गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

मानवता

सु- रभित-शोभित उपवन मन का,
... मधुर-सुखद फूलों के सपने।
जा- ना हमने खुशबू देकर,
......बनें गैर भी कैसे अपने ॥
ता- ने दे चाहे जग सारा,
..... दृढ़ - संकल्पित- कदम रुकें ना ,

श- ब्दों के मृदु-मानदंड पर,
..... अटल रहें हम कभी झुकें ना॥
र- सना से प्रस्फुटित ज्ञान की,
... हितकर, प्रेममयी - धारा ,
मा- नवता को बिखरायेगी,
.......सबके आँगन - चौबारा
( सु जा ता श र मा के नाम पर लिखी
यह कविता " आद्यक्षरी " विधा का उदाहरण है । )

- विजय तिवारी ' किसलय '


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