बुधवार, 4 मार्च 2009

मातृ सेवा

क़र्ज़ माँ का है बड़ा, जानते ये हम सभी
हैं बहुत उपकार इसके, हम न गिन सकते कभी

कष्ट में देखे हमें तो, रोएँ इसके भी नयन
सारे दिन की छोड़िए, रात न करती शयन

आज भी सारे जहाँ का , एक ही मंतव्य है
मातृ सेवा हर युगों का, श्रेष्ठतम कर्तव्य है

ईशभक्ति में न शक्ति, माँ की सेवा में जो है
स्वर्ग न आनंद देता, मातृ सेवा में वो है

अपनी माँ को भूलता जो, वह बड़ा ख़ुदग़र्ज़ है
मातृ सेवा इस जहाँ में , हर मनुज का फ़र्ज़ है
- विजय तिवारी "किसलय"

2 टिप्‍पणियां:

  1. ईशभक्ति में न शक्ति, माँ की सेवा में जो है
    स्वर्ग न आनंद देता, मातृ सेवा में वो है
    bahut achchhi lagi kavita. badhaai ho.

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  2. matri karz bahut bada hota hai aur wo jaan dekar bhi nhi chukaya ja sakta.
    bahut badhiya.............badhyi ho.

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