रविवार, 31 अक्तूबर 2010

नाटक के बहाने-3 : घुमाई का जीवंत और सार्थक मंचन : बलवंत ठाकुर का लाजवाब निर्देशन

विवेचना के १७ वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह के तीसरे दिन दिनांक २९ अक्टूबर २०१० को मानवीय सरोकारों की सजीव प्रस्तुति देखकर जबलपुर के तरंग प्रेक्षागृह में उपस्थित दर्शक भाव विभोर हो गए. नाटक में स्वयं जी रहे स्तब्ध दर्शकों को नाटक समाप्ति पर भावनाओं से उबरने में कुछ पल लग गए. एक के बाद एक सार्थक संवादों ने कानों में सनसनी फैला दी-
जिसने मेरा दुःख जाना .... मेरे लिए पानी लाया ... जिसने मेरे लिए अपनी जान तक दे दी ... मैं उसकी विधवा हूँ ...
नव विवाहिता का अपने पति की कायरता और पति धर्म के निर्वहन न कर पाने की स्थिति में विद्रोह करना दर्शकों की कल्पना के विपरीत था. एक छोटी सी कहानी की इससे अच्छी प्रस्तुति हो ही नहीं सकती.    
( नाटक घुमाई के दृश्य )




(छवि साभार नईदुनिया जबलपुर से )
जम्मू के बलवंत ठाकुर द्वारा निर्देशित डोगरी भाषा और स्थानीय लोक संस्कृति पर आधारित नाटक " घुमाई " में विवाहोपरांत दुल्हन को डोली में बैठाकर बाराती सुनसान जंगल, पहाड़-घाटी, और ऊबड़-खाबड़ रास्ते से अपने गाँव वापस होते हैं. लम्बे और चढ़ाई वाले रास्ते में थकान और धूप के कारण सभी बेहाल हो जाते हैं. दुल्हन को प्यास लगती है लेकिन उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं देता, परन्तु जब असह्य प्यास से दुल्हन की तबियत बिगड़ने लगती है तब पानी की तलाश शुरू होती है. दुर्गम और काफी गहरी घाटी के नीचे पानी दिखाई देता है लेकिन दूल्हा सहित कोई भी अपनी जान जोखिम में डालकर वहाँ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. अन्य बारातियों को छोड़कर जब दुल्हन देखती है कि उसका पति भी उसके लिए पानी लेने नहीं जाता तो वह भावनात्मक रूप से विचलित और निराश हो जाती है.
तभी एक नवयुवक प्यासी दुल्हन की खातिर खतरनाक घाटी से पानी लाने का हौसला करता है. अपनी जान को जोखिम में डालकर कठिनाईयों का सामना करते हुए अंततः वह पानी लाकर दुल्हन की प्यास बुझाने में सफल तो हो जाता है परन्तु अत्यधिक थकान की वजह से स्वयं को नहीं बचा पाता. घटनाक्रम के चलते जब दूल्हा एवं बाराती मानवीय संवेदनाओं को भुला मृत युवक को वहीं छोड़कर चलने की बात करते हैं तभी दुल्हन इस तरह फ़रिश्ता जैसे मृत युवक को लावारिश छोड़ कर जाने से इनकार कर देती है. इंसानियत की धज्जियाँ उड़ते देख उसका ज़मीर जागता है और उसका आहात मन ऐसी सामाजिक व्यवस्थाओं के प्रति विद्रोह कर देता है. वह ऐसी वैवाहिक रश्मों के पूरा होने भर को शादी मानने से इन्कार करने के साथ ही वह पति धर्म और पत्नी के दुःख-सुख का ध्यान न रखने वाले शख्स से रिश्ता तोड़कर मृतक की विधवा होना स्वीकार करती है. यह चरित्र नारी को सशक्त और उच्च स्थान पर लाकर खडा करता है.

पूरे " घुमाई " नाटक में संवादों से ज्यादा सजीव दृश्यों ने दर्शकों को मन्त्र मुग्ध किया . जम्मू के इर्दगिर्द डोगरी संस्कृति की वैवाहिक पद्धति, शादी में निर्वाहित परम्पराएँ, सालियों द्वारा जीजाजी से नोकझोंक और विदाई बेला पर बाबुल के अधीर होने का मार्मिक दृश्य देख कर दर्शकों का अभिभूत होना स्वाभाविक था. खुशी, दुःख, उमंग, थकान, पानी, परेशानी जैसे भावनात्मक दृश्यों को पात्रों के अभिनय से जीवंत किया गया. पानी मौजूद होने का दृश्य, नवयुवक का दुर्गम घाटी से पानी लाते वक्त असंतुलित होकर पानी में गिरना और उसके गिरने पर पानी का उछलना, पात्रों का ही पहाड़ बनना और कठिन रास्ते से युवक का वापस आना वाकई निर्देशक का करिश्मा ही कहा जाएगा. पात्रों के हावभाव एवं उनकी फुरती ने नाटक को सुस्त नहीं होने दिया . अच्छी गुणवत्ता वाला बेकग्राउंड साउंड तथा उसका नियंत्रण, प्री रिकार्डेड फोक सोंग्स , लाईट्स का यथोचित सामंजस्य और फिलर आयटम्स का सीमित उपयोग भी घुमाई की सफलता के बड़े कारण कहे जा सकते है.
नाटक की एक अहम बात यह भी थी कि डोगरी बोली के बावजूद जीवंत संवादों के कारण दर्शकों को बगलें नहीं झाँकना पडीं. सारे के सारे दृश्य दर्शकों के अंतस्थल तक पहुँचे और जो समझ में नहीं आया शायद वह उतना जरूरी भी नहीं लगा. समग्र रूप से यह नाटक सार्थक श्रेणी की तमाम शर्तें पूरा करता है.

समीक्षा आलेख एवं प्रस्तुति :


- विजय तिवारी " किसलय " 

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

यह चित्रमयी प्रस्तुति बहुत बढ़िया रही!