बुधवार, 24 दिसंबर 2008

साहित्यकार से पत्रकार तक श्री सुशील तिवारी

स्वाधीनता के पश्चात आदर्श पत्रकारिता की मशाल लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित किया, उनमें से अब कुछ की पवित्र स्मृतियाँ शेष हैं और कुछ आज भी स्वान्तः सुखाय, स्वतन्त्र अथवा अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप लेखनरत हैं। आधुनिक हाईटेक पत्रकारिता आज भी उनकी लगन, सक्रियता, समर्पण और मेलजोल जैसे गुणों में बीस नहीं है. पत्रकारिता के उद्योग की तरह विकसित होने के उपरांत भी आज ऐसे पत्रकारों का अभाव नहीं है जो स्तरीय पत्रकारिता और अपनी अग्रज पीढ़ी का अनुकरण करते हुए पत्रकारिता को नए आयाम दे रहे हैं. इनमें संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार आदरणीय श्री सुशील तिवारी भी अग्रगण्य हैं।

ऐतिहासिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक नगर जबलपुर में १० मार्च १९४४ को पं। रेवा प्रसाद तिवारी एवं श्रीमती बेनीबाई तिवारी के घर जन्मे श्री सुशील तिवारी ने स्थानीय राबर्टसन कॉलेज से एम। एससी. उत्तीर्ण कर सिहोरा महाविद्यालय में व्याख्याता के रूप में शिक्षा जगत चुना. इस रास्ते को बदलकर पत्रकारिता में आए श्री तिवारी मूलतः एक साहित्यकार थे, लेकिन अपने लेखन, अपनी अभिव्यक्ति और आत्मसंतुष्टि हेतु उन्हें पत्रकारिता अधिक सहज लगी, क्योंकि पत्रकारिता की भाषा छल-छद्म और महिमा-मंडन से दूर होने के साथ ही ज्यादा अपील करने वाली होती है.

अपने पिता स्वर्गीय पं रेवा प्रसाद तिवारी से विरासत में मिले शिक्षा और संस्कारों ने श्री सुशील तिवारी की प्रतिभा को द्विगुणित किया। साहित्यिक अभिरुचि और निरंतर लेखन में सशक्त अभिव्यक्ति को लेकर उनके ऊहापोह ने अंततः पत्रकारिता ही चुना. आपने नवीन दुनिया जबलपुर से अपना पत्रकारिता अभियान प्रारम्भ किया और जनसत्ता दिल्ली, फ्री प्रेस जनरल मुंबई, इंडियन एक्सप्रेस नागपुर, नई दुनिया इंदौर में सम्पादकीय कार्य के अतिरिक्त हितवाद में अतिथि स्तंभकार के रूप में भी लेखन किया. आप वर्तमान में राष्ट्रस्तरीय दैनिक भास्कर जबलपुर संस्करण के स्थानीय सम्पादक एवं दैनिक भास्कर सतना के प्रभारी सम्पादक पदों को गौरवान्वित कर रहे हैं.
आपके पत्रकारीय लेखन में जहाँ आपकी विशिष्ठ शैली के दर्शन होते हैं वहीं आपके सम्पादकीय, टिप्पणियों एवं आलेखों में सार्थकता , दिशाबोध एवं सकारात्मक विश्लेषण भी परिलक्षित होता है। आपकी लेखनी को प्रबुद्ध गण पाठक गण सदैव गंभीरता से चिंतन-मनन करते हैं. स्पष्ट है ऐसे लेखन हेतु आपकी पैनी नज़र, सजगता एवं पत्रकारीय धर्म आपको प्रेरित करता है। व्यक्तिगत रूप से श्री तिवारी जहाँ एक ओर सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं भारतीयता के साथ कोई समझौता नहीं करते. वे आँख मूँद कर किसी भी विचारधारा के समर्थक नहीं हैं.

पत्रकार बिरादरी से जुड़े होने के कारण वे स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त "मधुकर" जैसे वरिष्ठ पत्रकारों का स्मरण और अनुकरण करना अपना दायित्व मानते हैं। इस पत्रकारीय अभियान में स्वयं से संतुष्ट अनुभव करने वाले श्री तिवारी आज जिस ऊँचाई पर हैं, यह उनकी लगन, मेहनत, प्रतिभा और विलक्षण पत्रकारीय दृष्टिकोण का प्रतिफल ही कहा जायेगा.

ऐसे कर्मठ एवं प्रतिभावान व्यक्तित्व को " स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त वरिष्ठ पत्रकारिता सम्मान २००८ " से सम्मानित किया जाना हमारे लिए पत्रकारिता के प्रति कृतज्ञता के अक्षत-पुष्प अर्पित करने जैसा है.
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- विजय तिवारी " किसलय "

2 टिप्‍पणियां:

  1. adarniya sushil tiwari ji ki lekhni ke to apun fan hain unki vishes tippani ka dainik bhaskar mein hamesha intajar rehta hai .badhai

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  2. बहुत सही खा कहा आपने दुबे जी
    उनकी सोच का नजरिया कुछ तो जुदा है ही .......

    आपका
    - विजय

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