रविवार, 29 मार्च 2009

एक लघुकथा- "ऊँचाई"

थोड़ी देर पहले ही नारियल खरीद कर ले गये सत्यव्रत ने वापस लौट कर दुकानदार से कहा -

" अंकल, ग़लती से आपने मुझे कुछ पैसे ज़्यादा लौटा दिए हैं"

" वाकई, तुम नाम के अनुरूप सत्यव्रती हो बेटे।
भला, आजकल कौन पैसे लौटता है।
ईमानदारी किस बुरी तरह दम तोड़ रही है ? दूकानदार ने कहा।

पिता जी को जब यह पता चला तो उन्होंने सत्य व्रत को टटोलते हुए पूछ ही लिया

" इस तरह ईमानदारी दिखाने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें"

सत्यव्रत की चुप्पी देखकर पिता मुस्कुराकर बोले:-

" तुमने ठीक ही किया है बेटे, मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।"

" ईमानदारी समझने और महसूस करने की बात है। इसकी मिठास जीवन पर्यंत मिलती है। वहीं बेईमानी क्षणिक फ़ायदेमंद होती है पर भविष्य वीभत्स बना देती है "

" बेटे किसी की भूल का बेजा फ़ायदा उठाना इंसान की फ़ितरत है, परंतु यह आदत उसे कभी ऊँचा उठाने में मददगार साबित नहीं होती"
" शाबाश " - पिता ने उसकी पीठ थपथपाई तो उसे लगा कि वह अपनी नज़र में ऊँचा, कहीं और ऊँचा तो नहीं उठ गया है। "
- विजय तिवारी " किसलय "


4 टिप्‍पणियां:

  1. ईमानदारी समझने और महसूस करने की बात है। इसकी मिठास जीवन पर्यंत मिलती है। वहीं बेईमानी क्षणिक फ़ायदेमंद होती है पर भविष्य वीभत्स बना देती है "

    बहुत गहरी बात कही आपने ...मुझे तो कई ऐसे उदहारण मिले हैं जिन्होंने अपने बेईमानी भरे आचरण के कारन जीवन भर कुछ नहीं कमाया और उम्र बीत जाने पर पछताने के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा ...!!

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  2. zaroorat hai aisee hee kahaniyon kee warna eemandaree kee jo paribhashs aaj ban gayee hai wahee qayam rah jayegi.

    Sarwat Jamal

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  3. prerna dayak prasang, padhkar achcha laga.

    aapke mere blog par aane aur comment ke liye dhanyawaad, asha hai aapko meri agli rachnayen bhi pasand aayengi.

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  4. aaj ke waqt mein aisi hi jaroorat hai.........logon ko jagaane ki.bahut khoob likha hai aapne.

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