रविवार, 8 फ़रवरी 2009

कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है - नीरज जी


यूँ तो सैकड़ों गीत हैं गुनगुनाने के लिए
लेकिन कुछ ऐसे गीत होते हैं जो जीवन भर याद रहते हैं.
उन गीतों को सुनते ही गीतकार की याद ताज़ा हो जाती है-
या गीतकार की बात आते ही उन गीतों को गुनगुनाने को जी करने लगता है.

सन १९७२-७३ की बात है.
हमारे विद्यालय में श्री मदन मोहन अवस्थी (अब् स्वर्गीय) प्राचार्य बन कर आए.
संस्कारधानी जबलपुर के संभ्रांत और सुसंस्कृत परिवार से होने के बाद
भी वे सदैव साइकल पर ही चलते थे.
सबेरे सबेरे साइकल से विद्यालय जाते हुए
रास्ते अपनी मधुर और ओजस्वी आवाज में अक्सर
" कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है " गाते हुए दिखाई दिया करते थे.
इस गीत की पसंदगी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं
कि उन्होंने विद्यालय में आने के कुछ ही दिनों बाद इस गीत को
विद्यालय की प्रार्थना के रूप में चयनित किया.
प्रतिदिन ये गीत विद्यालय में गुंजायमान होता रहा
ऐसे ही कितने भाव प्रधान गीतों के रचयिता एवं
हम सबके आदरणीय श्री गोपाल दास नीरज को हम तब से
याद करते रहे /करते हैं और करते रहेंगे.
जबलपुर में नीरज जी को मैंने कई बार सुना ,
हर बार साहित्यिक मन तारोताजाही हुआ,
और कई दिनों तक उनके गुनगुनाने की
शैली मानस पटल पर छाई रहती है.

आज एक बात और आपके साथ बाँटना चाहूँगा कि
हमारे पड़ोस में ही ७० वर्षीय मेरे अग्रज

सम्माननीय श्री शैलेन्द्र डग रहते हैं.
मेरे घर पर अक्सर उनका आना होता है.
उनके आगमन का मतलब ही मैं मानने लगा हूँ कि
उस दिन मुझे उनकी नई कविता सुनने मिलेगी.
एक कागज की पर्ची ,
उसमें तीन चार अंतरे की कोई रचना ,
लेकिन शब्दों में कहीं काटा-पीटी नहीं.
ये सदा कहते हैं कि मैं लिखने के बाद कभी काटता नही हूँ
और बिना किसी काट छाँट के लिखी गई उनकी कविता का
रसास्वादन करने वाला मैं पहले व्यक्तियों में रहता हूँ.
सीधा - सरल , निश्छल व्यक्तित्व को अपने घर में पाकर
मैं अपने को गौरवान्वित पाता हूँ.
मैं उनकी लेखनी और उनके शब्द विन्यास का कायल हूँ.
अक्सर मुझे उनकी कविताओं के साथ-साथ
उनसे उनके संस्मरण भी सुनने मिलते हैं.
हिन्दी, उर्दू, बांगला और अंग्रेजी जानने वाले शैलेन्द्र डग जी का बचपन
लखनऊ में लखनवी अंदाज़ में गुज़रा है.
नीरज जी उनके परिचित एवं स्नेही होने के कारण
वे अक्सर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में बताते हैं.
अनेक बार गोष्ठियों में डग जी को उनका सानिध्य प्राप्त हुआ है.
उन्होंने बताया कि वे (डग जी) अभी कुछ वर्ष पहले
अपने घरलू कार्य से इन्दोर गए हुए थे।
शाम को नीरज जी के प्रोग्राम की ख़बर लगते ही
वे भी वहाँ पहुँच कर दर्शक दीर्घा में जाकर कार्यक्रम सुनने लगे.
कार्यक्रम के दौरान जैसे ही नीरज जी की नज़र उनके ऊपर पड़ी तो उन्होंने तुंरत
डग सा'ब को अपने पास बुलाया और उनसे भी काव्यपाठ कराया .
ऐसे नीरज जी को शैलेन्द्र जी जैसे लोग और उनके गीतों का सार
ढूँढने वाले हम जैसे लोगों कि हिन्दी संसार में कमी नहीं है.
अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले
आदरणीय नीरज जी हमारे हिन्दी कवियों के एक नायाब नगीना हैं.
हम उनके उनके जीवेत शरदः शतं की ईश्वर से प्रार्थना करते हैं.

- विजय तिवारी " किसलय "










7 टिप्‍पणियां:

  1. बढिया आलेख । नीरजजी के गीत फ़िल्मों में देखें या रेडियो पर सुनें , मन को छू जाते हैं । कवि सम्मेलनों के मंच पर नीरजजी की बात ही निराली है । डग साहब के बारे में पढ कर भी अच्छा लगा ।

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  2. आदरणीय किसलय जी,
    बहुत खूब। नीरज जी के जन्म दिवस पर आपका यह आलेख किसी मिठाई से कम नहीं, और सभी चिट्ठाकारों की तरफ़ से नीरजजी को एक मुकम्मिल बधाई है।

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  3. आज मंचीय कवियों को दोयम दर्जे का समझा जाता है. लेकिन नीरज जी को मंच में सुनने के लिए लोग लालायित रहते हैं.उनकी कवितायें सरल और मन को छूने वाली हैं.

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  4. Priy bhai Kislay ji
    Shri Gopal Das neeraj ji ke upar aap ka lekh sarahniy hai.Uske baad Dag ji ke upar jo lekh likha vo bhi bada marmik laga. iske alaava aap aksar kisi n kisi ke upar likhte rahte hain. aapka is tarah jaani maani hastiyon par likhna mujhe bahut achchha lagta hai. Lekh ke roop mein ye aapka aadar aur pyar hai jo doosarn ke liya jhalaktaa hai.ye bhawana aap ke vyktitv mein chaar chaand lagaati hai. jahaan tak mera maanana hai. Aap sachmuch saral evam saras vktitv swabhav ke hain jo badi saralta se kisi ka man moh lete hai. Main dhany hoon ki aapka pyaar mujhe mila. Eshwar se kaamna karata hoon ki aap ka pyar mujhe yu hi milta rahe,bas.

    Aap jis se bhi milte ho nibha dete ho.
    Milne vaalon ko mohabbat ka sila dete ho.
    Aapki saralata sarasta ka jawaab nahin.
    Pyar itna lutaate ho ki usko khila dete ho.

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