मंगलवार, 30 जुलाई 2019

डायनामिक संवाद टी वी पर व्यंग्यम् की व्यंग्य गोष्ठी सम्पन्न।

       डायनामिक संवाद टी वी पर व्यंग्यम् की व्यंग्य गोष्ठी सम्पन्न

डायनामिक संवाद टी वी, जबलपुर प्रारम्भ से साहित्यिक गतिविधियों को प्रमुखता से जनता के समक्ष प्रस्तुत करता आ रहा है। संस्कारधानी के कवि हों, कथाकार हों, शायर हों, नाटककार हों अथवा व्यंग्यकार। सभी साहित्यकारों को उनकी प्रतिभा दुनिया के सामने लाने का दायित्व यह डायनामिक संवाद टी वी बखूबी निर्वहन कर रहा है।
आज संस्था "व्यंग्यम" से सम्बद्ध व्यंग्यकारों की व्यंग्य रचनाओं को डायनमिक संवाद टी वी ने चलचित्रांकन किया।
प्रख्यात सहित्यविद डॉ. राजकुमार सुमित्र जी की अध्यक्षता एवं डॉ. हर्ष कुमार तिवारी के संयोजकत्व
 में व्यंग्यम् की गोष्ठी सम्पन्न हुई।
 सर्वप्रथम यशोवर्धन पाठक ने व्यंग्य 'निरीक्षण सरकारी अस्पताल का' प्रस्तुत किया। इसके पश्चात विवेक रंजन श्रीवास्तव ने 'मातादीन के इंस्पेक्टर बनने की कहानी', राकेश सोहम ने वर्चुअल मानसून, एन. एल. पटेल ने आतंकवाद, प्रतुल श्रीवास्तव ने मुझे गिरफ्तार करवा दो, अभिमन्यु जैन ने ब्यूटीपार्लर, कुमार सोनी ने गुड़ और गुलगुला, गुप्तेश्वर द्वारका गुप्त ने दूबरे और दो अषाढ़, ओ. पी. सैनी ने 'और स्तीफा दे दिया', रमेश सैनी ने हॉर्स ट्रेडिंग प्रायवेट लिमिटेड व्यंग्य प्रस्तुत किया।

अंत में व्यंग्य गोष्ठी के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रख्यात साहित्यकार डॉ. राजकुमार सुमित्र ने "अथ मुगालता कथा" व्यंग्य प्रस्तुत किया।
गोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकार शरदचद्र उपाध्याय, विजय तिवारी "किसलय", मेहेर प्रकाश उपाध्याय, कृष्ण कुमार चौरसिया पथिक, गोपाल कृष्ण चौरसिया मधुर विशेष रूप से उपस्थित रहे। 




रविवार, 6 जनवरी 2019

डॉ.विजय तिवारी की 'किसलय के काव्य सुमन " का समीक्षात्मक गीत

डॉ विजय तिवारी "किसलय" जबलपुर द्बारा रचित "किसलय के काव्य सुमन" की ८४ कविताओं के ३३ शीर्षकों को लेकर मैंने उक्त कृति की काव्यात्मक विवेचना की है, जिसमें निम्न शीर्षकों को शामिल किया गया हैः-

१ मानवता, २ मान, ३ संकल्प, ४ शुभचिन्तक, ५जीवन के पथ पर, ६ सृष्टि संचालक, ७ परहित धर्म, ८ सबके मन होंगे आनंद, ९ सफलता की सीढ़ी, १० जीवन के पल, ११ सीख, १२ क्रांतिवीर, १३ श्रम-पूजा, १४ कर्म साधक, १५ बंधु-भाव, १६ प्रगति-शिखर, १७ लक्ष्य, १८ गुण-दोष टटोल, १९ मातृभूमि, २० विश्व का ताज़, २१ स्वर्णिम वसुन्धरा, २२ पुष्प, २३ मन से मन का मिलन, २४ सुनहरे सपने, २५ बिन सजना के कुछ न भाये, २६ लहरों पर लहरें, २७ फलदायक, २८ भावना, २९ जिन्दगी, ३० उत्कर्ष, ३१ स्मृति, ३२ नन्ही परियाँ, ३३ नदी नाव और नाविक।
(डॉ विजय तिवारी "किसलय")


किसलय के काव्य सुमन - सृजन गीत


किसलय के काव्य सुमनआत्मानंद

शब्द सहज उपजा दें अमृतानद 

मानवता, मान, संकल्प, शुभचिन्तक

जीवन के पथ पर सृष्टि संचालक
परहित धर्म, सबके मन होंगे आनंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद


सफलता की सीढ़ी,जीवन के पल सीख

क्रांतिवीर, श्रम-पूजा से लोपित भीख
कर्म साधक, बंधु-भाव चेतनानंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद


प्रगति-शिखर लक्ष्य हित गुण-दोष टटोल

मातृभूमि, विश्व का ताज़ अनमोल
स्वर्णिम वसुन्धरा, पुष्प उपवनानंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद


मन से मन का मिलन, सुनहरे सपने

बिन सजना के कुछ न भायें गहने
लहरों पर लहरें पावन प्रेमानंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद


फलदायक भावना, जिन्दगी उत्कर्ष

स्मृति, नन्ही परियाँ, हर्ष ही हर्ष
नदी नाव और नाविक स्वजनानंद
किसलय के काव्य सुमन आत्मानंद
- अंशलाल पन्द्रे, जबलपुर

सोमवार, 19 नवंबर 2018

कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है

कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है

नीरज जी का लिखा  
मेरा प्रिय गीत जिसे 
बचपन से लेकर 
अभी तक कभी भूला नहीं :-

कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है।

मैं न बँधा हूँ देश काल की,
जंग लगी जंजीर में
मैं न खड़ा हूँ जाति−पाँति की,
ऊँची−नीची भीड़ में
मेरा धर्म न कुछ स्याही,
−शब्दों का सिर्फ गुलाम है
मैं बस कहता हूँ कि प्यार है,
तो घट−घट में राम है
मुझ से तुम न कहो कि मंदिर,
−मस्जिद पर मैं सर टेक दूँ
मेरा तो आराध्य आदमी,
− देवालय हर द्वार है
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

कहीं रहे कैसे भी मुझको,
प्यारा यह इन्सान है,
मुझको अपनी मानवता पर,
बहुत-बहुत अभिमान है,
अरे नहीं देवत्व मुझे तो,
भाता है मनुजत्व ही,
और छोड़कर प्यार नहीं,
स्वीकार सकल अमरत्व भी,
मुझे सुनाओ तुम न स्वर्ग
-सुख, की सुकुमार कहानियाँ,
मेरी धरती सौ-सौ स्वर्गों,
से ज्यादा सुकुमार है।
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

मुझे मिली है प्यास विषमता,
का विष पीने के लिए,
मैं जन्मा हूँ नहीं स्वयँ-हित,
जग-हित जीने के लिए,
मुझे दी गई आग कि इस
तम में, मैं आग लगा सकूँ,
गीत मिले इसलिए कि घायल,
जग की पीड़ा गा सकूँ,
मेरे दर्दीले गीतों को,
मत पहनाओ हथकड़ी,
मेरा दर्द नहीं मेरा है,
सबका हाहाकार है ।
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

मैं सिखलाता हूँ कि जिओ औ',
जीने दो संसार को,
जितना ज्यादा बाँट सको तुम,
बाँटो अपने प्यार को,
हँसो इस तरह, हँसे तुम्हारे,
साथ दलित यह धूल भी,
चलो इस तरह कुचल न जाये,
पग से कोई शूल भी,
सुख न तुम्हारा सुख केवल,
जग का भी उसमें भाग है,
फूल डाल का पीछे, पहले,
उपवन का श्रृंगार है।
कोई नहीं पराया मेरा, घर सारा संसार है ।।

-विजय तिवारी "किसलय"

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

https://m.me/vijaykislay

https://m.me/vijaykislay भालचन्द्र स्तोत्र

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https://m.me/vijaykislay भालचन्द्र स्तोत्र

भालचन्द्र स्तोत्र

भालचन्द्र स्तोत्र


लंबोदर, गजमुख, सुमुख,
धूमकेतु, विघ्नेश।
विकट, विनायक, गजकरण,
दंती, कपिल, गणेश।।

- विजय तिवारी "किसलय"
21 सितंबर 2018

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

    जबलपुर के प्रख्यात आर्टिस्ट  श्री कामता सागर जी का  दिनांक 14 अक्टूबर 17 को हृदय गति रुकने से देहावसान हो गया। ग्वारीघाट जबलपुर में अंतिम संस्कार किया गया। 
           यह भारतीय कला जगत एवं मेरी स्वयं की  अपूरणीय क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा उन्हें अपने चरणों में स्थान दे। ओम शांतिः शांतिः शांतिः।
- विजय तिवारी "किसलय"

सोमवार, 19 सितंबर 2016

निर्भय दिवस पर वर्तिका को ओंकार अलंकरण



                    निर्भय दिवस पर वर्तिका को ओंकार अलंकरण


 जबलपुर। मानवता के महानायक पूर्व मंत्री अपराजेय विधायक स्वर्गीय पंडित ओंकार प्रसाद तिवारी स्मृति दिवस "निर्भय दिवस" के रूप में गोपाल बाग स्थित गोपाल सदन में भव्यता से आयोजित किया गया, जिसमें चिकित्सा, कला, साहित्य, सेवा, विज्ञान, तकनीकी, शिक्षा, योग आदि विविध क्षेत्रों के विद्वानों को ओंकार अलंकरण एवं प्रतिभाओं को ओंकार सम्मान से नवाजा गया। रवि गुप्ता, राजेश पाठक प्रवीण के संयोजन में वर्तिका को  "कला-साहित्य के लिए "ओंकार अलंकरण" से सम्मानित किया गया।

ऐसे महत्त्वपूर्ण एवं गरिमामयी अवसर पर शहर की सबसे सक्रिय संस्था वर्तिका को कला- साहित्य के लिए "स्व. पं ओंकार प्रसाद तिवारी स्मृति ओंकार अलंकरण" से सम्मानित किया जाना वर्तिका के लिए गौरव की बात है।

भव्य एवं भावभरे  समारोह में मुख्य अतिथि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री श्री फग्गन सिंह कुलस्ते, समारोह के अध्यक्ष श्री शरद जैन, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री, सम्माननीय अतिथि डॉ. श्रीमती स्वाति गोडबोले, महापौर के कर कमलों से विजय तिवारी 'किसलय', राजेश पाठक प्रवीण, दीपक तिवारी, इंद्रबहादुर इंद्र' संतोष नेमा संतोष, प्रभा विश्वकर्मा शील, सहित  संयोजक विजय नेमा अनुज, संरक्षक एम एल बहोरिया, मनोज शुक्ल मनोज, अनूदित साज, सलिल तिवारी, अशोक झारिया शफ़क़, अंजू लता गुप्ता आदि ने सम्मान ग्रहण किया। इस सम्मान से वर्तिका की कला एवं साहित्य के प्रति  जिम्मेवारी और अधिक बढ़ गई है।  संचालन रवि गुप्ता, राजेश पाठक "प्रवीण" एवं आभार अनिल तिवारी ने व्यक्त किया।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

शब्द गुण या काव्य गुण

शब्द गुण या काव्य गुण

गुण रस का धर्म होता है। गुण ही रस के साथ अचल स्थिति होती है। जिस प्रकार धीरता, वीरता, सौम्यता आदि मानव व्यक्तित्व के सहज ही आकर्षित करने वाले गुण होते हैं, उसी प्रकार शब्द गुण या काव्य गुण काव्य की आत्मा रस का उत्कर्ष करते हैं। इसे ही शब्द या काव्य गुण कहते हैं।

काव्य गुण के तीन भेद होते हैं:-

1)-माधुर्य गुण
2)-ओज गुण
3)-प्रसाद गुण

माधुर्य गुण-

जिस रचना को पढ़ते-पढ़ते अन्तःकरण द्रवित हो उठे, वह रचना माधुर्य गुण वाली होती है। यह गुण संयोग श्रृंगार से करुण में, करुण से वियोग में और वियोग से शांत में अधिक अनुभूत होता है। ट, ठ, ड, ढ (कठोर वर्णों) को छोड़ कर मधुर एवं कोमल रचना माधुर्य गुण के मूल हैं। जैसे 'क' से 'म' तक के वर्ण त्र, ड़, ण, न, म, से युक्त  वर्ण, ह्रस्व र और ण आदि।
उदाहरण:-
"कंकन किंकन नूपुर धुनि सुनि।
कहत लखन सन राम हृदय गुनि।।"
टीप:-
यहाँ घुँघुरू की आवाज सुनकर श्रीराम के मन में अनुराग पैदा होता है। इसलिए यहाँ माधुर्य गुण है। इसमें श्रृंगार रस, करुण रस, शांत रस आता है।

ओज गुण-

ओज वह गुण है जो हृदय में स्फूर्ति का संचार कर मन को तेजस्विता से भर दे। यह गुण वीर से वीभत्स में और वीभत्स से रौद्र में अधिक रहता है। इसमें संयुक्त वर्ण र के संयोग ट, ठ, ड, ढ, ण का  प्राचुर्य, समासाधिक्य और कठोर वर्णों की प्रधानता हो वहाँ ओज गुण होता है।
उदाहरण:-
"हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती" ।।

 प्रसाद गुण-

जो रचना पढ़ते ही सरलता से समझ में आ जाए, वह रचना प्रसाद गुण से समन्वित होती है। यह गुण सभी रसों और रचनाओं में व्याप्त रह सकता है।
उदाहरण:-
"वह आता,
दो टूक कलेजे के करता, पछताता पथ पर आता।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को,
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाया,दो टूक...."

-विजय तिवारी "किसलय"
दिनांक 8जुलाई  2016

(हिंदी व्याकरण के सहयोग से)