गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

नाटक के बहाने-१ : मौसा जी जै हिंद : विवेचना नाट्य समारोह-2010

विवेचना का  दिनांक २७ अक्टूबर  को पहला नाटक " मौसाजी जै हिंद " मंचित हुआ.  बिना किसी भूमिका के नाटक का समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुत है:-
(छवि पत्रिका जबलपुर से साभार )
 एक अजीब सा मिश्रित अंतर्द्वन्द लिए, मन में हजार दुख छुपाये मौसा जी उर्फ माया प्रसाद हितैषी अपनी एक अलग ही दुनिया बना लेता है जिसे ही वह जीता रहता है.  नाटक के अंत तक वह अपना छद्म मुखौटा नहीं हटाना चाहता.  अपनी "हकीकत की दुनिया " पर सोचने की जिम्मेवारी वह पूर्णरूपेण अन्य पात्रों पर छोड़ देता है कि वे ही उसके मन की पीड़ा का एहसास करें.  तीन-तीन जवान बेटों को सही दिशा देने में असमर्थ, एकाकी-सा जीवन जीने वाला विधुर मौसा जी अपनी हकीकत के सामने किसी को फटकने भी नहीं देता.  गाँव के बच्चे उन्हें मनोरंजन की सामग्री से अधिक नहीं समझते और शायद मौसा जी भी बुजुर्गों के सामने अपना बड़बोलापन और शेखी इसलिये नहीं बघारते क्यों कि वे जानते हैं कि बड़ों के   बीच उनकी दाल नहीं गलेगी. वास्तविकता से परिचय कराने में नाकामयाब गाँव वाले उन्हें उनके ही हाल पर छोड़ देते हैं.  गाँव के लड़कों के बीच किस्सा-कहानियाँ सुनाने में ही खुशी ढ़ूँढ़ना जैसे उन्होंने अपने जीवन का मकसद बना लिया हो. गांधी जी एवं स्वतंत्रता संग्राम की दरमियानी बातों को स्वयं से जोड़कर एवं नमक-मिर्च मिलाकर बताने में उन्हें तृप्ति-सी मिलती है.  कुछ लोग इसे उनका पागलपन कहते हैं.
( छवि हरि भूमि से साभार )
बुन्देली भाषा प्रधान इस नाटक में सतही मनोरंजन के अतिरिक्त यदि दो-चार सार्थक संवादों को छोड़ दिया जाये तो शेष नाटक वह विशेष प्रभाव नहीं डाल पाया  जिसकी दर्शकों को अपेक्षा रहती है. नाटक में जनगणना, गरीबी रेखा, किसानों के सर्वेक्षण, नई पीढ़ी द्वारा गांधी जी, चरखा, तथा तिरंगा झंडा से अनभिज्ञता जैसे मुद्दे पाठकों प्रभावित करते प्रतीत हुए हैं.   परंपराओं एवं ग्रामीण परिवेश को जीवन्त करने हेतु कुँए के पूजन हेतु लोकगीत गाती महिलाएँ, बच्चों द्वारा मिन्दो-मिन्दो पानी दे - धान खों ऊगन दे, शेर नृत्य, फिल्मी बात-चीत, चौपाल, पुलिस स्टेशन आदि दृश्यों के समावेश से नाटक सुनिश्चित प्राञ्जल हुआ है, परन्तु एक सार्थक उद्देश्य की चाह पूर्ण नहीं हो पाई. जनगणना कर्मी, गरीबी रेखा एवं किसान सर्वेक्षण, गाँव की नानी का बीच-बीच में करारे व्यंग्य करना और पुलिस स्टेशन अपने बेटे को छुड़ाने जा रहे मौसा जी से कहना कि " अभी भी जमीन पर लौट आओ तो शायद गाँव वाले आपकी कुछ मदद कर दें", इसके साथ ही पृष्ठभूमि पर ग्रामीण महिलाओं की उपस्थिति, अंधे पात्र का लयबद्ध गीत गाते हुए निकलना, गांधी जयंती पर मौसा जी का चरखा चलाना, छोटे बच्चे का जै हिन्द कह कर चिढ़ाना, झोपड़ी, खाट, रोटी बेलना, ज्वेलथीफ फिल्म का पोस्टर जैसे कुछ अनूठे सफल प्रयोग किए गए हैं परन्तु दृश्यांकनों की सफलता को नाटक की सफलता कहना कितना उचित है, यह तो समीक्षक ही बता पाएँगे. सेट्स और दृश्य तो करोड़ों के व्यय से भी बनाये जाते हैं, परन्तु सजीवता और सार्थकता में जमीन-आसमान का अंतर होता है. सार्थकता फुटपाथ पर भी प्रदर्शित की जा सकती है और करोड़ रुपये खर्च करके भी नहीं पाई जा सकती.  अतः मेरा बार-बार यही मत है कि पटकथा का चयन और उसमें प्रभावी मिश्रण ही सफलता की कुंजी हैं जिसमें तन-मन-धन और पाठकों की नाटकों के प्रति रुचि का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है. मौसा जी जै हिन्द नाटक में अपने अंतर्द्वन्द्व, मनगढ़ंत कहानियों और जीवन की सच्चाई से परे भागने वाले शख्स की भूमिका को मौसा जी ने बखूबी प्रस्तुत किया है.  नायक निश्चित रूप से श्रेष्ठ अभिनय के लिये बधाई का पात्र है.  अन्त में यह कहना भी सामयिक है कि जब आज की मशीनी जिन्दगी से लोग समय बचाकर थियेटर नाटक देखने आता है. अपने कई जरूरी काम छोड़ता है तो उसका आशान्वित होना स्वाभाविक है.  मेरे हिसाब से आज जब नाटक बेहद खर्चीला मनोरंजन हो गया है और दर्शक समय के साथ  पैसा भी  खर्च करता है तब क्या नाटक की पटकथा एक आम कहानी जैसी होना चाहिये. मुझे लगता है कि जब तक पटकथा एवं नाटक में नवीनता, अपेक्षा से अधिक प्रभावशीलता, दर्शकों को झकझोरने और गुगुदाने वाले संवादों का अभाव होगा हमें इस बदलते परिवेश में सफलता छूने हेतु संघर्ष करना ही पड़ेगा. इसका आशय यह है कि नाटकों में अतिशय नाटकीयता हो परन्तु उसमें कसाव, प्रहारक संवाद, भावनात्मक आघात, दर्द एवं हर्ष का मिश्रण उतना ही जरूरी है जितना गीत के लिये संगीत और आवाज के लिये लयात्मकता.  हम जानते हैं कि कोई भी रचनाकार अथवा पाठक अपने-अपने नजरिये से लिखता और पढ़ता है, परन्तु समग्र रूप से निष्कर्ष निकालने के मानक भी तय होना चाहिये जो समय, स्थान एवं परिवेश पर आधारित हों. इन बिन्दुओं पर यदि बार-बार सूक्षमता से निरीक्षण किया जाये तो रचना की श्रेष्ठता में कमियों की संभावना नगण्य होगी. आज का दर्शक एवं पाठक त्वरित आकलन तथा निष्कर्ष पर पहुँचना चाहता है. उसके पास आज मनोरंजन के इतने दृश्य एवं श्रव्य माध्यम हैं कि वह घर बैठे समय और धन बचाकर सब प्राप्त कर लेता है जो हम एक मंचन में कभी नहीं दे सकते , आज इस हकीकत से हमारा वाकिफ होना बेहद जरूरी है. अब हमेँ ही निर्णय करना होगा कि हमारी मेहनत,  हमारा पैसा,  हमारी पटकथा, हमारा समय एवं हमारा मंचन कैसे सार्थकता की कसौटी पर खरा उतरेगा. यदि हमें उस विधा को शाश्वत रखना है तो इस पर हमें गहन चिन्तन करने की महती आवश्यकता है.

- विजय तिवारी " किसलय "

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