बुधवार, 14 जुलाई 2010

नीरोग रहने के लिए मन का संयमित और स्थिर रहना परमावश्यक है.

अधिकतर इंसान नियम और संयम के साथ जीवन यापन करना चाहता है परंतु वह विभिन्न परिस्थितियों और परिवेश के चलते ऐसा करने में लाचार सा नज़र आता है. आज हम टी वी पर, योग गुरुओं की सभाओं में , सुबह-सुबह बाग-बगीचों और फुटपाथों पर स्वस्थ्य और संयमित रहने हेतु लोगों की संलिप्तता देख सकते हैं. इन सब के बावज़ूद भी अधकाँश लोग आज के दौर में अस्वस्थ रहते हैं, एक रोगी की तरह अपने आपको पाते हैं. आख़िर लोग इस पर आत्म चिंतन क्यों नहीं करते ? देखा जाए तो इनके होते भी हैं अनेक कारण !! लेकिन मैं यहाँ उन कारण को नहीं गिनाऊंगा जो आपके जेहन में आते हैं.. मैं तो बस यह बताना चाहता हूँ कि इंसान शारीरिक स्वस्थता एवं संयम मात्र से नीरोग नहीं बन पाता. यदि इंसान अपने जीवन में असंतुष्टता की चादर ओढ़े हुए है, ईर्ष्या और द्वेष का चश्मा पहने हुए है, अनैतिक कृत्यों में संलिप्त है तो भला वह इंसान निरोगी कैसे हो पाएगा? तात्पर्य ये हुआ कि शारीरिक संयम के साथ-साथ जब तक हमारा मन संयमित नहीं होगा , मन शांत नहीं होगा, तब तक इंसानी काया सही मायने में नीरोगी कहलाएगी ही नहीं. हम कह सकते हैं कि सुख, शांति और नीरोग रहने के लिए मन का संयमित और स्थिर रहना परमावश्यक है.
 
 
 
 
 
 
 
 
 
- डॉ विजय तिवारी " किसलय "

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