शनिवार, 24 जुलाई 2010

जबलपुर की किरण खत्री : राजनैतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक गतिविधियों की त्रिवेणी

भारतीय होने पर हर हिन्दुस्तानी गर्व करता है. भारत ने सनातन परम्पराओं, रीति-रिवाज़, संस्कृति और भाईचारे की सम्पूर्ण विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है.  हम आदिकाल से अब तक का इतिहास उठा कर देखें तो आध्यात्म से लेकर धर्म तक और सामाजिक सरोकारों से लेकर तकनीकी तक हम कहीं भी पिछड़े नहीं हैं. विश्व में भले ही हमारी आध्यात्मिक और 'देसी-तकनीकियों ' को विकास का दर्ज़ा न मिला हो लेकिन समाज और मानव को एक सूत्र में पिरोने का जितना कार्य भारत में हुआ है, विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं हुआ. वैसे भी सहस्राब्दिओं पहले रचित वेदोक्त वाक्य " वसुधैव कुटुम्बकं " से कौन अपरिचित है ?  हमारे  पूर्वजों और ऋषि-मुनिओं ने स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ को जो महत्व दिया है वह आज किसी से छिपा नहीं है.  आदि से अब तक कभी ऐसा अंतराल नहीं आया कि हमारे देश में विलक्षण प्रतिभाओं की कमी रही हो . विसंगतियाँ और बुराईयाँ जीवन के अंग होते हैं.  हम इनको यदि हाशिये पर रख कर सोचें तो एक प्रबुद्ध और सद्मार्गी  वर्ग समाज में पाया ही जाता है, जो निरंतर बुराईयों के प्रति सचेत कराने के साथ साथ अच्छाई का भी पथ-प्रदर्शक होता है . मोहल्ले से लेकर देश तक हर जगह ऐसे लोगों की इंसानियत के चर्चे सुने जा सकते हैं.  इनकी कर्तव्य-परायणता के उदाहरण देखे जा सकते हैं.  इस तरह के मानवीय और सामाजिक कर्म-भूमि में पुरुषों का बाहुल्य तो सहज दिखाई देता है परन्तु पारिवारिक उत्तरदायित्वों एवं भारतीय परम्पराओं का निर्वहन करते हुए यदि कोई महिला मानवीय और सामाजिक क्षेत्र को कर्म-भूमि को चुने ?  निर्धन और असहायजनों का दर्द महसूस करे ?  इतना ही नहीं उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर उसके निराकरण का सार्थक प्रयास करे तो हमें आश्चार्यमिश्रित गौरव का भान होता है. असहज और कठिन होने के बावजूद आज भी मानव समाज के उन्नयन हेतु अनेक महिलायें अग्रणी दिखाई देती हैं. आखिर वे कैसी परिस्थितियाँ और परिवेश होते हैं जो महिलाओं को ऐसा संकल्पित होकर इस क्षेत्र में अग्रसर होने के लिए प्रेरित करते हैं.  सामयिक घटनाओं एवं सामाजिक क्रिया-कलापों का भी अनजाने में प्रभाव पड़ता है.  इसके साथ ही निश्चित रूप से इसके पीछे उनके माता-पिता, संस्कार, शिक्षा- दीक्षा और पारिवारिक माहौल का वृहद योगदान रहता  है.  इन सबका एक उदाहरण हैं जबलपुर की श्रीमती किरण खत्री, जिनको मैंने भी नजदीक से जाना है.  उनसे बातचीत करने और उनकी कार्यशैली देखने से लगता है कि उनमें निहित कर्तव्यनिष्ठा उन्हें विरासत में मिली है और उस पर " सोने पे सुहागा " वाली कहावत को चरितार्थ किया है वरिष्ठ समाज-सेवी, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संचेतना के संवाहक उनके पति श्री अविनाश खत्री जी ने .
(श्रीमती किरण खत्री एवं उनके पति श्री अविनाश खत्री )


समाज में व्याप्त विसंगतियाँ, महिलाओं का पिछडापन एवं गरीबों की समस्याओं के प्रति उनके जैसा दृष्टिकोण एवं समाधान का उत्स कम ही लोगों में दिखाई देता है. सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक गतिविधियों के समानान्तर एक कवयित्री का होना उन्हें अलग श्रेणी में लाकर खड़ा करता है.  एक नेता मंच पर खडा होकर भाषण दे सकता है, सामजिक कार्यकर्ता जन-समस्याओं का निराकरण करा सकता है, लेकिन श्रीमती किरण खत्री मंच से बोलती हैं, सामाजिक गतिविधियों में संलग्न रहती हैं एवं धार्मिक भावनाओं का भी आदर करती हैं.  उपरोक्त कार्यों से प्राप्त अनुभवों एवं अपने आसपास घटित घटनाओं पर सदैव चिन्तन-मनन करना भी उनकी संवेदनशीलता को प्रदर्शित करता है.  इतना ही नहीं उनके अन्दर का " कवि मन " उद्वेलित भावों को  लेखनी से कागज पर उकेरने में  अहम भूमिका निभाता है.       
  
                                     
( किरण जी का  परिचय )
   इनके भावों की जीवन्तता उनके सद्यप्रकाशित " अश्कों की लोरियाँ " काव्य-संग्रह में देखने को मिलती है.  संग्रह की अधिकांश रचनाओं को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि उनका अन्तर्मन समाज के असंयत व्यवहार एवं क्रिया-कलापों से अत्यंत आहत हुआ  है.  उन्हें  मानवीय  एवं नैतिक अवमूल्यन, लिंग-भेद, महिलाओं की धीमी  प्रगति, गरीबों की पीड़ा , भाईचारे एवं आदर-भाव में गिरावट होना खलता है.  आज की बदलती सामाजिक संरचना के अधीन जीवन-यापन कर रहे लोगों और अपने समाज में कुछ नयापन लाने की ललक उनकी आँखों  में स्पष्ट नज़र आती है.  अर्धशतकीय जीवन के बावज़ूद उनकी दिनचर्या और सक्रियता देखकर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि श्रीमती किरण खत्री अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु अनवरत अग्रसर  हैं.  वे आज भी समाज, शहर और अपने राष्ट्र की चतुर्दिक उन्नति के  लिये सकारात्मक कार्यों में अपना योगदान देती रहती हैं. मेरी दॄष्टि से यदि समाज में श्रीमती किरण खत्री जैसी क्रियाशीलता एवं समाज के प्रति समर्पण जाग्रत हो जाये तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा समाज चहुँमुखी विकास के साथ सुख-सम्रद्धि से परिपूर्ण होगा.  हमारी श्रीमती किरण खत्री के उज्ज्वल भविष्य एवं स्वस्थ्य जीवन की शुभकामनायें. 
हम आदरणीया श्रीमती किरण खत्री जी की रचना   'आओ ऐसा राष्ट्र बनायें'  " को उनकी ही आवाज़ में आप सब को सुनवा रहे हैं :-
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रचना 'आओ ऐसा राष्ट्र बनायें' सुनने के लिए  [इसे]   क्लिक करें
 













- विजय तिवारी " किसलय " 

3 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसी प्रतिभावान किरण जी को हमारी बधाई एवं शुभकामनाएँ.

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  2. किरण खत्री जी की साहित्यिक प्रवृत्ति और उनके कार्य कलापों से परिचित हुए, बधाई

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