में,
नम्र भाव हो सबके दामन.

चहके ख़ुशी सभी चेहरों पर,
तुलसी जैसे घर हों पावन..

रखूँ सुवासित अपने हिय में,
वेणी हो फूलों की जैसे.

दीप्त रहे रिश्तों का दीपक,
सुख-दुःख बीच न आयें पैसे..

धागा बाँध करें हम बहनें,
दीर्घायु के दुआ हमेशा.

क्षिति से नभ तक गर्वित होता,
तब " राखी " का रेशा-रेशा..
      -----०००००----















- विजय तिवारी " किसलय "

बुधवार, 21 जुलाई 2010

रक्षा-सूत्र

रक्षाबंधन का पावन पर्व निकट है.
बहनों के लिए निश्चित रूप से ये  सबसे महत्वपूर्ण पर्व  माना गया है .
भाईयों के लिए भी ये दिन बड़े गर्व का होता है.
बस कुछ चंद पंक्तियाँ बहनों की ओर से मेरे दिमाग में आई
और
 लेखनी के माध्यम से
 कागज़ पर उकेर दी.
सभी बहनों को मेरा स्नेह - स्नेह- स्नेह --
रक्षासूत्र
हर्षित मन रहता नित मेरा,
रिश्ता भाई- बहिन का पाकर .

नयन कभी संतृप्त न होते,
न्यारे भैया के घर जाकर ..

दर्पण जैसे झूठ न बोले,
नदिया ज्यों निर्मल जल देती.

चन्दन की शीतलता से मैं,
तुलना भाई की कर लेती ..

रहे याद में भाई ऐसे,
वेदों की मनबसी ऋचायें .

दीपक सी उज्ज्वल स्मृतियाँ,
सुमन सदृश मन को महकायेँ ..

धागा कच्चा, बंधन पक्के,
दीर्घायु तक नहीं भुलाना .

क्षिति पर जब तक मेरा जीवन,
तब तक रक्षासूत्र बँधाना ..
     ----०००----
- विजय तिवारी " किसलय "

रविवार, 9 मई 2010

क़र्ज़ माँ का है बड़ा - मातृ-दिवस पर

क़र्ज़ माँ का है बड़ा,
                 जानते ये हम सभी .  

हैं बहुत उपकार इसके,
          हम न गिन सकते कभी ..

कष्ट में देखे हमें तो, 
                  रोएँ इसके भी नयन .

सारे दिन की छोड़िए,
                   रात न करती शयन ..
       ----000---

आज भी सारे जहां का ,
                            एक ही मंतव्य है .

मातृ सेवा हर युगों का,
                            श्रेष्ठतम कर्तव्य है ..

ईशभक्ति में न शक्ति,
                         माँ की सेवा में जो है.

स्वर्ग न आनंद देता,
                             मातृ सेवा में वो है ..
           ---000---

 
अपनी माँ को भूलता जो,
                              वह बड़ा ख़ुदग़र्ज़ है.

मातृ सेवा इस जहां में,
                           हर मनुज का फ़र्ज़ है..
             ---000---

- विजय तिवारी "किसलय"

जबलपुर, इंडिया