रविवार, 12 अप्रैल 2009

दोहा श्रृंखला [दोहा क्र ५०]



सहमे सारी वनस्पती,जीव जगत बेहाल//तेज धूप में हवा के,लगें थपेड़े गाल

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5 टिप्‍पणियां:

  1. तेज़ धूप को झेलते, जगत से क्योँ होते बेहाल
    सहम सहम कर हो गये, लाल लाल ये गाल

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  2. लाल लाल ये गाल, दोहा नजर ना आया
    यही सोच कर मेरा मन खुद पर मुस्काया

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  3. aapka doha to anupam ji ne poora kar diya .
    aisa bhi likhna chahiye jise aage koi aur poora kare.

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  4. सूर्य बिना कुछ सम्‍भव नही है, जब होता है तब भी सभी इसे याद करते है और जब नही होता है तब परभी सभी इसे याद करते है। अच्‍छा लगा आपका दोहा।

    सूचना
    यह पोस्‍ट आपसे सम्‍बन्धित है इस लिये भेज रहा हूँ
    http://pramendra.blogspot.com/2009/04/blog-post_14.html

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