रविवार, 19 अप्रैल 2009

कुंठा नहीं एक साहित्यकार की सहज पीड़ा

गिरीश भाई का आलेख " आलोचक ही नहीं सभी तो बीस-बीस वाला मैच खेल रहे हैं ....!! ." पढ़ा. आलेख में गिरीशजी ने लिखा है कि "इस आलेख को आप कुंठा ही कहेंगे" तो मैं कहना चाहूँगा कि ये आपकी कुंठा नहीं एक साहित्यकार की सहज पीड़ा है. ये उस साहित्य सेवक के मन को कचॉटने वाली बात बात है जो इस तरह वरिष्ठ साहित्यकारों के लिए कुछ सकारात्मक करने की सोच रखता हो और यथा संभव कर भी रहा हो. बिना नींव के स्थाई मकान की कल्पना की तरह हम अग्रज पीढ़ी के साहित्यकारों और उनके लेखन की अनदेखी कर के ना ही साहित्य का भला कर पाएँगे और ना ही स्वयं का . इस तरह के कार्यों में देखा गया है कि वे लगभग सारे लोग जो माइक पर आदर्श , सक्रियता और बड़े- बड़े सुझावों की बातें करते है वही सबसे ज़्यादा उपेक्षा करते देखे गये हैं. महत्वाकांक्षा रखने वाले इन सबका सुदीर्घ साहित्यिक जीवन हो ही नहीं सकता . ये सारे लोग वहाँ पाए जाते हैं जहाँ इनका स्वार्थ सिद्ध होता है. ये लोग सहयोग की छोड़िए, आपको हतोत्साहित करने से भी नहीं चूकते.
इस लिए गिरीश जी से मेरा निवेदन है कि वे भी केवल कर्तव्य पर विश्वास करते हुए आगे बढ़ें मैं तो यथासंभव जो बनता है कर ही रहा हूँ. आप अकेले नहीं हैं मैं भी हूँ और मेरे जैसे और भी लोग हैं अभी इस दुनिया में जो निश्चल भाव से साहित्य कि सेवा में लगे हुए हैं. मैं आपकी विचारधारा की कद्र करता हूँ और आभार मानता हूँ की आपने मेरी बात को आगे बढ़ाया.
- विजय तिवारी ' किसलय '

1 टिप्पणी:

  1. कवि-कोविद विज्ञान-विशारद ,कलाकार ,पंडित, ज्ञानी
    कनक नहीं, कल्पना-ज्ञान ,उज्जवल चरित्र के अभिमानी
    इन विभूतियों को जब तक संसार नहीं पहचानेगा
    राजाओं से अधिक पूज्य जब तक न इन्हें वह मानेगा
    तब तक पड़ी आग में धरती इसी तरह अकुलायेगी
    चाहे जो भी करे, दुखों से छूट नहीं वह पाएगी

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