रविवार, 27 अप्रैल 2008

मैं सुमन हूँ, महकता रहूँगा सदा.



मैं सुमन हूँ, महकता रहूँगा सदा.
रंग खुशियों के, भरता रहूँगा सदा..
फ़र्क करना कभी मैने सीखा नहीं,
गीत समता के लिखता रहूँगा सदा..
प्यार की आग में गर तपाया गया,
बन के कुंदन दमकता रहूँगा सदा...
भोर आई खुशी की तो बहका नहीं,
शाम-ए-गम में भी हँसता रहूँगा सदा..
इश्क़ करना सिखाया है जिसने मुझे,
उसकी जानिब ही बढ़ता रहूँगा सदा...
जिनकी खातिर भुलाया है सारा जहाँ,
आशिक़ी उनसे करता रहूँगा सदा..
नम्र " किसलय " की जग में ये पहचान है,
मैं शिखर पर ही उगता रहूँगा सदा...
- डॉ. विजय तिवारी "किसलय"
जबलपुर, एम.पी. इंडिया.

2 टिप्‍पणियां:

  1. "मैं सुमन हूँ, महकता रहूँगा सदा"
    "रंग खुशियों के, भरता रहूँगा सदा"

    बहुत सुंदर रचना है जब से यह आपकी मैंने रचना पढी है रह रहकर उपरोक्त शब्द मेरे जेहन मे गूंजते है और यह कविता प्रेरक का काम करती रहेगी . आभार

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  2. आप इतनी सुंदर कविता लिखते है कृपया नियमित लिखे . धन्यवाद

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