मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

दोहा श्रृंखला [दोहा क्र. ५२ ]

दोषी होते हैं नहीं,
लगने पर आरोप ।
कभी कभी षडयंत्र भी,
करते सच का लोप ॥
- विजय तिवारी " किसलय "

9 टिप्‍पणियां:

  1. मुझ पे जो इल्जाम है किसका है षडयंत्र।
    जनसेवक ऐसा कहे डूब गया जनतंत्र।।


    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाई जी अभिवादन!
    सत्य वचन .........
    मेरी शुभकामनाएं .............

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सही कहा है.
    सच भी रूप बदल लेता है..या किसी झूट का शिकार !
    आज कल सच और झूट में फरक कर पाना भी अक्सर कठिन जाता है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. kya khoob kaha..........satya bhi kabhi kabhi kuch waqt ke liye jhooth ke saye mein chup jata hai.
    aaj ke sandarbh par bilkul sahi kaha aapne.

    उत्तर देंहटाएं
  5. दोषी होते हैं नहीं,
    लगने पर आरोप ।
    कभी कभी षडयंत्र भी,
    करते सच का लोप ॥

    बहुत गहरी बात कह दी दो पंक्तियों में........!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. pahli baar aayaa aapke blog par, behtar laga,,,padhne lagaa to aapki kai saaari post padh li..
    dohaa behtar he.., sshadyantr thode samaya ke liye ho sakte he, dukh de sakte he kintu sach kaa lop nahi hota bs kuchh samay ke liye vo chhup jaataa he, aour ise ho kahte he sangharsh karna..

    उत्तर देंहटाएं
  7. दोषी होते हैं नहीं,
    लगने पर आरोप ।
    कभी कभी षडयंत्र भी,
    करते सच का लोप......
    aaj aadhunik yug me ye panctiyaan kaaphi had tak prasangik hai

    उत्तर देंहटाएं
  8. एकदम सही कह रहे हैं आप... !गागर में सागर.

    उत्तर देंहटाएं