रविवार, 10 मई 2009

इक छोटी सी चिनगारी, अंगार बन गई।

जो इलाज़ थी मेरी
नासूर बन गई
वो पास आकर न जाने
क्यों दूर हो गई
उसे फूल था बनना
कटार बन गई।
इक छोटी सी चिनगारी
अंगार बन गई।

गैर न थी फ़िर भी
अंजान बन गई
वो ईमान थी मेरी
बे-ईमान बन गई
अब तो आरजू भी अपनी
तकरार बन गई
इक छोटी सी चिनगारी
अंगार बन गई।

- विजय


6 टिप्‍पणियां:

  1. are saahib bahot hi khubsurat kavita kahi hai aapne... bahot pasand aayee... dhero badhaayee ke patra hai aap...

    arsh

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  2. जो इलाज़ थी मेरी

    नासूर बन गई
    वो पास आकर न जाने
    क्यों दूर हो गई
    उसे फूल था बनना
    कटार बन गई।
    इक छोटी सी चिनगारी
    अंगार बन गई।

    बहुत खूब..लाजवाब अभिव्यक्ति....!!

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  3. bahut hi khoobsoorat .............dil ko choo gayi.

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  4. बहुत बढ़िया पंक्तियाँ लाजबाब . प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.

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  5. choti cheez bhiu kai baar bada asar karti hai phir chingari to mahal ko rakh kar sakti hai
    acha likha hai

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  6. sir aapne mere blog par comment kiya mujhe is baat ki badi khusi hai.... aur aane mujhe beti kaha us baat ki aur b jyada khusi hai....

    sir, mai abi is blog jagat me nayi hu... so, agar aapka maarg darshan milega to saayad mai aur b achcha kar paau....

    thnx a lot sir...

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