मंगलवार, 26 अगस्त 2025

 संस्कारधानी जबलपुर के सुरेश मिश्र विचित्र को मिला प्रदेश स्तरीय शरद जोशी  मिला पुरस्कार

              साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन, भोपाल द्वारा वर्ष 2023 के अन्तर्गत व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट सृजन हेतु संस्कारधानी जबलपुर के सुरेश मिश्र विचित्र को भोपाल में आयोजित गरिमामयी आयोजन में प्रदेश स्तरीय शरद जोशी पुरस्कार प्रदान किया गया। 

इस महती उपलब्धि पर हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर  के सदस्ययों द्वारा श्री विचित्र को अनंत बधाईयाँ।



सोमवार, 5 अगस्त 2024

अन्तरराष्ट्रीय ब्लॉगर डे - 2024

   अन्तरराष्ट्रीय ब्लॉगर डे - 2024


आज से करीब 20 वर्ष पूर्व अन्तरजाल और उसके कुछ प्लेटफार्म्स के बारे में टी वी, रेडियो तथा प्रिंट मीडिया से हम पढ़ते और सुनते रहते थे। कम्प्यूटर, मोबाईल, अन्तरजालीय स्थानीय व व्यक्तिगत परिस्थितियों वश हम चाहते हुए भी न इनका उपयोग कर पा रहे थे, न ही लाभान्वित हो पा रहे थे। तीव्र जिज्ञासा बनी रहने के कारण संसाधन के आते ही हम अंतरजाल से जुड़ गए। वर्ष 2006-07 तक हिन्दी ब्लॉगिंग, चिट्ठा जगत जैसे प्लेटफार्म संघर्ष कर रहे थे। मोटे तौर पर उन दिनों पूरे विश्व में हिन्दी ब्लॉगर्स की संख्या तीस से चालीस हजार का आंकड़ा छू पाई थी।

       हमें सुखद अनुभूति होती है कि हम जबलपुर के प्रारंभिक हिन्दी ब्लॉगरों में हैं। मेरा ब्लॉग- हिन्दी साहित्य संगम है। hindisahityasangam.blogspot. com  

       उन दिनों हम ब्लॉग्स में नियमित अपनी रुचि, अपने साहित्य, सामाजिक, धार्मिक, सामयिक तथा सम्पन्न कार्यक्रमों, विशिष्ट उपलब्धियों, पर्वों और विशेष दिनों पर कुछ न कुछ जरूर पोस्ट किया करते थे।

रोज पढ़ना और रोज लिखने की निरंतरता से सृजनात्मकता को बल तक मिला ही, घर बैठे पूरे विश्व में हमें पहचान मिली।

अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अरब यहाँ तक कि जहाँ जहाँ भारतीय, हिन्दी और हिन्दी ब्लोगेर्स से सभी साहित्यिक बंधन में बँधते गए।उन में से आज भी बहुत से मित्र हैं जो हमसे संपर्क में हैं। हमारा अपने पूरे देश में भी एक बहुत बड़ा संपर्क समूह है।

फेसबुक, इंस्ट्राग्राम, टेलीग्राम, एक्स, वाट्सएप जैसी त्वरित  प्रणालियों के कारण ब्लॉग्स बहुत हद तक पिछड़ गया है। ई-पेपर्स, गूगल सर्च इंजन और अब 'ए आई' की सुविधाएँ समयानुकूल होने के कारण ज्यादा प्रचलित हैं।

बावजूद इन सबके हम ब्लॉगर्स पर गर्व करते हैं । टाइपिंग, भाषा, छवियाँ, विभिन्न अन्तरजालीय सुविधाओं की अनुपलब्धता होने पर भी हमने अन्तरजाल को हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार का आधार बनाया, जिसका वर्तमान में हम सर्वसम्मुख परिणाम दिखाई दे रहा है।

"ब्लॉगर डे" पर सभी को शुभभाव देते हुए मैं यह कहूँगा कि लोग ब्लॉग्स जरूर लिखें और नियमित पढ़ें भी। 

- डॉ. विजय तिवारी 'किसलय'




बुधवार, 31 जुलाई 2024

विजय तिवारी 'किसलय' की लघुकथा 'कृतघ्नता' का प्रकाशन

देश की सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका 'जगमग दीप ज्योति' के
 जुलाई-24 अंक में विजय तिवारी 'किसलय' की
 लघुकथा 'कृतघ्नता' का प्रकाशन हुआ।
 आभार जगमग दीप ज्योति परिवार।
✔🍁🍁🍁👈👈👈👈- विजय तिवारी ''किसलय''



शनिवार, 10 सितंबर 2022

पोती आव्या तिवारी द्वारा माढ़ोताल जबलपुर में गणेश विसर्जन किया गया

                     गणेश विसर्जन

          कल दिनांक 09 सितंबर 2022 को

मेरी पोती आव्या, बेटा सुविल, बहु मेघा और

पत्नी सुमन तिवारी ने माढ़ोताल जबलपुर में

गणेश विसर्जन किया।


-विजय तिवारी 'किसलय'




शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

मोहल्ले, पड़ोस से दूरियाँ बनाते लोग

शुक्रवार, 11 फरवरी 2022 दिनांकित दैनिक समाचार पत्र 'स्वतंत्र मत' के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख "मोहल्ले, पड़ोस से दूरियाँ बनाते लोग" आप सबके लिए- (सहज पठनीयता हेतु मूल आलेख संलग्न) मोहल्ले, पड़ोस से दूरियाँ बनाते लोग एक समय था जब गाँव या मोहल्ले के एक छोर की गतिविधियाँ अथवा सुख-दुख की बातें दो चार-पलों में ही सबको पता चल जाती थीं। लोग बिना किसी आग्रह के मानवीय दायित्वों का निर्वहन किया करते थे। तीज-त्यौहारों, भले-बुरे समय, पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में एक परिवार की तरह एक साथ खड़े हो जाते थे। आज हम पड़ोसियों के नाम व जाति-पाँति तक जानने का प्रयास नहीं करते। मुस्कुराहट के साथ अभिवादन करना तथा हाल-चाल पूछने के बजाय हम नज़रें फेरकर या सिर झुकाये निकल जाते हैं, फिर मोहल्ले वालों की बात तो बहुत दूर की है। उपयोगी व आवश्यक कार्यवश ही लोगों से बातें होती हैं। हम पैसे कमाते हैं और उन्हें पति-पत्नी व बच्चों पर खर्च करते हैं, अर्थात पैसे कमाना और अपने एकल परिवार पर खर्च करना आज की नियति बन गई है। रास्ते में किसका एक्सीडेंट हो गया है। पड़ोसी खुशियाँ मना रहा है अथवा उसके घर पर दुख का माहौल है, आज लोग उनके पास जाने की छोड़िए संबंधित जानकारी लेने तक की आवश्यकता नहीं समझते। आज मात्र यह मानसिकता सबके जेहन में बैठ गई है कि जब पैसे से सब कुछ संभव है तो किसी के सहयोग की उम्मीद से संबंध क्यों बनाये जाएँ। पैसों से हर तरह के कार्यक्रमों की समग्र व्यवस्थाएँ हो जाती हैं। बस आप कार्यक्रम स्थल पर पहुँच जाईये और कार्यक्रम संपन्न कर वापस घर आ जाईये। जिसने हमें बुलाया था, जिनसे हमें काम लेना है, बस उन्हें प्राथमिकता देना है। इन सब में परिवार, पड़ोस और मोहल्ले सबसे पिछले क्रम में होते हैं। जितना हो सके, इन सब से दूरी बनाये रखने का सिद्धांत अपनाया जाता है। आज हम सभी देखते हैं कि जब कार्ड हमारे घर पर पहुँचते हैं, तब जाकर पता चलता है कि उनके घर पर कोई कार्यक्रम है। यहाँ तक कि जब भीड़ एकत्र होना शुरू होती है तब पता चलता है कि आस-पड़ोस के अमुक घर में किसी सदस्य का देहावसान हो गया है। आज लोग शादी में दूल्हे-दुल्हन को, बर्थडे में बर्थडे-बेबी को महत्त्व न देकर डिनर को ही प्राथमिकता देते हैं। मृत्यु वाले घर से मुक्तिधाम तक शवयात्रा में शामिल लोग व्यक्तिगत, राजनीतिक वार्तालाप, यहाँ तक कि हँसी-मजाक में भी मशगूल देखे जा सकते हैं, उन्हें ऐसे दुखभरे माहौल से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। आजकल अधिकांशतः लोग त्योहारों में घरों से बाहर निकलना पसंद नहीं करते। होली, दीपावली जैसे खुशी-भाईचारा बढ़ाने वाले पर्वों तक से लोग दूरियाँ बनाने लगे हैं। आज बुजुर्ग पीढ़ी यह सब देखकर हैरान और परेशान हो जाती है। उन्हें अपने पुराने दिन सहज ही याद आ जाते हैं। उन दिनों लोग कितनी आत्मीयता, त्याग और समर्पण के भाव रखते थे। बड़ों के प्रति श्रद्धा और छोटों के प्रति स्नेह देखते ही बनता था। बच्चों को तो अपनों और परायों के बीच बड़े होने पर ही अंतर समझ में आता था। पड़ोसी और मोहल्ले वाले हर सुख-दुख में सहभागी बनते थे। यह बात एकदम प्रत्यक्ष दिखाई देती थी कि पड़ोसी पहले पहुँचते थे और रिश्तेदार बाद में। कहने का तात्पर्य यह है कि आपका पड़ोसी आपके हर सुख-दुख में सबसे पहले आपके पास मदद हेतु खड़ा होता था। वाकई ये बहुत गंभीर मसले हैं। ये सब अचानक ही नहीं हुआ। इस वातावरण तक पहुँचने का भी एक लंबा इतिहास है। बदलते समय और बदलती जीवन शैली के साथ शनैः शनैः हम अपने बच्चों और पति-पत्नी के हितार्थ ही सब करने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। संयुक्त परिवार और खून के रिश्तों की अहमियत धीरे-धीरे कम होती जा रही है। लोग संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार में अपने हिसाब से रहना चाहते हैं। ज्यादा कमाने वाला सदस्य अपनी पूरी कमाई संयुक्त परिवार में न लगाकर अपने एकल परिवार की प्रगति व सुख सुविधाओं में लगाता है। अपनी संतान का सर्वश्रेष्ठ भविष्य बनाना चाहता है। संयुक्त परिवार के सुख-दुख में भी हिसाब लगाकर बराबर हिस्सा ही खर्च करता है। इन सब के पीछे हमारे भोग-विलास और उत्कृष्ट जीवनशैली की बलवती अभिलाषा ही होती है। हम इसे ही अपना उद्देश्य मान बैठे हैं, जबकि मानव जीवन और दुनिया में इससे भी बड़ी चीज है दूसरों के लिए जीना। दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूँढ़ना। यह भी अहम बात है कि हमने जब किसी की सहायता नहीं की, हमने जब अपने खाने में से किसी भूखे को खाना नहीं खिलाया। हमने जब किसी गरीब की मदद ही नहीं की। और तो और जब इन कार्यो से प्राप्त खुशी को अनुभूत ही नहीं किया तब हम कैसे जानेंगे कि परोपकार से हमें कैसी खुशी और कैसी संतुष्टि प्राप्त होती है। यह भी सच है कि आज जब हम अपने परिजनों के लिए कुछ नहीं करते तब परोपकार से प्राप्त खुशी कैसे जानेंगे। एक बार यह बात बिना मन में लाए कि अगला आदमी सुपात्र है अथवा नहीं, आप नेक इंसान की तरह अपना कर्त्तव्य निभाते हुए किसी भूखे को खाना खिलाएँ। किसी गरीब की लड़की के विवाह में सहभागी बनें। किसी पैदल चलने वाले को अपने वाहन पर बैठाकर उसके गंतव्य तक छोड़ें। किसी विपत्ति में फँसे व्यक्ति को उसकी परेशानी से उबारिये। बिना आग्रह के किसी जरूरतमंद की सहायता करके देखिए। किसी बीमार को अस्पताल पहुँचाईये। सच में आपको जो खुशी, संतोष और शांति मिलेगी वह आपको पैसे खर्च करने से भी प्राप्त नहीं होगी। आज विश्व में भौतिकवाद की जड़ें इतनी मजबूत होती जा रही हैं कि हमें उनके पीछे बेतहाशा भागने की लत लग गई है। हम अपने शरीर को थोड़ा भी कष्ट नहीं देना चाहते और यह भूल जाते हैं कि हमारा यही ऐशो-आराम बीमारियों का सबसे बड़ा कारक है। ये बीमारियाँ जब इंसान को घेर लेती हैं तब आपका पैसा पानी की तरह बहता रहता है और बहकर बेकार ही चला जाता है। आप पुनः नीरोग जिंदगी नहीं जी पाते। आप स्वयं ही देखें कि समाज में दो-चार प्रतिशत लोग ही ऐसे होंगे जो पैसों के बल पर नीरोग और चिंता मुक्त होंगे। हमारी वृद्धावस्था का यही वह समय होता है जब हमारे ही बच्चे, हमारा ही परिवार हमारी उपेक्षा करता है। हमने जिनके लिए अपना सर्वस्व अर्थात ईमान, धर्म और श्रम खपाया वही हमसे दूरी बनाने लगते हैं। यहाँ तक कि हमें जब इनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है वे हमें वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। अब आप ही चिंतन-मनन करें कि यदि आपने अपने विगत जीवन में अपनों से नेह किया होता। पड़ोसियों से मित्रता की होती। कुछ परोपकार किया होता तो इन्हीं में से अधिकांश लोग आपके दुख-दर्द में निश्चित रूप से सहभागी बनते। आपकी कुशल-क्षेम पूछने आते। आपकी परेशानियों में आपका संबल बढ़ाते रहते, जिससे आपका ये शेष जीवन संतुष्टि और शांति के साथ गुजरता। समय बदलता है। जरूरतें बदलती हैं। बदलाव प्रकृति का नियम है।आपकी नेकी, आपकी भलाई, आपकी निश्छलता की सुखद अनुभूति लोग नहीं भूलते। लोग यथायोग्य आपकी कृतज्ञता ज्ञापित अवश्य करते। आपके पास आकर आपका हौसला और संबल जरूर बढ़ाते। हम मानते हैं कि आज का युग भागमभाग, अर्थ और स्वार्थ के वशीभूत है। ऐसे में किसी से सकारात्मक रवैया की अपेक्षा करना व्यर्थ ही है। इसलिए क्यों न हम ही आगे बढ़कर भाईचारे और सहृदयता की पहल करें। फिर आप ही देखेंगे कि उनमें भी कुछ हद तक बदलाव अवश्य आएगा और यदि इस पहल की निरन्तरता बनी रही तो निश्चित रूप से मोहल्ले, पड़ोस से दूरियाँ बनाते लोग दिखाई नही देंगे साथ ही हम पड़ोसियों और मोहल्ले वालों से जुड़कर प्रेम और सद्भावना का वातावरण निर्मित करने में निश्चित रूप से सफल होंगे। 
 -डॉ विजय तिवारी 'किसलय' जबलपुर

रविवार, 20 दिसंबर 2020

74 वर्ष से प्रगति का यह कैसा राग?

             स्वतंत्रता के सही मायने तो स्वातंत्र्यवीरों की कुरबानी एवं उनकी जीवनी पढ़-सुनकर ही पता लगेंगे क्योंकि शाब्दिक अर्थ उसकी सार्थकता सिद्ध करने में असमर्थ है। देश को अंग्रेजों के अत्याचारों एवं चंगुल से छुड़ाने का जज्बा तात्कालिक जनमानस में जुनून की हद पार कर रहा था। यह वो समय था जब देश की आज़ादी के समक्ष देशभक्तों को आत्मबलिदान गौण प्रतीत होने लगे थे। वे भारत माँ की मुक्ति के लिए हँसते-हँसते शहीद होने तत्पर थे। ऐसे असंख्य वीर-सपूतों के जीवनमूल्यों का महान प्रतिदान है ये हमारी स्वतन्त्रता, जिसे उन्होंने हमें 'रामराज्य' की कल्पना के साथ सौंपा था। माना कि नवनिर्माण एवं प्रगति एक चुनौती से कम नहीं होती? हमें समय, अर्थ, प्रतिनिधित्व आदि सब कुछ मिला लेकिन हम संकीर्णता से ऊपर नहीं उठ सके। हम स्वार्थ, आपसी कलह, क्षेत्रीयता, जातीयता, अमीरी-गरीबी के मुद्दों को अपनी-अपनी तराजू में तौलकर बंदरबाँट करते रहे। देश की सुरक्षा, विदेशनीति और राष्ट्रीय विकास के मसलों पर कभी एकमत नहीं हो पाए।

               आज केन्द्र और राज्य सरकारें अपनी दलगत नीतियों के अनुरूप ही विकास का राग अलापती रहती हैं। माना कि कुछ क्षेत्रों में विकास हो रहा है, लेकिन यहाँ भी महत्त्वपूर्ण यह है कि विकास किस दिशा में होना चाहिए? क्या एकांगी विकास देश और समाज को संतुलित रख सकेगा? क्या शहरी विकास पर ज्यादा ध्यान देना गाँव की गरीबी और भूख को समाप्त कर सकेगा? क्या मात्र देश की आतंरिक मजबूती देश की चतुर्दिक सीमाओं को सुरक्षित रख पाएगी? क्या हम अपने अधिकांश युवाओं का बौद्धिक व तकनीकि उपयोग अपने देश के लिए कर पा रहे हैं? हम तकनीकि, विज्ञान, चिकित्सा, अन्तरिक्ष आदि क्षेत्रों में आगे बढ़ें। बढ़ भी रहे हैं लेकिन क्या इसी अनुपात से अन्य क्षेत्रों में भी विकास हुआ है? क्या वास्तव में गरीबी का उन्मूलन हुआ है? क्या ग्रामीण शिक्षा का स्तर समयानुसार ऊपर उठा है? क्या ग्रामीणांचलों में कृषि के अतिरिक्त अन्य पूरक उद्योग, धंधे तथा नौकरी के सुलभ अवसर मिले हैं? क्या अमीरी और गरीबी के अंतर में स्पष्ट रूप से कमी आई है? क्या जातीय और क्षेत्रीयता की भावना से हम ऊपर उठ पाए हैं? यदि हम ऐसा नहीं देख पा रहे हैं तो इसका सीधा सा आशय यही है कि हम जिस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं वह स्वतंत्रता के बलिदानियों और देश के समग्र विकास के अनुरूप नहीं है।

               आज राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी सोच एवं नीतियाँ बनाना अनिवार्य हो गया है, जो शहर-गाँव, अमीर-गरीब, जाति-पाँति, क्षेत्रीयता-साम्प्रदायिकता के दायरे से परे समान रूप से अमल में लाई जा सकें। आज पुरानी बातों का उद्धरण देकर बहलाना या दिग्भ्रमित करना उचित नहीं है। अब सरकारी तंत्र एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा असंगत पारंपरिक सोच बदलने का वक्त आ गया है। जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक हम नहीं बदलेंगे और जब हम नहीं बदलेंगे तो राष्ट्र कैसे बदलेगा? आज देश को विश्व के अनुरूप बदलना नितांत आवश्यक हो गया है। देश में उन्नत कृषि हो, गाँव में छोटे-बड़े उद्योग हों, शिक्षा, चिकित्सा, सड़क-परिवहन और सुलभ संचार माध्यम ही ग्रामीण एवं शहर की खाई को पाट सकेंगे। आज भी लोग गाँवों को पिछड़ेपन का पर्याय मानते हैं। आज भी हमारे जीवन जीने का स्तर अनेक देशों की तुलना में पिछड़ा हुआ है। ऐसे अनेक देश हैं जो हमसे बाद में स्वतंत्र हुए हैं या उन्हें राष्ट्र निर्माण के लिए कम समय मिला है, फिर भी आज वे हम से कहीं बेहतर स्थिति में हैं, इसका कारण सबके सामने है कि वहाँ के जनप्रतिनिधियों द्वारा अपने देश और प्रजा के लिए निस्वार्थ भाव से योजनाबद्ध कार्य कराया गया है।

               आज स्वतन्त्रता के 74 वर्षीय अंतराल में कितनी प्रगति किन क्षेत्रों में की गई यह हमारे सामने है। अब निश्चित रूप से हमें उन क्षेत्रों पर भी ध्यान देना होगा जो देश की सुरक्षा, प्रतिष्ठा और सर्वांगीण विकास हेतु अनिवार्य हैं। आज देश की जनता और जनप्रतिनिधियों की सकारात्मक सोच ही देश की एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान कर सकती है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु कोई दबाव, कोई भूल या कोताही क्षम्य नहीं होना चाहिए। आज बेरोजगारी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार जैसी महामारियों के उपचार तथा प्रतिकार हेतु सशक्त अभियान की महती आवश्यकता है। गहन चिंतन-मनन और प्रभावी तरीके से निपटने की जरूरत है। इस तरह आजादी के इतने बड़े अंतराल के बावजूद  देश की अपेक्षानुरूप कम प्रगति के साथ ही सुदृढ़ता की कमी भी हमारी चिंता को बढाता है। आईये आज हम "सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा" को चरितार्थ करने हेतु संकल्पित हो आगे बढ़ें।







-विजय तिवारी 'किसलय'

   जबलपुर

      

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

हमको ऐसा देश, चाहिये

हमको ऐसा देश, चाहिये
 
नैनों में हो, नेह समाया, 
सद्गुण हो, सबका आभूषण 
निश्छलता अपनाने वाले, 
कर्मठ मनुज, विशेष, चाहिये
हमको ऐसा देश, चाहिये
         ... .....✴️..... 
स्वाभिमान हर, माथे दमके, 
राष्ट्रप्रेम, हो सबके अंतस 
धर्म-कर्म, की अलख जगाने,
गीता के उपदेश, चाहिये 
हमको ऐसा देश, चाहिये
        ... .....✴️..... 
आतंकी, खल, दुर्धर्षों का,
कर डालें, अब पूर्ण सफाया।
सीमा पर, मर-मिटने वाले, 
भावों का उन्मेष, चाहिये।।
हमको ऐसा देश, चाहिये
        ... .....✴️..... 
स्थिरता हो, अनुशासन हो, 
देशप्रगति, की रहे लालसा 
औद्योगिक, तकनीकि क्रांति का,
वृहद, नवल,परिवेश, चाहिये
हमको ऐसा देश, चाहिये
       ........✴️..... 
प्रतिभाओं के, सदुपयोग से,
हो भविष्य, युवकों का उज्ज्वल।
रोजगार, देने संकल्पित, 
शिक्षा में संदेश, चाहिये, 
हमको ऐसा देश चाहिये
      ... .....✴️..... 
भगवद्गीता, वेद-ऋचायें,
भारत की, बहुमूल्य विरासत।
संस्कार, आदर्श, ज्ञान का,
बहुआयामी वेश, चाहिये।।
हमको ऐसा देश चाहिये
           . .....✴️..... 
 
 
 - डॉ. विजय तिवारी 'किसलय' 
 

 

80 साल पुरानी पथरी को सिर्फ 5 मिनट में हमेशा हमेशा के लिए खत्म करने का अ...

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

विसुधा सेवा समिति जबलपुर ( NGO ) द्वारा लगातार जरूरतमंदों को भोजन व खाद्यान्न वितरण


विसुधा सेवा समिति जबलपुर ( NGO ) द्वारा लगातार जरूरतमंदों को भोजन व  खाद्यान्न  वितरण

                                  कोविड-19 के चलते लॉकडाउन अवधि में "विसुधा सेवा समिति" द्वारा जो जरूरतमंदों को नियमित भोजन, खाद्यान्न, मास्क आदि निश्छल भाव से उपलब्ध कराए जा रहे हैं, इस कार्य की कृतज्ञता हेतु  शब्द भी कम पड़ेंगे। समिति के समर्पित सदस्यों द्वारा जो साहस, उत्साह और सेवाभाव दिखाई दे रहा है, वह प्रणम्य है। इतिहास में ये सब दर्ज हो रहा है। आगे आने वाली पीढ़ी के लिए ये कार्य प्रेरणास्रोत बनेंगे, उन्हें ये संस्कार मिलें, आखिर यही तो हर माता-पिता भी चाहते हैं। आज जब समिति ने यह कार्य करने का बीड़ा उठाया है, जिसकी सराहना करते कोई भी नहीं थकता, तब इससे पीछे हटना तो मुमकिन नहीं है, परन्तु निजी सुरक्षा एवं सामाजिक दूरी का भी ध्यान रखा जाना उतना ही जरूरी है।


बुधवार, 4 दिसंबर 2019

मेरी पोती "आव्या"

मेरी पोती आव्या

मेरी पोती "आव्या" (मेसु)